26 नवंबर 2025 को बिहार राज्य महिला आयोग के नेतृत्व में 5 नाबालिग लड़कियों को बरामद किया गया। ये लड़कियां विभिन्न थिएटरों में जबरन काम करवाए जाने और प्रताड़ना का शिकार हो रही थीं। उन्हें जबरन नचाया और प्रताड़ित किया जा रहा था। बरामद लड़कियों में उत्तर प्रदेश की 2 लड़कियां, मध्य प्रदेश की 1 लड़की, छत्तीसगढ़ की 1 लड़की, नेपाल की 1 लड़की शामिल हैं। इन लड़कियों को एशिया के सबसे बड़े पशु मेले से बरामद किया गया है। बिहार का सोनपुर मेला, जिसे हरिहर क्षेत्र मेला भी कहते हैं, गंगा-गंडक संगम पर कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है।
सांस्कृतिक आयोजन के नाम पर भौंडा प्रदर्शन

सोनपुर मेला के नाम से सर्च करने पर सोशल मीडिया में स्टेज पर एक साथ डांस कर रही 20 से 25 लड़की का वीडियो देखने को मिल जाता है। जी हां..सोनपुर मेला का नाम सुनते ही जेहन में हाथी-घोड़ों की तस्वीरें आती हैं। अब यह मुख्य रूप से घोड़े, बकरी, सरकारी टेंट, खेल तमाशा, थियेटर और पिकनिक स्पॉट बन कर रह गया है।
बिहार की राजधानी पटना से करीब 25 किलोमीटर और हाजीपुर से 3 किमी दूर सोनपुर में गंडक के तट पर लगने वाले इस पशु मेले का स्वरूप बदलता चला गया और पशु मेला की जगह थिएटर इसकी पहचान बन गया है।
“अश्लील भोजपुरी गाने पर शरीर के सामने डांस करना मजबूरी के अलावा क्या होगा? जरूरत हैं तो कर रही हूं। कपड़ों के अंदर हाथ डाल देते है। शिकायत कोई सुनने वाला नहीं है।”
“हमें ज्यादा से ज्यादा शरीर दिखाने के लिए कहा जाता। बदले में मुझे चंद हजार रुपए मिलते हैं और थिएटर वाला अमीर होता है। पब्लिक डिमांड करती थी, गंदे इशारे कर प्राइवेट पार्ट दिखाने को बोलती है । सब कुछ देखना और सहना पड़ता है।”
नाम न बताने की शर्त पर थिएटर की दो नर्तकियां अपनी अपनी यही कहानी बताती हैं। उनमें से एक नेपाल और एक बिहार की है। 26 नवंबर को थिएटर से लड़कियों के बरामदी के बाद सोनपुर मेले में चल रहे 6 थियेटरों में से 2 का लाइसेंस रद्द कर दिया गया है।
बिहार की प्रसिद्ध गायिका प्रिया मलिक और स्वाति मिश्रा मीडिया से बात करते हुए इस मेले में थिएटर पर कहती हैं कि, ”बाबा हरिहरनाथ के नाम पर आयोजित इतने बड़े मेले में लड़कियों के अश्लील डांस का प्रोग्राम भी होता है, जो एक बड़ी विकृति है और एक प्रथा के रूप में स्थापित सी हो गई है। सोशल मीडिया फीड में जब ऐसा वीडियो देखने को मिलते हैं तो हमें बहुत शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। संस्कृति को सुंदर और समाज के लिए सकारात्मक बनाए रखने के लिए उसमें संलग्न इस तरह की विकृतियों की भरपूर आलोचना होनी चाहिए और इससे मुक्ति के उपाय सोचने चाहिए।”
सोनपुर से निकट हाजीपुर के रहने वाले पंकज यादव बताते हैं कि, “वर्ष 2017 में प्रशासन ने थिएटर को लाइसेंस देने से मना किया तो दुकानदार और व्यापारियों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया था। हरिहरनाथ मंदिर के पुजारी भी इस विरोध में शामिल थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि थिएटर बंद होने से लोगों की संख्या में गिरावट आ गई है। इसके बाद थिएटर खोला गया था।”
