एक प्रवक्ता के ‘आखेट’ में झलकती Dr. Ambedkar के विचारों से घृणा!

NFA@0298
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Dr. Ambedkar की तस्वीर जलाने के आरोप में पिछले दिनों जेल जाने वाले ग्वालियर के वकील अनिल मिश्र एक बार फिर चर्चा में हैं।इस बार उन्होंने ब्राह्मण समाज के लोगों से ‘शस्त्र उठाकर’ समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी का सर धड़ से अलग करने का खुला आह्वान किया है। पता नहीं, अनिल मिश्र के ब्राह्मण होने में क्या कमी है कि इस कथित ‘धार्मिक’ आखेट के लिए न तो वे खुद शस्त्र उठाना चाहते हैं और न ही अपने परिवार के बच्चों को इसकी जिम्मेदारी देना चाहते हैं, सारा पुण्य दूसरे ब्राह्मण परिवारों पर ही लुटाना चाहते हैं! बहरहाल, इस मुद्दे पर जिस तरह से राजकुमार भाटी के खिलाफ गोलबंदी हुई है, वहन सिर्फ राजनीति कलाभ के लिए झूठ पर आधारित है बल्कि इसमें जातिप्रथा के विरुद्ध चलाये गये सदियों के संघर्ष से उपजी ब्राह्मणवादी घृणा भी बजबजा रही है जिसके निशाने पर कभी डॉ. आंबेडकर भी रहे हैं।

टेलिविजन बहसों में अपनी तार्किक क्षमता और अध्ययन के लिए बीते कुछ वर्षों से चर्चित राजकुमार भाटी का अपराध ये है कि उन्होंने 5 मई 2026 को दिल्ली के जवाहर भवन में एक किताब के विमोचन के दौरान समाज में प्रचलित पुरानी कहावतों का जिक्र किया जिन का तमाम जातियां एक दूसरे को अपमानित करने के लिए इस्तेमाल करती रही हैं।गुर्जर समाज से आने वाले राजकुमार भाटी ने इस संदर्भ में अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब वे पढ़ाई पूरी कर के पत्रकार बने तो एक सहकर्मी उन्हें देखकर कहा करते थे कि ‘गुर्जर, अहीर, कंजर, कुत्ता, बिल्ली, बंदर/ये छैना होते, तो खुले किवाड़ों सोते।’ आये दिन वे इस कहावत से अपमानित होते थे तोउनके किसी शुभचिंतक ने उन्हेंजवाब देने के लिए एक दूसरी कहावत सुझाई-  ‘ब्राह्मण भला न वेश्या, इनमें भला न कोय/कोई-कोई वेश्या तो भली, ब्राह्मण भला न कोय।’

राजकुमार भाटी ने बताया कि यह कहावत उन्हें अच्छी नहीं लगी। सभी ब्राह्मण बुरे नहीं होते, कुछ अच्छे भी होते हैं।इसलिए उन्होंने इस कहावत का जवाबी उपयोग नहीं किया।यह एक तरह से अकादमिक परिचर्चा थी जिसमें समाज में कहावतों के जातिवादी स्वरूप और उनके जरिए एक दूसरे को अपमानित करने की परंपरा को समझा जा रहा था।लेकिन राजकुमार भाटी के करीब बारह मिनट के भाषण से महज सात-आठ सेकेंड की वह क्लिप काटकर बीजेपी आईटी सेल ने वायरल कर दिया और राजकुमार भाटी और इस बहाने समाजवादी पार्टी को ब्राह्मण विरोधी प्रचारित करने का तूफान खड़ा कर दिया गया।यूजीसी गाइडलाइंस के मामले में ब्राह्मणों की नाराजगी झेल रही बीजेपी के लिए यह बढ़िया मौका था। टीवी चैनलों के एंकर-ऐंकरानियों ने विपक्ष को ब्राह्मण और प्रकारांतर में हिंदू विरोधी साबित करने का टास्क मिल गया और उनमें अधिकतर का ब्राह्मण होना भी संयोग नहीं था।तमाम समतावादी संगठनों द्वारा लगाये जाने वाले ‘ब्राह्मणवाद का नाश हो’ के नारे को ‘ब्राह्मणों के नाश’ की योजना बता दिया।

राजनीति के अखाड़े में उठ रहे बवंडर को शांत करने के लिए राजकुमार भाटी ने माफी मांग ली और समाजवादी पार्टी के भी तमाम नेताओं ने उनके बयान से खुद को अलग कर लिया। लेकिन तमाम ब्राह्मण संगठन और नेता काम पर लगा दिए गए जिसकी एक अभिव्यक्ति भाटी का ‘सर धड़ से अलग’ करने के आह्वान से जुड़ता है।यह बात भुला दी जा रही है कि ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद एक ही नहीं है और यह बात आज के तमाम ब्राह्मण भी अच्छी तरह समझते हैं। डॉ. आंबेडकर ने बताया था कि ब्राह्मणवाद से उनका समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की भावना के निषेध से है जो सभी वर्गों में फैला हुआ है (हालांकि इसकी शुरुआत ब्राह्मणों से हुई)।

