
इन दिनों देश में, खासतौर से मीडिया के बड़े हिस्से में, ईरान पर इस्राइल और अमेरिका के हमले से शुरू हुए युद्ध से पैदा हुए संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश के लोगों से की गई फिजूलखर्ची रोकने की सात सूत्री अपील की खासी चर्चा है। प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह सहित अनेक केंद्रीय मंत्रियों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने के लिए अपनी महंगी एसयूवी के काफिलों में कटौती कर दी है! कुछ जजों और अधिकारियों वगैरह के वीडियो भी वायरल हैं कि वे कैसे साइकिल से दफ्तर जा रहे हैं। यह कहने वाले भी कम नहीं है कि आखिर महंगा सोना खरीदकर करोगे क्या?
मगर इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। दरअसल यह सरकार की अदूरदर्शिता का ही नतीजा है कि आज देश के अनेक शहरों में पेट्रोल और डीजल की किल्लत हो रही है और आम लोगों को इसके लिए खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर सहित प्रदेश के अनेक शहरों और कस्बों में दर्जनों पेट्रोल पंपों में तेल नहीं है। ऐसा नजारा देश के अनेक हिस्सों में देखा जा सकता है। एलपीजी सिलेंडर को लेकर भी मुश्किलें कम नहीं हुई हैं, और हकीकत यह भी है कि सरकार ने इनके दाम भी जिस तरह से बढ़ाए हैं उससे इसका बोझ भी आम लोगों पर ही पड़ रहा है।
सरकार देर से जागी है। साफ देखा जा सकता है कि 28 फरवरी को इस्राइल और अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमले और वहां के सर्वोच्च धार्मिक नेता खामेनेई की हत्या ने ही एक बड़े वैश्विक संकट के साफ संकेत दे दिए थे।
लगातार इस बात की आशंका बनी ही हुई थी कि यह युद्ध सारी दुनिया को गहरे ऊर्जा और आर्थिक संकट में डाल देगा। भारत पर इसका असर पड़ना ही था, क्योंकि एक तो हम पेट्रोलियम के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर ही निर्भर हैं। डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ते रुपये से हमें इसकी वैसे भी भारी कीमत चुकानी ही थी।
आज हालत यह हो गई है कि डॉलर के मुकाबले रूपया 95.80 के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया है। इसका असर हमारे आयात बिल पर पडऩा ही है। सरकार सोने का आयात घटाना चाहती है, ताकि विदेशी मुद्रा भंडार बचाया जा सके, जिस पर पहले ही पेट्रोलियम के आयात के कारण भारी दबाव है।
लेकिन लाख टके का सवाल तो यही है कि ऐसे हालात से निटपने की सरकार की तैयारी कहां थी और कैसी थी? जवाब है, सरकार ने भाजपा के साथ अपनी पूरी ताकत पांच राज्यों, खासतौर से असम और पश्चिम बंगाल में झोंक रखी थी। जब मोदी सरकार का सारा अमल चुनाव में झोंक दिया गया था, तब क्या उसे अंदाजा नहीं था कि तेल संकट देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी पड़ सकता है और इसका असर देश के स्वर्ण भंडार तक पर पड़ सकता है।
सवाल है कि जब मोदी सरकार ने ऐन चुनाव के बीच महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक लाने का फैसला किया, तब उसे यह एहसास क्यों नहीं हुआ कि उसे इनसे पहले आसन्न तेल संकट से निपटने के लिए देश की संसद और लोगों को विश्वास में लेना चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी की सात सूत्री अपील सरासर अपनी नाकामी को छिपाने की कवायद लगती है, बावजूद इसके कि ऐसे संकट के समय देश के लोगों को समर्पण के लिए तैयार रहना चाहिए और ऐसा देश के लोगों ने अतीत में किया भी है।
दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की अपील अतीत में नोटबंदी और कोरोन के समय के लॉकडाउन से जुड़े एकतरफा कदमों जैसे ही हैं।
16 नवंबर, 2016 को अचानक रात आठ बजे प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन के जरिये पांच सौ और हजार रुपये के चलन वाले नोटों को अचानक बंद करने का ऐलान कर पूरे देश को सकते में डाल दिया था! इसकी वजह से आम लोगों को भारी तकलीफ उठानी पड़ी। दो हजार के नोट लाए गए लेकिन वह भी अब चलन से बाहर हैं, और ऐसा क्यों किया गया इसका कोई संतोषजनक जवाब तक नहीं मिला। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था को जो धक्का लगा था उससे आज तक देश पूरी तरह नहीं उबर पाया है। क्या यह सच नहीं है कि सरकार नोटबंदी को अपनी उपलब्धि की तरह बताने में गुरेज करती है?
यही हाल कोरोना महामारी के समय हुआ था जब 24 मार्च, 2020 को प्रधानमंत्री मोदी ने रात आठ बजे देश को संबोधित किया और कुछ घंटों के नोटिस पर ही देशभर में लॉकडाउन का एलान कर दिया। रिपोर्ट्स से पता चला कि केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के साथ ही संबंधित एजेंसियों को विश्वास में लिए बिना ही ऐलान कर दिया था। उसका हस्र सारे देश ने भुगता था।
इससे कहां इनकार है कि असाधारण संकट के समय असाधारण उपाय करने ही पड़ते हैं, लेकिन एक संसदीय लोकतंत्र के अपने तकाजे और कायदे और जवाबदेहियां हैं। अच्छा हो कि मोदी सरकार जल्द से जल्द संसद का सत्र बुलाकर इस चौतरफा संकट की सही तस्वीर पेश करे और देश को भरोसे में ले।


