
नक्सलवाद एक भटकी हुई सोच-रंजना चौबे
03-Apr-2026 5:55 PM
2009 का दिन, जब ड्यूटी निभाते हुए शहीद हुए थे पति
रंजना चौबे से तृप्ति सोनी की खास बातचीत
रायपुर, 3 अप्रैल (‘छत्तीसगढ़’)। नक्सलियों के खात्मे को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उन शहीदों की यादें भी ताजा हो गई हैं, जिन्होंने इस लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर किया। इन्हीं में से एक आईपीएस अफसर विनोद चौबे भी थे। शहीद विनोद चौबे की पत्नी श्रीमती रंजना चौबे का दर्द छलक उठा। उनका कहना है कि नक्सलवाद एक भटकी हुई सोच है।
जांबाज अफसर थे विनोद चौबे, जो वर्ष 2009 में नक्सली हमले में शहीद हो गए थे। घटना के 17 साल बाद उनकी पत्नी रंजना चौबे ने ‘छत्तीसगढ़’ से बातचीत में कई भावुक और महत्वपूर्ण पहलू साझा किए।
रंजना चौबे बताती हैं कि नक्सलवाद कोई नई समस्या नहीं थी, यह वर्षों से जारी थी, लेकिन पति की शहादत के बाद यह उनके जीवन से गहराई से जुड़ गई। वे कहती हैं कि जब भी नक्सलियों के मारे जाने, पकड़े जाने या आत्मसमर्पण की खबर मिलती है, तो उन्हें लगता है कि यह उनके पति सहित सभी शहीद जवानों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है। उन्हें संतोष है कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया।
शहादत वाले दिन को याद करते हुए वे बताती हैं कि सुबह उनकी अपने पति से बातचीत हुई थी। वे एक पारिवारिक कार्यक्रम में आने वाले थे, लेकिन बाद में उन्होंने बताया कि वे किसी जरूरी काम में व्यस्त हैं और नहीं आ पाएंगे। कुछ ही देर बाद टीवी पर खबर चली कि एसपी के ड्राइवर को गोली लगी है। उस समय पूरी जानकारी नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे लोगों के आने से सच्चाई सामने आई।
उन्हें बताया गया कि विनोद चौबे पहले एंबुश में फंसे लोगों को बचाने पहुंचे थे। इसके बाद लौटते समय जब उन्होंने देखा कि उनके जवान खतरे में हैं, तो वे दोबारा उन्हें बचाने के लिए वापस गए और इसी दौरान नक्सलियों के हमले में शहीद हो गए।
रंजना चौबे अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि शादी के बाद जब वे नारायणपुर में रहीं, तब नक्सल गतिविधियां बढ़ रही थीं। पुलिस जवान लगातार जंगलों में गश्त करते थे। कई बार भोजन तक की कमी होती थी और मुर्रा-चना खाकर काम चलाना पड़ता था। बाद में कांकेर में हालात इतने गंभीर थे कि घर के भीतर भी हथियार रखने पड़ते थे।
नक्सलवाद पर वे स्पष्ट कहती हैं कि यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक भटकी हुई सोच और गलत विचारधारा की समस्या है। उनका मानना है कि जब तक समाज का सहयोग नहीं मिलेगा, तब तक इस समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है।
गृहमंत्री के बयान पर वे कहती हैं कि इससे उन्हें कुछ हद तक संतोष जरूर मिलता है, लेकिन अभी भी काफी काम बाकी है। जिन क्षेत्रों में नक्सलवाद का प्रभाव रहा, वहां विकास बाधित हुआ है। अब जरूरत है कि वहां के लोगों तक योजनाओं का लाभ पहुंचे और उनके मन से भय समाप्त हो,तभी यह समस्या दोबारा नहीं उभरेगी।
अपने पति को याद करते हुए वे भावुक हो जाती हैं। वे कहती हैं कि वे आज भी उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। उन्हें गर्व है कि वे एक ऐसे बहादुर अधिकारी की पत्नी हैं, जिन्होंने कर्तव्य के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। वे ईश्वर से प्रार्थना करती हैं कि हर जन्म में उन्हें उनका साथ मिले। विनोद चौबे को उनकी वीरता के लिए ‘कीर्ति चक्र’ से सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपने जवानों को बचाने के लिए अपने प्राणों की परवाह नहीं की। आज जब बस्तर में शांति की बात हो रही है, तो यह उनके जैसे शहीदों के बलिदान का ही परिणाम है। अब सबसे महत्वपूर्ण है इस शांति को बनाए रखना और क्षेत्र के लोगों को बेहतर जीवन उपलब्ध कराना जरूरी है।


