नई दिल्ली। अखिल भारतीय बीमा कर्मचारी संघ (AIIEA) ने आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित निजीकरण का विरोध करते हुए इसे अनुचित और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताया है।
संगठन ने आईडीबीआई बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों के संयुक्त मंच द्वारा 9 मार्च को प्रस्तावित देशव्यापी भूख हड़ताल और प्रदर्शन का समर्थन किया है।
संघ के अध्यक्ष धर्मराज महापात्र और महासचिव श्रीकांत मिश्रा ने जारी प्रेस वक्तव्य में कहा कि केंद्र सरकार द्वारा आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया को तत्काल रोका जाना चाहिए।
नेताओं ने बताया कि वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में शेयर बिक्री सहित लगभग 80,000 करोड़ रुपये के विनिवेश का लक्ष्य तय किया गया है। वर्तमान में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) मिलकर आईडीबीआई बैंक में करीब 95 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। सरकार बैंक में अपनी 60.72 प्रतिशत इक्विटी बेचने की तैयारी कर रही है।
बताया गया कि वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा हाल ही में विनिवेश प्रक्रिया की समीक्षा भी की गई है, जिससे इसे तेज किए जाने के संकेत मिलते हैं।
एआईआईईए नेताओं का कहना है कि यह निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि आईडीबीआई बैंक लगातार लाभ में है और वित्तीय एवं परिचालन मापदंडों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज कर चुका है। उनका तर्क है कि लाभकारी स्थिति में चल रहे बैंक के निजीकरण का कोई औचित्य नहीं बनता।
प्रेस बयान में कहा गया कि वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री ने संसद में आश्वासन दिया था कि सरकार आईडीबीआई में कम से कम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखेगी। ऐसे में मौजूदा विनिवेश प्रस्ताव उस आश्वासन के विपरीत है।
संघ ने यह भी कहा कि एलआईसी को बैंक में अपनी हिस्सेदारी कम करने और प्रबंधन नियंत्रण छोड़ने के लिए कहना जल्दबाजी भरा कदम है। संगठन के अनुसार, एलआईसी अन्य बैंकों की तरह बीमा-बैंकिंग साझेदारी का लाभ लेते हुए निवेश बनाए रख सकता था।
AIIEA ने आरोप लगाया कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण की नीति को आक्रामक रूप से आगे बढ़ा रही है, जो राष्ट्रीय हितों की अनदेखी है। संगठन ने ग्राहकों, अर्थव्यवस्था और आम जनता के हित में आईडीबीआई बैंक के निजीकरण प्रस्ताव को वापस लेने की मांग की है और कर्मचारियों के आंदोलन के प्रति एकजुटता जताई है।

