
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जिंदगीभर अस्थायी बनाए रखना संवैधानिक सरकार को नहीं सुहाता, हाईकोर्ट की नसीहत…
सुनील कुमार ने लिखा है
09-Apr-2026 4:58 PM
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कल राज्य के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के एक मामले की सुनवाई के दौरान सरकार को खासा सुनाया है। इन्हें नियमित करने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने सरकार को चार महीने के भीतर सहानुभूतिपूर्वक निर्णय लेने को कहा है। ये मामला वन विभाग के डेढ़ दर्जन कर्मचारियों का है जो कि 2006 से 2016 तक लगातार कंप्यूटर ऑपरेटर, कार्यालय सहायक, और सुरक्षाकर्मी जैसे पदों पर नियुक्त हुए थे। लेकिन 10 साल से काम करने के बाद भी राज्य सरकार ने उन्हें नियमित नहीं किया। ये कर्मचारी अदालत तक जाकर यह तर्क भी दे रहे हैं कि अब वे यह काम करते-करते किसी भी दूसरी सरकारी नौकरी के लिए आयु सीमा भी पार कर चुके हैं। हाईकोर्ट में सरकार की तरफ से यह कहा गया कि आर्थिक तंगी की वजह से सरकार सबको नियमित कर्मचारी नहीं बना सकती। इस पर अदालत ने कहा कि अगर किसी काम का स्वरूप स्थायी और बारहमासी है, तो कर्मचारियों को अस्थायी रखना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने कहा कि सरकार एक संवैधानिक नियोक्ता है और वह गरीब कर्मचारियों की हक की कीमत पर अपने बजट का संतुलन नहीं साध सकती। जज ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जो कर्मचारी बरसों से बुनियादी और जरूरी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें लंबे समय तक अस्थायी बनाए रखना उनके अधिकारों और गरिमा का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि इन फैसलों की भावना के अनुरूप ही सरकार कर्मचारियों के मामलों पर विचार करे। जज ने कहा कि नियमित नियुक्तियों से बचने के लिए सरकार अस्थायी व्यवस्था और आउटसोर्सिंग का सहारा लेती है।
यह मामला बड़ा व्यापक और बड़ा दिलचस्प है। सरकार के अलग-अलग दर्जनों विभागों और हजारों दफ्तरों में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी रखे जाते हैं। इन्हें कलेक्टर द्वारा निर्धारित दर पर मजदूरी की तरह मेहनताना दिया जाता है, जो कि एक व्यक्ति के जिंदा रहने के लिए ही काफी रहता है। ऐसे में यही कर्मचारी अगर 10-10 बरस तक सरकार में वही काम कर रहे हैं, तो उन्हें दैनिक वेतनभोगी बनाकर रखना सचमुच ही नाजायज बात लगती है। लोगों को याद होगा कि शिक्षकों की कमी में सरकार शिक्षाकर्मी नियुक्त करती थी जो कि काम वही का वही करते थे, पूरी तरह से शिक्षकों जैसा ही पढ़ाते थे, लेकिन सरकार उन्हें शिक्षकों के वेतन के मुकाबले बहुत थोड़ा सा भुगतान करती थी। उनका भी मामला बरसों तक चला था, और नियमित करने के लिए वे आंदोलन करते ही रहते थे। पुलिस की कमी में एक वक्त नगर सैनिक या होमगार्ड बनाए जाते थे, लेकिन उन्हें पुलिस बनने का मौका नहीं मिलता था। सरकार के बहुत सारे अमले की कमी को इसी तरह कामचलाऊ इंतजाम से पूरा किया जाता है। अब राष्ट्रीय स्तर पर जहां फौज में सैनिकों की कमी है, वहां पर क्या अग्निवीर