लालटेन से मछली पालन तक, आदिवासी जीवन में सहयोग और सम्मान की अनूठी परंपरा

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छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित अबूझमाड़ से लौटे डाउन टू अर्थ, हिंदी के एसोसिएट एडिटर अनिल अश्विनी शर्मा की रिपोर्ट-

आमाटोला गांव के लगभग हर घर के आंगन के पास ही एक छोटा तालाब बना हुआ है। ग्रामीण इसमें बारिश का पानी एकत्रित करते हैं। वे इस पानी से साल भर अपना काम चलाते हैं। अगर इस बीच तालाब का पानी कम भी हो गया तो आसपास बहने वाले नालों से पानी लेकर अपने तालाब को लबालब रखते हैं।

लक्ष्मण मंडालवी के घर बने तालाब की उपयोगिता के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि हम लोग इसमें मछली पालन करते हैं। ध्यान रहे कि इसमें काफी छोटी मछलियां होती हैं। डीटीई की टीम ने देखा कि हर तालाब के बीचोंबीच रस्सी से बंधा हुआ एक लालटेन लटका रहता है।

लालटेन रातभर जलता रहता है। इसके बारे में पूछने पर लक्ष्मण ने बताया कि शहरी लोगों की तरह हमारे पास मछली को खिलाने के लिए कृत्रिम दाने नहीं होते हैं। न ही हमारे पास इतने पैसे हैं कि दाने खरीद कर मछलियों को खिलाएं। हमारे पुरखों के समयसे यह परंपरा चली आ रही है। यह कहना अधिक मुनासिब होगा कि उन्होंने हमारे पिता को सिखाया और पिता ने हमें सिखाया।

वे आगे बताते हैं कि आपने देखा होगा कि दिवाली के आसपास शहरों में जहां बल्ब या ट्यूबलाइट जलते हैं वहां बड़ी संख्या में कीड़े उड़ते हुए नजर आते हैं। कुछ समय बाद ये कीड़े जमीन पर मरे हुए नजर आते हैं। शहरी लोगों के लिए ये किसी काम के नहीं, लेकिन हम इन कीड़ों का भी उपयोग करते हैं। रात में पानी के ऊपर जलती हुई लालटेन जला कर छोड़ देते हैं तो जंगल में रहने वाले कीड़े उडक़र इस रोशनी के आसपास मंडराने लगते हैं।

कुछ समय बाद वे पानी में गिर जाते हैं। इस तरह मछली के लिए चारे का इंतजाम हो जाता है। हालांकि लक्ष्मण ने कहा कि गांव के कई लोगों के पास रात में लालटेन जलाने के लिए कैरोसिन नहीं होती है। उन परिवारों को हम अपने हिस्से से मछली की आपूर्ति करते हैं।

उनके पिता मंगड़ू कहते हैं कि पिछले साल मेरे पास के खेत में धान की फसल सुअरों ने बर्बाद कर दी थी। ऐसे में मैंने और गांव के चार और परिवारों ने उस परिवार को इतनी धान दी कि अगली फसल तक उन्हें खाने की कमी न हो।

ऐसे काम के लिए मंगड़ू के घर आधा दर्जन परिवारों के मुखिया एकत्रित हुए। उन्होंने इस बात पर चर्चा की कि गांव में एक परिवार का घर भारी बारिश से ढह गया है, तो ऐसे में उसकी मदद कैसे की जाए। तय किया गया कि कैसे हम बारी-बारी से उस परिवार के पास जाकर उसके घर के निर्माण में मदद करें।

घर के निर्माण के लिए लकड़ी काटने से लेकर मिट्टी बनाने तक की एक लंबी प्रक्रिया होती है। मदद करने वाले परिवार लोगों की कुशलता को देख कर काम बांट लेते हैं।

ध्यान रहे कि आदिवासी समुदाय में आज भी ऐसे स्थिति है कि गांव में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं रहता है। उनके घर-परिवार की दिक्कत पूरे समुदाय की दिक्कत होती है। इस तरह की सहकारिता आदिवासियों के खून में बसी हुई है। 

आदिवासी समाज का ताना-बाना सहकारिता में इस तरह गुंथा हुआ है कि आधुनिक समाज भी इनसे सामुदायिक संवेदनशीलता की सीख ले सकता है।

लक्ष्मण कहते हैं कि मैं 45 साल का हो गया हूं। बचपन से लेकर आज तक मैंने कभी अपने इलाके में नहीं सुना कि यहां किसी महिला के साथ बलात्कार या किसी और तरह की बदसलूकी हुई हो, या किसी महिला का अपमान किया गया हो। जबकि मैं जब भी शहर जाता हूं और अखबार देखता हूं तो उसमें ज्यादातर खबरों में महिलाओं पर अत्याचार की बातें सामने आती हैं।

वे कहते हैं कि शहरी लोग हमें जंगली कह कर पुकारते हैं। लेकिन मैं कहता हूं कि यदि दोनों समाज की तुलना की जाए तो साफ दिख जाता है कि कौन सभ्य है और कौन असभ्य। उनके पिता कहते हैं कि हमारे गांव में किसी विधवा, बेसहारा या बुजुर्गों का तिरस्कार नहीं होता है। यहां कोई पराया नहीं होता सब अपने ही होते हैं। (जारी…)  (https://hindi.downtoearth.org.in/)



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