रोजगार के लिए सड़क पर

NFA@0298
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समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि अगर सड़कें खामोश हो जाएं, तो संसद आवारा हो जाएगी। लोहिया ने जिस दौर में यह कहा था, तबसे लेकर आज के हालात में जमीन आसमान का अंतर आ चुका है। इसका कुछ अंदाजा छत्तीसगढ़ के आज के हालात से लगाया जा सकता है, जहां इन दिनों नौकरी या रोजगार को लेकर विभिन्न वर्गों के बेबस हजारों लोग हफ्तों से सड़कों पर हैं, लेकिन सरकार उनकी सुन नहीं रही है।

प्रशासन की बेदर्दी का यह हाल है कि सोमवार को राज्य की राजधानी रायपुर से नजदीक स्थित अभनपुर में छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (सीएएफ) की आठ साल पहले ली गई भरती परीक्षा की प्रतीक्षा सूची में शामिल एक अभ्यर्थी जब प्रदर्शन के दौरान बेहोश हो गए तो वहां मौजूद अधिकारियों ने शर्मनाक ढंग से उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस देने से इनकार कर दिया! नतीजतन उसके साथियों ने उसे अपने कंधों पर उठाकर छह किलोमीटर दूर स्थित अस्पताल पहुंचाया।

यह केवल एक घटना नहीं है, लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जब देश के विभिन्न हिस्सों में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी जायज मांगों को लेकर प्रदर्शन करते युवाओं पर लाठियां बरसाई गईं या पानी की बौछारें फेंकी गई या आंसू गैस के गोले छोड़े गए।

रोजगार के आंकड़ों पर न जाएं तब भी, यह बात किसी से छिपी नहीं है कि युवाओं को सरकारी नौकरियों में चयनित होने के बावजूद नियुक्ति के लिए कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। यही नहीं, जरूरी अहर्ता परीक्षाएं पास करने और यहां तक कि प्रतीक्षा सूची में आने के बावजूद उनकी लड़ाइयां कम नहीं होतीं।

दरअसल व्यवस्था की इन सारी विसंगतियों को दूर करना सरकार की प्राथमिकता में कहीं नजर ही नहीं आता। आखिर क्या वजह है कि शिक्षक बनने के लिए जरूरी अहर्ता डीईएड पास करने के बावजूद और तीन-चार साल के इंतजार के बावजूद अभ्यर्थियों को नियुक्तियां क्यों नहीं दी जातीं?

इस पूरे परिदृश्य की चर्चा सरकारी सेवाओं के सहायक के तौर पर काम करने वालों की मुश्किलों और उनके संघर्शों के जिक्र के बिना पूरी नहीं हो सकती। मसलन, छत्तीसगढ़ में मध्याह्न भोजन बनाने वाली रसोइयों की बात हो या आशा कार्यकर्ताओं या मितानिनों की बात हो। इन सेवाओं सो जुड़ी महिलाओं और पुरुषों को सरकारी कर्मचारी नहीं माना जाता और उन्हें जो मानदेय मिलता है वह बेहद नाकाफी है। सामाजिक सुरक्षा तो बहुत दूर की बात है। दूसरी ओर जनगणना से लेकर स्वास्थ्य सर्वे यहां तक कि हाल ही में हुए मतदाता सूचियों के गहन संसोधन (एसआईआर) जैसी कवायदों में इन्हीं कार्यकर्ताओं को लगा दिया जाता है।

इससे भी पीड़डादायक यह है कि महीनों से अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे या धरना दे रहे युवाओं से सरकार बात तक नहीं करना चाहती।

यह रिपोर्ट देखें



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