Andhra Pradesh Assembly Elections 2024: फिर फिर चुनाव आयोग!

NFA@0298
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दो साल पहले 2024 के आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में आधी रात के बाद भारी मतदान के आरोप एक बार फिर चुनाव आयोग को सवालों के घेरे में खड़ा कर रहे हैं। चुनाव आयोग जो आमतौर पर ऐसे आरोपों पर तड़ाक से जवाब दे देता है, इस बार चुप्पी साधे हुए है। यही खामोशी अंधेरा और घना करती है।

अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जो आंकड़े पेश किए, वे चौंकाने वाले हैं। उन्होंने दावा किया कि रात 11:45 बजे से सुबह 2 बजे के बीच लगभग 4.16 प्रतिशत वोट डाले गए, करीब 17 लाख वोट। इनमें से ज्यादातर टीडीपी-बीजेपी-जनसेना गठबंधन को मिले। 3500 मतदान केंद्रों पर वोटिंग सुबह 2 बजे तक चली।

वहीं चुनावी प्रकिया पर सवाल उठाते हुए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी भी कह चुके हैं कि मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण की कोई जरूरत नहीं थी। क्‍योंकि हमारी चुनाव प्रणाली पहले ही 99 प्रतिशत सटीक थी।

ये लगातार उठ रहे सवालों की कड़ी हैं जो चुनाव आयोग की साख को बुरी तरह क्षति पहुंचा रहे हैं। साख में इतनी गिरावट हो चुकी है कि विपक्ष को महाभियोग का रास्ता अपनाना पड़ा।

जब देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, तब ये आरोप और भी गंभीर हो जाते हैं। लोकतंत्र का आधार ही मतदाता का विश्वास है। अगर मतदान प्रक्रिया पर ही शक हो जाए खासकर आधी रात के वोट, अचानक बढ़े हुए प्रतिशत और सत्ताधारी दलों को फायदा तो पूरा चुनावी माहौल दूषित हो जाता है।

आज ईवीएम से लेकर वोटर लिस्ट संशोधन तक हर कदम पर सवाल उठ रहे हैं। आंध्र में रात 2 बजे तक मतदान जारी रखने का फैसला किस आधार पर लिया गया? क्‍या सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक किए जाएंगे? ये सवाल सिर्फ विपक्ष के नहीं, हर लोकतंत्रप्रेमी नागरिक के हैं।

क्‍या चुनाव आयोग को अपने दामन पर लग रहे दाग अच्‍छे लग रहे हैं या मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त को भरोसा मिल चुका है कि आरोपों से कुछ नहीं बिगड़ेगा।

क्‍या ऐसे आरोपों का जवाब देने के लिए स्वतंत्र जांच समिति नहीं गठित करनी चाहिए और चुनाव आयोग को अपनी निष्पक्षता साबित करनी चाहिए। समझ से परे है कि मौजूदा मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त यह मौका क्‍यों खोना चाहते हैं?

हकीकत तो यह है कि हमारे संविधान ने, हमारी संसद ने,हमारे संसदीय लोकतंत्र ने भारत निर्वाचन आयोग की ऐसी स्वतंत्रता, ऐसी स्वायत्तता और समय के साथ–साथ ऐसी ताकत दी है कि वो इस देश में निष्पक्ष चुनाव करवा सके।

लेकिन दुर्भाग्य है कि आजादी के बाद पहली बार है जब आयोग सिर्फ सवालों से नहीं घिरा है बल्कि गिरावट का इतना शिकार है कि पक्षपात के काले रंग उसकी दीवारों पर पुते नजर आ रहे हैं । यह रंग उजला नहीं हुआ तो लोकतंत्र भी संदेह के बादलों से घिरा रहेगा।



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