मेला कमेटी के मुताबिक मेले के साथ थियेटर की परम्परा बदस्तूर जारी है। सोनपुर मेले के थियेटरों का व्यावसायिक पहलू भी बेहद अहम है। मेले में थियेटर नहीं होने से व्यवसाय पर बहुत फर्क पड़ता है।
पहली बार लगी पुस्तक की दुकान
सोनपुर मेला यानी पशुओं का मेला.. लेकिन मेला में पशु कितने हैं? पशु बेचने वाले की क्या स्थिति है? इन सवाल के जवाब को तलाशते हुए हमने पशु बेचने वाले व्यापारियों से बात की। हाजीपुर के रहने वाले पंकज यादव बताते हैं कि,” गाय और भैंस की बिक्री तो यहां बहुत कम होती है। जो बिहार के किसानों के लिए सबसे मुख्य है। घोड़ा,बकरी और कुत्ता की बिक्री ठीक-ठाक होती है।”
राजस्थान के व्यापारी अरमान खान पिछले कई वर्षों से सोनपुर मेला व्यवसाय करने आते है। वह बताते हैं कि,” मैं बकरी का व्यवसाय करता हूं। बिक्री ठीक-ठाक हो रही है। पशु मेला में पशु की बिक्री का रौनक थोड़ा कम है।”
मेला घूमने आए लोगों के मुताबिक घोड़े की संख्या बहुत कम है, हाथी पूरी तरह नदारद हैं और गायों के लिए बने केंद्र भी खाली पड़े हैं। कभी पशुओं की खरीद-बिक्री के लिए मशहूर रहा यह मेला अब एक बड़े सांस्कृतिक और पर्यटन उत्सव का रूप ले चुका है। इस बार सोनपुर मेला में पहली बार पुस्तक की दुकान भी लगी है।
स्थानीय लोगों को सुनिए

35 वर्षीय श्याम कुंवर बताते हैं कि “दूर-दूर से किसान यहां बैलों की खरीद-बिक्री के लिए आते थे। पशुओं के नाम पर मेला में घोड़ों, बकरियों और कुत्तों की खरीद-बिक्री होती है। पशु मेला में कोई रौनक नहीं है। थिएटर इसका मुख्य केंद्र बन चुका है। अब थिएटर के चलते ज्यादा भीड़ जुटती है। आचार और झुमका बिकने वाला मेला बन गया है। सरकार के द्वारा सोशल मीडिया पर जितना इस मेल को प्रमोट किया जाता है, उतना काम नहीं किया जाता है।”
52 वर्षीय हरिहर यादव का कहना है कि “हाथी बाजार खत्म होने से थोड़ा सा आकर्षण कम हुआ है। थिएटर का सोशल मीडिया पर ज्यादा फोकस रहता है। जीविका के माध्यम से कई क्षेत्रों का स्थानीय प्रोडक्ट और भोजन की बिक्री बढ़ी है। बिहार से बाहर इसका प्रचार ज्यादा कराया जा सकता था।”
सोनपुर मेला में बिहार सरकार के कई विभागों का स्टॉल भी लगा हुआ है। इन स्टॉल पर विभाग के द्वारा अपनी योजना की जानकारी एवं अपनी उपलब्धि बताई जा रही है। आरटीआई एक्टिविस्ट अनिल जी बताते हैं कि ”बिहार में पहले मेला में सरकारी हस्तक्षेप उतना नहीं होता था। अभी बिहार में जितना मेला लगता है, सभी जगहों पर सरकारी स्टॉल काफी लगता है।”
बिहार पर्यटन विभाग के मुताबिक यहां पांच सितारा होटल की सुविधा वाले स्विस कॉटेज पर्यटकों के बीच आकर्षण के केंद्र हैं। देशी पर्यटकों के लिए इसका किराया 3,000 प्रति रात और विदेशी पर्यटकों के लिए 5,000 प्रति रात निर्धारित है। 1 दिसंबर 2025 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सोनपुर मेला घूमने गए थे।