ब्राह्मण जाति में जन्म लेने वाले अनेक महापुरुषों ने भी ब्राह्मणवाद की जमकर आलोचना की है।लेकिन मौजूदा राजनीति समझती है कि ब्राह्मण जाति में पैदा हुए किसी भी व्यक्ति का इतिहास बोध शून्य होता है। वह ऊंच-नीच की सामाजिक व्यवस्था, भाग्यवादी कर्मकांडों और पाखंड का हर हाल में समर्थक होगा। और यह सब धर्म है जिसका विरोध दुश्म नहीं कर सकते हैं।

असमानता को ‘दैवीय’ और समता की बात करने को राक्षसी प्रवृत्ति ठहराना इस ‘हिंदुत्ववादी समय’ की खास पहचान बन गयी है जो राजकुमार भाटी प्रकरण से एक बार फिर उजागर है।स्पष्ट है कि सत्ता की शक्ति पाकर झूम रही हिंदुत्व की राजनीति जाति आधारित शोषण पर अब चर्चा भी नहीं होने देना चाहती। यही नहीं, वह पाखंड और अंधविश्वास पर किसी भी प्रहार को धर्म पर प्रहार घोषित कर रही है जबकि हिंदू समाज ने सदियों से इसी तरह खुद का परिष्कार किया है और सुधार की अनेकानेक लहरों का बांहें खोलकर स्वागत किया है। पूरा मध्यकाली संत साहित्य ब्राह्मणवादी कर्मकांडों के विरोध से भरा पड़ा है।

राज कुमार भाटी की जान के पीछे पड़ने वाले क्या कबीर दास की भी आलोचना करेंगे जिन्होंने कहा था ‘पांडे कौन कुमति तोहि लगी/तू रामन जपहि आभागी// वेद पुराण पढ़त अस पांडे/खर चंदन जैसे भारा// राम नाम तत समझत नाहीं, अंति पड़ै मुषिछारा//’

(अर्थात हे पांडे, तुझे कैसी बुरी बुद्धि लग गई है कि तू राम-नाम नहीं जपता? वेद-पुराण पढ़ कर तू बोझ ढोने वाले गधे की तरह है।)

‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ कहने वाले संत रैदास तोसाफ शब्दों में कहते हैं- ‘रैदास ब्राह्मण मति पूजिए, जए होवै गुनहीन/ पूजिहिं चरन चंडाल के, जउ हो वैगुन प्रवीन’ तो क्या रैदास गंगा या ब्राह्मण को अपमानित कर रहे थे?

इसी तरह गुरु नानक ने हरिद्वार में गंगा स्नान करते वक्त सूर्य को जलन देकर पंजाब की ओर पानी फेंकना शुरू किया था।पूछने पर कहा कि अगर पितरों तक पानी पहुंच सकता है तो फिर उनके खेतों तक क्यों नहीं पहुंचेगा?

तत्कालीन समाज ने कबीर, रैदास और गुरुनानक को संत का दर्जा दिया।यही नहीं आधुनिक काल में भी ये सुधारवादी धारा प्रवाहित रही। यहां तक कि ब्राह्मण जाति में पैदा हुए तमाम महापुरुषों ने सामाजिक कुरीतियों और ऊंच-नीच की प्रथा को निशाना बनाया। राजा राम मोहन राय (ब्राह्मण) ने सती प्रथा, बाल-विवाह और मूर्ति पूजा का विरोध किया तथा ब्रह्म समाज की स्थापना की।ईश्वर चंद्र विद्यासागर (ब्राह्मण) ने विधवा-विवाह के लिए शास्त्रों का सहारा लेकर रूढ़िवादी ब्राह्मणवाद से लड़ाई लड़ी।मूर्ति पूजा का खंडन करने वाले स्वामी दयानंदसरस्वती (ब्राह्मण) ने सत्यार्थ प्रकाश में जन्म-आधारित ब्राह्मणत्व, पुरोहितवाद और अंधविश्वासों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने वेदों की वापसी और गुण-कर्म आधारित व्यवस्था की वकालत की। महापंडित राहुल सांकृत्यायन (ब्राह्मण परिवार में जन्मे) ने अपनी पुस्तक ‘तुम्हारी क्षय’ में लिखा- ‘जिन ऋषियों को स्वर्ग, वेदान्त और ब्रह्म पर बड़े-बड़े व्याख्या न करने की फुर्सत थी… परंतु मनुष्यों के ऊपर पशुओं की तरह होते अत्याचारों को आमूल नष्ट करने के लिए उन्होंने कोई प्रयत्न नहीं किया… उन ऋषियों से आज के जमाने के साधारण आदमी में भी मानवता के गुण अधिक हैं।’ राहुल जी ने जाति-भेद को देश की सबसे बड़ी कमजोरी बताया और ब्राह्मणवादी समाज की ‘क्षय’ की कामना की।