नाम के चार सालाना लोग तैनात किए जा रहे हैं, और चार बरस के बाद कानूनी रूप से तो वे सडक़ों पर रहेंगे, यह एक अलग बात है कि केंद्र सरकार की बहुत महत्वाकांक्षी योजना होने के कारण उन्हें राज्य सरकारें कहीं न कहीं एडजस्ट करने की बात कर रही हैं। लेकिन जिस तरह का मुद्दा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों का आया है, क्या अग्निवीरों का मुद्दा ठीक उसी तरह का नहीं है? कि वे चार बरस तक फौज में काम करने के बाद किसी कारखाने के गेट को खोलने-बंद करने की चौकीदारी में लगेंगे? केंद्र सरकार भी तो अग्निवीरों की उसी तरह संवैधानिक नियोक्ता है जैसी नियोक्ता छत्तीसगढ़ सरकार दस बरस से वन विभाग में काम कर रहे इन दैनिक वेतनभोगियों की है।
दरअसल जनता की जरूरतें और सरकार का बजट, इन दोनों के बीच में कोई तालमेल हो नहीं पाता है। फिर इसके बाद अलग-अलग राज्यों में पांच साल में दो-तीन अलग-अलग चुनाव हो जाते हैं, जिनकी वजह से सत्तारूढ़ पार्टी की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं, और वोटरों को तात्कालिक संतुष्ट करने का एक दबाव बना रहता है। सत्तारूढ़ पार्टी तो यह दबाव झेलती ही है, अधिकतर चुनावों में प्रमुख विपक्षी दल भी किसी भी तरह सत्ता पर आने की कोशिश में अपने चुनाव घोषणा पत्र में कई तरह के वायदे करते हैं, और सरकार में आने पर उन्हें निभाने में बजट का खासा हिस्सा चले जाता है।
ऐसा माना जा रहा है कि वोटरों को सीधे फायदा देने की कई योजनाओं के चलते देश के कई राज्य विकास के, और रोजाना के रखरखाव के बहुत से काम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। दीर्घकालीन ढांचा-विकास की योजनाओं के बारे में सोचना कम होने लगा है, क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी अगले चुनावों में वोटरों का समर्थन राज्य, केंद्र, और म्युनिसिपल-पंचायत में कायम रखने के लिए, ट्रिपल इंजन की सरकार बनाने के लिए दबाव झेलती है, और कर्मचारियों को नियमित करना वोटरों को लुभाने में उतना कारगर नहीं होता है, जितना कि सीधे फायदा पहुंचाने वाली कई योजनाएं होती हैं।
लेकिन जो मुद्दा देश में अग्निवीरों को लेकर पिछले बरसों में उठा है, वह तो मामला फौज से जुड़ा होने की वजह से लोगों को अधिक भावनात्मक लगा, और उनके लिए कुछ अधिक हमदर्दी भी जुटी। लेकिन हम जब शिक्षाकर्मी से लेकर दूसरे दैनिक वेतनभोगियों, या अस्थायी कर्मचारियों को देखते हैं, तो उनका भी मामला हमें कहीं भी अग्निवीरों से कम नहीं लगता है। अब जनकल्याणकारी सरकारों को अपने बजट में कर्मचारियों को नियमित करने का एक इंतजाम तो करना ही चाहिए। यह कैसे हो, यह सोचना हमारे लिए आसान नहीं है, लेकिन राज्य के वित्त मंत्री और पूरी सरकार को यह ध्यान रखना चाहिए कि जिन नागरिकों को वे रोजाना के मेहनताने या मजदूरी पर रख रहे हैं, उन्हें बरसों तक ऐसी असुरक्षा के बीच रखना, बहुत ही खतरनाक मानसिक स्थिति में रखने के अलावा कुछ नहीं है। लोगों के बुनियादी मानवीय अधिकार यह मांग करते हैं कि सरकार को अपनी जनता को ऐसी अस्थायी और अस्थिर स्थिति में अंतहीन रखने को ही एक नियमित व्यवस्था नहीं मान लेना चाहिए। देश में बेरोजगारी