USD vs INR: RBI के फैसले से रुपये का यूटर्न लेकिन कितनी टिकाऊ है डॉलर के मुकाबले ये मजबूती ?

NFA@0298
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नई दिल्‍ली। शेयर बाजार में लगातार जारी गिरावट के बीच 2 अप्रैल को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 151 पैसे (लगभग 1.6-1.8%) तक मजबूत हुआ और 93.15 के स्तर पर पहुंच गया। यह पिछले 12 सालों में यानी सितंबर 2013 के बाद की सबसे बड़ी एक दिन की बढ़त है।

रुपया कुछ दिन पहले ही 95.23 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था, लेकिन RBI के सख्त कदमों के बाद सट्टेबाजों की पोजीशन तेजी से खत्म होने से डॉलर की बिकवाली बढ़ी और रुपया उछल पड़ा। रुपये की यह मजबूती आई है नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड्स (NDF) ऑफर करने से रोक के कारण।

आरबीआई ने अब बैंकों और अधिकृत डीलरों (ADs) को सख्त निर्देश दिया है कि वे रुपये से जुड़े NDF अनुबंध न तो रेजिडेंट (भारतीय) ग्राहकों को और न ही नॉन-रेजिडेंट (विदेशी) ग्राहकों को ऑफर करें। साथ ही रद्द किए गए किसी भी फॉरवर्ड अनुबंध (डिलीवरेबल या NDF) को दोबारा बुक करने पर भी रोक है। बैंकों को अपने संबंधित पार्टियों (ग्रुप कंपनियों) के साथ भी ऐसे अनुबंध करने से रोका गया है।

सरल भाषा में इसका मतलब क्‍या है?

NDF (Non-Deliverable Forwards) एक तरह का विदेशी मुद्रा अनुबंध है। पहले लोग रुपये के गिरने पर आसानी से सट्टा लगा पाते थे बिना असली मुद्रा के खरीद-बेच सकते थे। अब आरबीआई ने इस सट्टे का रास्ता बंद कर दिया है। इससे सट्टेबाजों को अपनी पुरानी पोजीशन जल्दी खत्म करनी पड़ रही है, जिससे डॉलर बिक रहा है और रुपया मजबूत हो रहा है।

आरबीआई ने इससे पहले भी कदम उठाए थे, जैसे बैंकों की नेट ओपन रुपया पोजीशन को 100 मिलियन डॉलर  तक सीमित करना।

क्या यह लॉन्ग टर्म में टिकाऊ होगा?

RBI का यह कदम फौरी पर राहत भरा तो है। NDF मार्केट में हलचल है। लोग अपनी पोजीशन खत्म कर रहे हैं, जिससे डॉलर की सप्लाई बढ़ी और रुपया 1.6-1.8 फीसदी तक उछला। यह 149 बिलियन डालर प्रतिदिन के ऑफशोर NDF मार्केट पर भी असर डाल रहा है। कई बैंक अब 30-50 बिलियन डालर तक की पोजीशन अनवाइंड करने की प्रक्रिया में हैं।

लेकिन लॉन्ग टर्म में यह पूरी तरह टिकाऊ नहीं माना जा रहा। क्‍योंकि यह सट्टेबाजी को रोकता है, लेकिन रुपये की गिरावट के मूल कारण जैसे उच्च तेल आयात, व्यापार घाटा, विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना, ग्लोबल अनिश्चितताएं नहीं हल करता।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह अस्थायी राहत है। अगर बुनियादी समस्याएं बनी रहीं, तो रुपया फिर दबाव में आ सकता है। आरबीआई को आगे भी डॉलर बेचने या अन्य नीतिगत कदम उठाने पड़ सकते हैं।

अब आगे क्‍या?

आरबीआई के कदम से रुपये में मजबूती भले ही आ गई हो, लेकिन डॉलर की कमजोरी के वैश्विक संकेत नहीं हैं। ईरान पर हमले को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बायान के बाद से ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 5 फीसदी उछलकर 106 डालर पर पहुंच गई हैं। क्रूड की ऑयल की कीमतों में इजाफे का मतलब यह है कि डॉलर का मजबूत होना क्‍योंकि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में ज्‍यादातर कच्‍चे तेल की खरीद फरोख्‍त डॉलर में ही होती है। 

2013 में क्‍या हुआ था?

रुपये ने तेजी के मामले में 12 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है। ठीक यही स्थिति सितंबर 2013 में भी देखी गई थी, जब रुपया भारी गिरावट के बाद अचानक मजबूत हुआ था। उस समय भी आरबीआई के हस्तक्षेप और बाजार में सट्टेबाजी रुकने से रुपये में तेज उछाल आया था।

अगस्त 2013 के अंत में भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर 68.85 रुपये प्रति डॉलर तक गिर गया था। जनवरी 2013 में रुपया 53-55 के आसपास था, यानी महज 8-9 महीनों में रुपये ने 20% से ज्यादा मूल्य खो दिया था। 28 अगस्त 2013 को एक दिन में ही रुपया 3.7% तक टूटा, जो उस समय 15-20 साल का सबसे बड़ा एक दिन का गिरावट रिकॉर्ड था। सितंबर 2013 में स्थिति पलटी। पूरे महीने में रुपया लगभग 9% मजबूत हुआ। कुछ दिनों में 1.6% से ज्यादा (106-161 पैसे) की बढ़त दर्ज की गई। सितंबर के अंत तक रुपया 61-62 के स्तर पर पहुंच गया। यह उस साल की सबसे बड़ी राहत वाली खबर बनी।

2013 की गिरावट “Taper Tantrum” नामक वैश्विक संकट से शुरू हुई थी। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बेन बर्नानके ने मई 2013 में संकेत दिया कि वे QE (मुद्रा छापना) कार्यक्रम को कम (टेपर) करेंगे। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं से विदेशी निवेशकों का पैसा तेजी से निकलने लगा। भारत सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ क्योंकि उस समय भारत को कमजोर पांच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया गया था।

तत्कालीन आरबीआई गवर्नर दुव्वूरी सुब्बाराव और बाद में रघुराम राजन ने डॉलर बेचे, तेल कंपनियों को डॉलर लोन दिए जिससे बाजार में डॉलर की मांग कम हुई। बैंकों को विशेष स्वैप सुविधाएं दी गईं। सट्टेबाजी पर कुछ नियंत्रण लगाए गए। अनावश्यक आयात खासकर सोने पर सख्ती लगाई गई। आरबीआई ने तेल कंपनियों को डॉलर लोन देकर बाजार से डॉलर की भारी मांग हटा दी, जिससे रुपया तुरंत संभला। पूरे सितंबर में रुपया दुनिया की सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया था।



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