यह याद रखना चाहिए कि इन तमाम महापुरुषों का विरोध ‘सनातनधर्म’ को बचाने के नाम पर ही किया गया था।

सवाल है कि वह हिंदू समाज कहां खो गया जिसने आलोचनाओं को सहज स्वीकार किया था। क्या हिंदुत्व दरअसल किसी संचित घृणा का विस्फोट है जोडा. आंबेडकर का तो कुछ बिगाड़ नहीं पायी, लेकिन उनके विचारों पर चर्चा करने वालों को धर्म-द्रोही ठहराकर दंडित करना चाहती है? क्या स्त्री और शूद्र को सतत ग़ुलामी में रखने का सिद्धांत देने वाली मनुस्मृति को हिंदू कानून बताने वाली धारा मनुस्मृति का दहन करने वाले डाॅ. आंबेडकर को माफ नहीं कर पायी है? डॉ. आंबेडकर ने अपने प्रसिद्ध भाषण जाति प्रथा का उच्छेद में तो यहां तक कहा था कि ‘यदि तुम इस व्यवस्था (जाति-व्यवस्था) में दरार डालना चाहते हो, तो तुम्हें वेदों और शास्त्रों में डायनामाइट लगाना होगा- जो तर्क को कोई स्थान नहीं देते; वेदों और शास्त्रों में, जो नैतिकता को कोई स्थान नहीं देते।’

डाॅ. आंबेडकर का आरएसएस और सावरकर वादियों ने जमकर विरोध किया था।हिंदू कोड बिल के समय तो उनका देशभर में पुतला भी फूंका गया था। बौद्ध धर्म अपनाते हुए ली गयीं उनकी 22 प्रतिज्ञाएं तो इन संगठनों के नेताओं के लिए किसी तेजाब की तरह थीं।लेकिन आजादी के बाद बीतते हर दशक के साथ समता को लेकर बहुजन समाज के बढ़ते आग्रह और डॉ. आंबेडकर के कद के विराट होते जाने के चलते मजबूरी में उन्हें अपने महापुरुषों की सूची में जगह दे दी गयी, लेकिन आरएसएस से प्रेरित हर व्यक्ति और संगठन चाहते हैं कि डॉ. आंबेडकर के विचारों पर कोई बहस न हो।उनकी मूर्तियों पर इतना माल्यार्पण और जलार्पण किया जाये कि उनकी पुस्तकें लुगदी में बदल जायें। लेकिन क्या यह इतना आसान है?

हैरानी की बात तो यह है कि डाॅ. आंबेडकर को अपनी प्रेरणा बताने वाली बहुजन समाज पार्टी की नेता सुश्री मायावती ने भी राजकुमार भाटी के बयान के हवाले से समाजवादी पार्टी से माफी मांगे की मांग की है। जबकि राजकुमार भाटी समाज में ब्राह्मणवादी असर फैलाने के उपकरणों की ही चर्चा कर रहे थे। मायावती शायद भूल गयी हैं कि 13 फरवरी 1938 कोमन्नमाड (महाराष्ट्र) में ग्रेट इंडियन पेनिन सुला रेलवे डिप्रेस्ड क्लास वर्क मेन्स कॉन्फ्रेंस में भाषण देते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि उनकी नजर में दो सबसे बड़े दुश्मन हैं- ब्राह्मणवाद औरपूंजीवाद! मायावती या उनकी पार्टी इन दुश्मनों को लेकर क्या कर रही है, यह शोध का विषय है।

डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि जाति प्रथा के रहते भारत एक राष्ट्र नहीं बन सकता। उनके रास्ते पर चलने की पहली शर्त है कि जातियों के नाश में योगदान दिया जाये। जाति प्रथा का गौरवगान बंद किया जाये और अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया जाये।लेकिन इन दिनों हिंदुत्व के प्रचारक कथावाचकों की भीड़ इन दोनों उपायों को ‘धर्म-विरोधी’ घोषित करने में जुटी है।ये राष्ट्र निर्माण में बाधा हैं। हिंदुत्व की राजनीति डॉ.आंबेडकर के विचारों के लिए ‘वधिक’ बनने की राह पर है। यह राजकुमार भाटी का सर धड़ से अलग करने की मांग ने साबित कर दिया है।

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