आज की स्थिति को देखें तो अब यह पशुओं नहीं बल्कि नर्तकियों और सरकारी पंडालों का मेला ज्यादा लग रहा है।
बादशाह औरंगजेब ने सोनपुर मेले को संरक्षण दिया
‘बिहार का सोनपुर मेला क्या केवल पशु मेला है? इस सवाल के जवाब पर पटना के सुनील झा बताते हैं कि,”नारायणी/गंडक और गंगा के संगम स्थल पर बसा सोनपुर अपने उपजाऊ मैदानों के चलते प्रागैतिहासिक काल से ही मानव बस्तियों का गवाह रहा है। गंगा और नारायणी दो प्रमुख जलमार्गों यानी उस जमाने के हाईवे के ठीक क्रॉसिंग पर स्थित होने के कारण सोनपुर इस क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र भी था। चीन, तिब्बत और नेपाल से व्यापारी जो भी सामान लाते, सबसे पहले वह सोनपुर के व्यापारियों और तब के राजा, नवाब और जमींदारों को खरीदने के लिए मिलता।”
आगे सुनील झा बताते हैं, “खैर, चूंकि सोनपुर एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र था तो यहां मोल भाव करने वाले वणिक और उनके सामान और उनके प्राणों की दस्युओं से रक्षा करने एवं उसके एवज में कर वसूलने वाले शासकों के साथ पूजा पाठ कराने वाले पुजारियों का भी जमघट हुआ। इसलिए आप देखेंगे कि यहां हिंदुओं का प्रसिद्ध हरिहरनाथ मन्दिर भी है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन से ही यहां पर मेला लगने की परम्परा रही है। कहा जाता है कि यह विश्व का सबसे प्राचीन पशु मेला है। पर यह पशु मेला ही क्यों, व्यापारिक केन्द्र होने के कारण यह हर किस्म की चीजों की बिक्री का केंद्र रहा होगा। रेशम, पशु और शायद गुलामों के रूप में मनुष्य भी।” सुनील झा यूनिसेफ से भी जुड़े रहे हैं।
बहुजन विचारधारा के लेखक क्रांति कुमार सोनपुर मेला के बारे में लिखते हैं कि,”सोनपुर मेले की शुरुआत आज से 2500 साल पहले मौर्य काल में हुई थी। मौर्य काल में यह क्षेत्र बड़ा व्यापारिक केंद्र था। मौर्य काल वो दौर था जब ना जाति थी ना संस्कृत भाषा। महान सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार और महान अशोक के समय बिहार बंगाल का इलाका बड़े व्यापार मार्गों से जुड़ा था। दुनिया का सबसे बड़ा पशु मेला लगता था। हाथी, शेर, बाघ, हिरण के अलावा घोड़ा, बैल, गाय भैंस गधा और अन्य जानवर बिका करते थे। मुगल काल में बादशाह औरंगजेब ने सोनपुर मेले को संरक्षण दिया। व्यापारियों को सुरक्षा मिलती थी। बाद में ब्रिटिश साम्राज्य ने भी सोनपुर मेले की विशेषता को देखते हुए इसकी व्यापारिक गतिविधियों में कोई कमी नहीं आने दी।”
सोनपुर के रहने वाले स्थानीय बुजुर्ग खुलकर कहते हैं कि सोनपुर मेला अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है। एक समय में एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला यहां लगता था और आज सिर्फ नाच हो रहा है। इस पर बिहार सरकार को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। 09 नवंबर से शुरू और 32 दिनों तक चलने वाले इस मेले का सरकारी स्तर पर विधिवत समापन 10 दिसंबर को होना है।

