अरविंद केजरीवाल समेत सभी 23 आरोपी बरी, फिर तोता साबित हुई सीबीआई

NFA@0298
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नई दिल्ली। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा अरविंद केजरीवाल समेत सभी 23 आरोपियों को दिल्ली आबकारी नीति मामले में बरी करने का फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था और राजनीतिक नैतिकता के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण घटना है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि मामले में कोई ‘ओवरआर्किंग कांस्पिरेसी’ या आपराधिक इरादा साबित नहीं हुआ, जांच एजेंसी सीबीआई के सबूत अपर्याप्त और आंतरिक विरोधाभासों से भरे पाए गए। यह फैसला न केवल केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के लिए व्यक्तिगत राहत है, बल्कि यह राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों को भी बल प्रदान करता है।यह मामला 2021-22 की दिल्ली आबकारी नीति से जुड़ा था, जिसे बाद में रद्द कर दिया गया। 

आरोप थे कि नीति को निजी शराब लॉबी के पक्ष में बनाया गया और इससे करोड़ों का घोटाला हुआ। सीबीआई और ईडी ने केजरीवाल, सिसोदिया सहित कई लोगों को गिरफ्तार किया, जेल भेजा और लंबी कानूनी लड़ाई चली। केजरीवाल को कई महीनों तक जेल में रहना पड़ा, जिस दौरान उनकी छवि पर गहरा असर पड़ा। फैसले के बाद केजरीवाल का भावुक होना और ‘मैं कट्टर ईमानदार हूं’ कहते हुए रो पड़ना उनकी उस पीड़ा को दर्शाता है जो राजनीतिक संघर्ष में अक्सर नजरअंदाज हो जाती है। 

कोर्ट का यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता का प्रमाण है। जहां एक ओर जांच एजेंसियों पर सवाल उठे कि क्या वे राजनीतिक दबाव में काम कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर यह याद दिलाता है कि आरोप लगाना आसान है, लेकिन साबित करना कठिन। कोर्ट ने सीबीआई की जांच में खामियों की कड़ी आलोचना की और जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश भी की। यह कदम भविष्य में जांच एजेंसियों को अधिक सतर्क और निष्पक्ष रहने की चेतावनी है।हालांकि, सीबीआई ने फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया है, जो बताता है कि कानूनी लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई। राजनीतिक रूप से यह फैसला आम आदमी पार्टी के लिए बड़ा मनोबल बढ़ाने वाला है। केजरीवाल पहले ही दावा करते आए थे कि यह ‘राजनीतिक साजिश’ है। 

अब वे इसे ‘सत्य की जीत’ बता रहे हैं। भाजपा के लिए यह झटका है, क्योंकि पिछले वर्षों में इस मामले को भ्रष्टाचार के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में पेश किया गया था।यह घटना भारतीय लोकतंत्र के लिए सबक है। राजनीतिक विरोधियों पर गंभीर आरोप लगाकर उन्हें जेल भेजना और मीडिया ट्रायल चलाना आसान रास्ता लग सकता है, लेकिन जब अदालत सबूतों के आधार पर फैसला देती है तो सच्चाई सामने आ ही जाती है। ऐसे मामलों में लोकतंत्र की मजबूती तभी है जब न्यायपालिका स्वतंत्र रहकर फैसला करे, न कि राजनीतिक दबाव में। 

अंत में, यह फैसला हमें याद दिलाता है कि ईमानदारी और पारदर्शिता राजनीति का आधार होना चाहिए। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से ऊपर उठकर विकास और जनकल्याण पर ध्यान देना ही सच्ची सेवा है। उम्मीद है कि सभी दल इस फैसले से सबक लेंगे और राजनीति को अधिक स्वच्छ बनाने की दिशा में काम करेंगे। न्याय की यह जीत न केवल केजरीवाल की, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की है।

 



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