अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा करने की कार्रवाई कुछ और नहीं लैटिन अमेरिका में की जा रही दबंगई का खुला प्रदर्शन है, जिसे किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मादुरो की रहनुमाई में वेनेजुएला के समुद्री रास्ते से मादक पदार्थों की तस्करी का हवाला देकर की गई इस कार्रवाई के पीछे की मंशा तो खुद ट्रंप ने यह कहते हुए साफ कर दी है कि वे अब वेनेजुएला और काराकास के तेल सेक्टर को चलाएंगे।
बीते सालभर से दुनियाभर में युद्ध रुकवाने का दावा करने वाले और खुद को शांति का मसीहा बताने वाले ट्रंप का असली चेहरा अब दुनिया के सामने है। अंतरराष्ट्रीय कायदों की धज्जियां उड़ाकर की गई यह कार्रवाई सीधे सीधे एक स्वतंत्र राष्ट्र की संप्रभुता पर हमला है।
बेशक, निकोलस मादुरो पर अपने देश में जनमत पर कब्जा करने और विपक्ष को ध्वस्त कर देने के आरोप हैं। अकूत तेल संपदा के बावजूद वेनेजुएला को आर्थिक बदहाली में बदल देने के भी वही जिम्मेदार हैं, जिसकी वजह से करीब 80 लाख लोग देश छोड़कर जा चुके हैं।
इसके बावजूद ट्रंप और उनकी सरकार को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वे पूरे एक देश को अपने नियंत्रण में ले लें। ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी सुरक्षा बलों ने जो कुछ किया है, वह अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की बेबसी को भी दिखाता है।
संयुक्त राष्ट्र तो 2003 में तभी नाकारा साबित हो गया था, जब अमेरिका के बुश प्रशासन ने इराक में कथित तौर पर जनसंहार करने वाले जैविक हथियारों के नाम पर सद्दाम हुसैन का तख्ता पलट कर उस देश को लगभग तबाह कर दिया।
यह भ्रम दूर हो जाना चाहिए कि अमेरिका या डोनाल्ड ट्रंप लोकतांत्रिक हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं, जैसा कि अफगानिस्तान से लेकर लीबिया या इराक में दावे किए गए थे और अब वेनेजुएला को लेकर दावे किए जा रहे हैं।
याद दिलाने की जरूरत नहीं कि महज तीन महीने पहले अक्टूबर में शांति का नोबेल जीतने वाली वेनेजुएला की विपक्ष की नेता मचाडो ने किस तरह ट्रंप की रहनुमाई स्वीकार कर ली थी।
दरअसल वेनेजुएला में जो कुछ हुआ है, उसे वैश्विक बिरादरी के लिए चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए।
यह भी पढ़ें : वेनेजुएला पर ऑपरेशन को सफल बनाने के लिए वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयार्क टाइम्स पर अमेरिकी हमले की खबर छिपाने का आरोप

