
जबलपुर। 30 अप्रैल गुरुवार की शाम देश के लिए और खासकर मध्यप्रदेश के लिए किसी भयानक सपने से कम नहीं रही। जब गुरुवार शाम को जबलपुर में नर्मदा नदी पर बने बरगी डैम (Bargi Dam) में एक क्रूज डूब गया, तो चारों तरफ सिर्फ चीख-पुकार और मौत का सन्नाटा था। एक तरफ मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग के क्रूज की आपराधिक लापरवाही की खबरें आ रही थीं, तो दूसरी तरफ लहरों के बीच से इंसानियत की ऐसी कहानियां छनकर बाहर आईं जिन्होंने हर किसी की आंखों को नम कर दिया। यह कहानी उन ‘गुमनाम नायकों’ के नाम है जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर मौत के मुंह से 28 लोगों को जिंदा खींच लिया।

शनिवार तक क्रूज हादसे में हुई मौतों का आंकड़ा बढ़कर 12 हो गया है। शनिवार को बचाव टीम ने 2 बच्चों श्री तमिल और विराज सोनी का, और रविवार सुबह एक बच्चे श्री मयूरम का शव निकाला है। बचाव टीम ने श्री तमिल, श्री मयूरम और विराज सोनी के शव को बाहर निकाला है। अब सिर्फ कामराज की तलाश जारी है।
रस्सियों से बुना ‘जिंदगी’ का जाल
गुरुवार को जब बरगी डैम में तेज हवाएं चली और क्रूज अनियंत्रित होकर डूब रहा था और सरकारी रेस्क्यू टीमों का अता– पता नहीं था, तब पास के कंस्ट्रक्शन साइट पर काम कर रहे मजदूरों ने जो किया, वह डूब रहे लोगों के जीवन में किसी चमत्कार से कम नहीं था।
पश्चिम बंगाल के रमजान, बिहार के बिंद्रा यादव और उसके 35 साथियों ने जैसे ही लोगों को डूबते देखा, वे बिना अपनी जान की परवाह किए गहरे पानी में कूद गए।
इन मजदूरों ने कंस्ट्रक्शन साइट में इस्तेमाल होने वाली लोहे की जंजीरों और मोटी रस्सियों को आपस में जोड़कर एक ‘ह्यूमन चेन’ बनाई। बिहार के पश्चिम चंपारण के रहने वाले 28 साल के बिंद्रा कुमार यादव ने बताया कि उन्होंने पायलट को रुकने के लिए चिल्लाया भी था, लेकिन नाव हाथ से निकल चुकी थी।
फिर मजदूरों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर ‘ह्यूमन चेन’ बनाई। यूपी के गोरखपुर के 18 वर्षीय राज कुमार और शिवनाथ ने भी रस्सियों के सहारे डूबते लोगों को बाहर निकाला। उनके पास न कोई लाइफ जैकेट थी, न कोई ट्रेनिंग, बस एक ही धुन सवार थी कि किसी भी तरह लोगों की जान बचानी है।
मौत के मुंह से 4 लोगों को खींच लाया रमजान
पश्चिम बंगाल के रहने वाले 22 वर्षीय रमजान ने अपनी जान की परवाह किए बिना 4 लोगों को मौत के मुंह से खींचकर बाहर निकाल कर ले लाया। रमजान ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि, मैंने नाव को डूबते देखा तो एक पल भी नहीं सोचा। अपने शरीर पर एक रस्सी बांधी और करीब 25 फीट ऊंची चट्टान से उफनते पानी में छलांग लगा दी। रमजान अकेले 6 लोगों को किनारे तक खींच लाए, जिनमें से 4 की जान बच गई।
ममता की आखिरी जंग: मौत भी जिसे जुदा न कर सकी

