राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने दो दिन पहले विकसित भारत यंग लीडर डॉयलॉग नामक एक कार्यक्रम में युवाओं को संबोधित करते हुए अतीत में भारत पर हुए हमलों को याद करते हुए जिस तरह से ‘प्रतिशोध’ लेने की बात की है, वह बेहद विचलित करने वाली बात है।
81 बरस के डोभाल ने कहा कि अतीत में हम पर आक्रमण हुए, हमारे गांव जले, हमारी सभ्यता को खत्म किया गया…हमारे मंदिरों को लूटा गया… हम असहाय देखते रहे। यह इतिहास हमें चुनौती देता है। इसके बाद उन्होंने कहा कि भारत के हर युवक में आग होनी चाहिए और हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है….।
अजीत डोभाल ने एक आईपीएस के रूप में अपना करिअर शुरू किया था और वह इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के प्रमुख भी रह चुके है। 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद देश के एनएसए हैं। जाहिर है, उनकी पहचान एक खुफिया अधिकारी या जासूस की रही है; इतिहासकार की नहीं।
आखिर डोभाल किस इतिहास का प्रतिशोध लेना चाहते हैं? भारत का अतीत मुस्लिम या मुगल शासकों के भारत पर आक्रमण से पहले से ही संघर्षपूर्ण रहा है और इसके दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध हैं।
भारत के इतिहास में अभी यह बहस थमी नहीं है कि आर्य यहां पहले से थे या बाहर से आक्रमणकारियों के रूप में आए। पर्सिया से लेकर एलेक्जेंडर तक का इतिहास यूनानियों, हुणों, मोहम्मद बिन कासिम और मुगलों के यहां आने से पहले का इतिहास है। अंग्रेज तो सबसे आखिर में आए।
यही नहीं, सैकड़ों रियासतों में बंटे देश में शासकों के आपसी हमले यहां तक कि मंदिरों तक पर हमले करने के प्रमाण भी मौजूद हैं।
आखिर अजीत डोभाल किस इतिहास और किन हमलों की बात कर रहे हैं और वे किनसे प्रतिशोध लेना चाहते हैं?
यदि यही उनका इतिहास बोध है, तो यह बहुत दयनीय है। बल्कि कहना तो यह चाहिए कि यह चिंता का कारण होना चाहिए कि जिस व्यक्ति पर देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा रणनीतियों की जिम्मेदारी है, वह देश के युवाओं में इतिहास की किन्हीं गलतियों का बदला लेने के लिए प्रतिशोध की आग देख रहे हैं।
अजीत डोभाल ने अपने भाषण में यह भी कहा है कि देश के लिए भगत सिंह फांसी पर चढ़ गए, सुभाषंद्र बोस ने संघर्ष किया और महात्मा गांधी ने सत्याग्रह किया….। इन तीनों महान विभूतियों का संघर्ष पिछली सदी की घटना है, जब देश में अंग्रेजों का राज था। यह बताने की जरूरत नहीं है कि गांधी का सत्याग्रह प्रतिशोध से नहीं उपजा था।
बेशक युवाओं में ‘इतिहास बोध’ की गहरी समझ होनी चाहिए कि आखिर ये देश कैसे बना? कैसे हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों ने इसके लिए लड़ाइयां लड़ीं, संघर्ष किए।
वास्तविकता यह है कि देश ने अजीत डोभाल को जो जिम्मेदारी सौंपी है, उसके लिहाज से उनका रिकॉर्ड कोई बहुत अच्छा नहीं है; फिर चाहे 2019 में पुलवामा में सुरक्षा बलों पर हुआ आतंकी हमला हो या पिछले साल पहलगाम में सैलानियों पर हुआ आतंकी हमला।

