छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार में जिंदल समूह की प्रस्तावित कोयला खदान के विरोध में चल रहे स्थानीय ग्रामीणों के आंदोलन के दौरान एक महिला पुलिस कर्मी के साथ की गई बर्बरता ने स्तब्ध कर दिया है।
यहां जनसुनवाई के विरोध में पिछले कई हफ्ते से ग्रामीण आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन यह आंदोलन 27 दिसंबर को हिंसक हो गया था और बेकाबू आंदोलनकारियों ने वहां तैनात पुलिस कर्मियों पर हमले किए थे, जिसमें एक पुलिस अधिकारी सहित कई लोगों को चोटें आई थीं। उसी दिन वहां मौजूद एक महिला पुलिस कर्मी का एक वीडियो भी अब सामने आया है, जिसमें वह हिंसक भीड़ से अपनी रक्षा की गुहार लगाती नजर आ रही हैं।
यह कैसा समाज बन गया है कि सैकड़ों लोगों की भीड़ में से एक भी शख्स एक महिला के साथ की जा रही बर्बरता को रोकने के लिए आगे नहीं आया? दुखद यह भी है कि आंदोलनकारियों में अनेक महिलाएं भी शामिल थीं। इस हैवानियत ने मणिपुर में दो महिलाओं के साथ की गई ऐसी ही बर्बरता की याद दिला दी है।
तमनार और उसके आसपास के गांवों के लोगों की एक बड़े औद्योगिक घराने और उसे दी जा रही कोयला खदान के खिलाफ चल रही लड़ाई अपनी जगह है। इस कोयला खनन परियोजना से हजारों लोगों उजड़ सकते हैं। जाहिर है, यह आंदोलन अस्तित्व बचाने की लड़ाई से उपजा है।
दरअसल ऐसे हर नेतृत्वविहीन आंदोलन के अराजक हो जाने के खतरे अधिक होते हैं। तमनार में भी उपजा आंदोलन संगठित न होकर भीड़ में बदल गया, लेकिन ऐसी घटना व्यापक जनहित के आंदोलन को कमजोर कर देती है।
इसके अलावा इस पर भी गौर करने की जरूरत है कि सरकारों के कड़े और जनविरोधी फैसलों के बचाव की जिम्मेदारी अक्सर पुलिस और सुरक्षा बलों पर डाल दी जाती है। दरअसल आम लोगों के सामने सरकार का क्रूर चेहरा ये पुलिस कर्मी ही होते हैं।
तमनार की घटना के सिलसिले में कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं। महिला पुलिस कर्मी के साथ की गई बर्बरता के लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई ही जानी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही उन प्रशासनिक अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए, जिन्होंने तमनार में बिगड़ते हालात को नियंत्रित करने में चूक की।