का यह हाल है कि कुछ शहरों में जब सरकारी कॉलेजों में शिक्षक कम होने से अतिथि व्याख्याता रखे जाते हैं, जिन्हें हर लेक्चर के लिए, या हर दिन काम के लिए कुछ मामूली सी मजदूरी दी जाती है, तो ऐसे एक-एक विषय के लिए कुछ जगहों पर सैकड़ों अर्जियां आ जाती हैं। जहां नियमित सहायक प्राध्यापकों को लाख रुपए से अधिक वेतन मिलता है, वहां ऐसे अतिथि व्याख्याताओं को कुछ हजार रुपए महीने के मिलते हैं, और इसका कोई फायदा उन्हें अनुभव की शक्ल में आगे किसी सरकारी नौकरी में नहीं मिलता। यह मामला जटिल है क्योंकि ऐसे लोगों को कुछ फायदा देने की जब बात आएगी, तो वह दूसरे लोगों को मिलने वाले अवसर को कम करेगी। फिर भी हम जनकल्याणकारी सरकारों से यह उम्मीद करते हैं कि वे अस्थायी कर्मचारियों के तरह-तरह के इंतजाम को कम से कम रखे, और जल्द से जल्द कर्मचारियों को नियमित करने का काम करे। यह बात हमारे लिए कहना जितना आसान है, सरकार के लिए उसे करना उतना ही मुश्किल है क्योंकि सरकारी अमला कम से कम रखने का जो चलन चला है, उसके तहत सरकार अधिकतर काम आउटसोर्स करवाने लगी है, और ठेकेदार के कर्मचारी सरकारी काम करते हैं, नियमित सरकारी कर्मचारी के मुकाबले एक चौथाई बोझ ही सरकार पर आता है। फिर भी इस मामले में हमें कुछ अधिक कहने की जरूरत नहीं है क्योंकि हाईकोर्ट ने जो आदेश सरकार को दिया है वह एक जनकल्याणकारी अदालत की तरह दिया गया है, और सरकार को जनकल्याणकारी बनने की नसीहत दी गई है, ऐसे में हमें जनकल्याणकारी अखबार बनने की अधिक जरूरत नहीं रह गई है। और हम दुनिया की इस हकीकत को अनदेखा करना भी नहीं चाहते कि एआई नाम के जल्लाद के आने के बाद अब अनगिनत नौकरियों के सिर कटेंगे, और सरकार तो और भी कम कर्मचारियों से काम चला लेगी, जो-जो रिटायर होंगे उनमें से बहुत सी जगहों पर नए लोगों को रखने की जरूरत सरकार को नहीं पड़ेगी। ऐसे में सरकारी नौकरी की चाहत रखने वाले लोगों को राहत देने का कोई रास्ता सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के सामने भी नहीं रहेगा, फिर चाहे ऐसे लोग दस-दस बरस से सरकारी काम करने वाले दैनिक वेतनभोगी ही क्यों न हों, या वे 24 साल की उम्र में रिटायर हो चुके अग्निवीर ही क्यों न हों। हमें याद है कि जब अग्निवीर वाला मुद्दा आया था तब भी हमने रूस-यूक्रेन जंग के दौरान यह लिखा था कि आने वाले दिनों में फौज में सैनिकों की जरूरत घटती चली जाएगी, और अधिकतर लड़ाईयां ड्रोन से लड़ी जाएंगी जिनमें इंसानों का बड़ा सीमित इस्तेमाल रहेगा। आज जंग के मोर्चों पर वही होते दिख रहा है, और भारतीय थलसेना में सैनिकों के जो दसियों हजार पद खाली पड़े हुए हैं, उन्हें भरने के बारे में सरकार दुबारा सोच भी रही होगी कि ऐसे हजार-हजार पद की जगह कुछ दर्जन ड्रोन ऑपरेटर काफी नहीं होंगे? सरकारों में किसी भी तरह से अस्थायी काम करने वाले लोगों को यह जमीनी हकीकत देखनी होगी कि अदालती हमदर्दी के बाद भी सरकार को शायद अब आज जितने कर्मचारियों की जरूरत बाद में नहीं रह जाएगी, और दैनिक वेतनभोगी, या प्लेसमेंट एजेंसी के मार्फत रखे गए कर्मचारी भी घटते चले जाएंगे। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