रेस्क्यू ऑपरेशन की सबसे हृदयविदारक तस्वीर तब सामने आई जब गोताखोरों ने एक महिला का शव निकाला। डूबते वक्त उस मां ने अपने मासूम बच्चे को सीने से इस कदर सटा रखा था कि मौत के बाद भी उनकी पकड़ ढीली नहीं हुई। चश्मदीदों के अनुसार, जब नाव पलटने लगी तो मां ने खुद लाइफ जैकेट पहनने के बजाय उसे अपने बच्चे के चारों तरफ लपेटने की कोशिश की ताकि शायद उसका बेटा बच जाए। अफसोस वे दोनों ही नहीं बच सके, लेकिन जब उनके शव निकले तो मां की बाहें बच्चे के इर्द-गिर्द वैसी ही कसी हुई थीं। इस मंजर की तस्वीर देखकर हर इंसान की आंखे नम हो गई। दिल्ली से आई 13 साल की सिया परिवार के साथ गर्मी की छुट्टियां बिताने जबलपुर आई थी। सिया ने बताया कि लाइफ जैकेट एक केबिन में थे, लेकिन स्टाफ ने नहीं दिए। कुछ लोगों ने खुद पहन लिए। “मम्मी ने मेरे छोटे भाई त्रिशान को अपने साथ जैकेट में बांध लिया था। नाना बाहर ही गिर गए थे। मैं बस भगवान से प्रार्थना कर रही थी।
स्थानीय ग्रामीणों ने घरों के दरवाजे और हौसले दोनों खोल दिए
जैसे ही डूबे हुए लोगों का रेस्क्यू कर उन्हें किनारे पर लाया गया, पास के गांवों के लोग कंबल, गरम चाय और दूध लेकर वहां पहुंच गए। प्रशासन के पहुंच से पहले इन ग्रामीणों ने अपनी झोपड़ियों को ‘अस्थाई अस्पताल’ का रूप दे दिया। कड़ाके की हवाओं के बीच गीले कपड़ों में ठिठुर रहे पर्यटकों को ग्रामीणों ने अपने तन के कपड़े दिए और आग जलाकर उन्हें सदमे से बाहर लाने की कोशिश की। अगर ये ग्रामीण तत्काल अपनी सूझ बूझ से काम नहीं लेते तो मौतों का आंकड़ा कहीं ज्यादा भयावह हो सकता था।
मौत सामने थी लेकिन, लोगों को बचाने मौत से लड़ पड़े

क्रूज पर सवार रहे रोशन आनंद बताते हैं कि हम आठ लोग क्रूज पर सवार थे। उसमें 45-50 लोग थे, जिनमें महिलाएं और बच्चे ज्यादा संख्या में थे। शुरुआत में मौसम सामान्य था, लेकिन लौटते वक्त अचानक तूफान आ गया। पहले हलचल हुई, फिर लहरें तेज हुईं। कुछ ही मिनटों में हालात बेकाबू हो गए और क्रूज हिचकोले खाने लगा। ऊपर बैठे लोगों को नीचे लाया गया। वहां तीन-चार कर्मचारी थे, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। स्थिति बिगड़ने पर हमने खुद लाइफ जैकेट निकाली और लोगों को पहनाई। अगर ऐसा नहीं करते तो शायद कोई नहीं बचता। बच्चों को एक-एक कर जैकेट पहनाई। इसी बीच क्रूज में पानी भरने लगा।
काल के गाल में समा गया परिवार

बरगी डैम में हुए क्रूज हादसे में खमरिया ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में काम करने वाले कामराज का परिवार हादसे की चपेट में आया। उनके रिश्तेदार तमिलनाडु से आए थे और सभी ने क्रूज पर जाने का प्लान बनाया। 9 लोग क्रूज पर सवार हुए। हादसे में पत्नी काकुलझी और भाभी सौभाग्यम भी नहीं रहीं। कामराज का बेटा श्री तमिल का शव शनिवार शाम मिला है।सबसे दर्दनाक बात, कामराज के माता-पिता क्रूज पर नहीं गए थे। वे किनारे से अपने परिवार को लहरों में फंसते देखते रहे, लेकिन कुछ नहीं कर सके। कामराज और उनका भारतीय श्री मयूरम अब भी लापता है।
जब सिस्टम की नाकामी पर भारी पड़ी हिम्मत
जबलपुर से लेकर मथुरा और केरल के तनूर तक, हर हादसे की पटकथा एक जैसी है, वही ओवरलोडिंग और वही सुरक्षा नियमों की अनदेखी। बरगी में भी जब क्रूज में पानी भरने लगा, तब अफरा-तफरी में लाइफ जैकेट बांटी गईं, जिससे लोग जान बचाने के लिए आपस में ही छीना-झपटी करने लगे। यह प्रशासन की सबसे बड़ी नाकामी है।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शुक्रवार को बड़ी घोषणा की है। बरगी डैम में कूदकर जान बचाने वाले नायकों को सम्मानित किया जाएगा। साथ ही सभी को 51– 51 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा भी की गई है।


