डॉलर के मुकाबले रुपया इज्जत से खड़ा तो रहे सरकार!

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भारतीय अर्थव्यवस्था की धुरी माने जाने वाले रुपये की स्थिति आजकल चिंताजनक रूप से कमजोर हो रही है। 30 नवंबर 2025 को एक अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 89.36 रुपये के आसपास है, जो पिछले एक वर्ष में 5.67% की गिरावट दर्शाता है। यह स्तर 2025 का अब तक का उच्चतम है, जहां नवंबर में ही 89.73 का रिकॉर्ड तोड़ दिया गया।

वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल, अमेरिकी व्यापार नीतियों और घरेलू चुनौतियों के बीच रुपये की यह कमजोरी न केवल आयातकों के लिए महंगाई का सबब बन रही है, बल्कि निर्यातकों के लिए अवसर भी पैदा कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह गिरावट अनियंत्रित हो जाएगी? दिसंबर 2025 तक डॉलर 90 रुपये के पार पहुंचेगा या नहीं?

मार्च 2026 तक क्या रुपये को राहत मिलेगी? और आने वाले समय में रुपये के सामने कौन-सी चुनौतियां खड़ी होंगी? यहाँ हम जो  विश्लेषण कर रहे हैं वह   वैश्विक आंकड़ों और विशेषज्ञ पूर्वानुमानों पर आधारित है।

रुपये की गिरावट कोई नई बात नहीं है। 1973 से अब तक डॉलर के मुकाबले यह औसतन 0.01% प्रति वर्ष कमजोर हुआ है, लेकिन 2025 में यह रफ्तार तेज हो गई है। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के अनुसार, पिछले 12 महीनों में रुपये ने 5.66% की छलांग लगाई है, जो वैश्विक जोखिमों का प्रतिबिंब है। आइए, पहले समझते हैं कि रुपये दिन-ब-दिन क्यों कमजोर हो रहा है।

लगातार नीचे होता जा रहा है रूपया। 2025 में रुपये की गिरावट की शुरुआत मई से हुई, जब यह 83.72 के निचले स्तर से उछलकर नवंबर तक 89.73 तक पहुंच गया। यह 4.19% की वार्षिक वृद्धि दर्शाता है, जो मुख्य रूप से वैश्विक कारकों से प्रेरित है। सबसे बड़ा कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ‘उच्च ब्याज दरों वाली’ नीति है। फेड ने 2025 में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों को टाल दिया, जिससे डॉलर इंडेक्स (DXY) मजबूत हुआ। भारत जैसे उभरते बाजारों से पूंजी का बहाव अमेरिका की ओर हो गया, क्योंकि वहां उच्च रिटर्न की संभावना थी।

दूसरा प्रमुख कारक है व्यापार घाटा। भारत का व्यापार घाटा FY26 के पहले छह महीनों में 155 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष के 145 अरब से अधिक है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने इसे और बढ़ावा दिया।

हालांकि जून 2025 में ब्रेंट तेल 78.9 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर से गिरकर सितंबर में 67.3 पर आ गया, लेकिन भारत की 80-85% तेल आयात निर्भरता ने डॉलर की मांग बढ़ाई। एचडीएफसी फंड्स के अनुसार, यह घाटा रुपये पर दबाव डाल रहा है, क्योंकि आयातक अधिक डॉलर खरीद रहे हैं।

तीसरा, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का बहिर्वाह। 2025 में FIIs ने भारतीय इक्विटी और डेट बाजारों से 23,819 करोड़ रुपये निकाले, मुख्य रूप से अमेरिकी टैरिफों और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण। यूएस ने अगस्त 2025 से भारत से आयात पर 50% टैरिफ लगाया, जिससे निर्यात 12% गिर गया। यह भारतीय वस्तुओं को वैश्विक बाजार में कम प्रतिस्पर्धी बना रहा है, जिससे CAD (करंट अकाउंट डेफिसिट) 1.3% GDP तक पहुंचने का अनुमान है।

घरेलू मोर्चे पर, मुद्रास्फीति और RBI की नीतियां भी भूमिका निभा रही हैं। भारत की मुद्रास्फीति अमेरिका से अधिक होने से खरीद शक्ति समता (PPP) प्रभावित हुई। RBI ने हस्तक्षेप कर विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग किया, लेकिन यह अस्थायी राहत है। ईबीसी फाइनेंशियल ग्रुप के अनुसार, ये कारक मिलकर रुपये को 3% प्रति वर्ष की औसत गिरावट की ओर धकेल रहे हैं। नतीजा? रुपये की दैनिक अस्थिरता बढ़ गई, और 21 नवंबर 2025 को यह 0.876% गिरा।

क्या सचमुच महीने भर में 90 रुपये तक पहुंच जाएगा ? विशेषज्ञ पूर्वानुमान मिश्रित हैं, लेकिन अधिकांश 88-92 के दायरे में देख रहे हैं। ट्रेडर्स यूनियन के अनुसार, दिसंबर में औसत 90.58, न्यूनतम 88.77 और अधिकतम 92.39 रह सकता है। लॉन्ग फोरकास्ट 91.54 का अनुमान लगाता है, जबकि नागा.कॉम 90.00 तक पहुंचने की चेतावनी देता है।

यह पूर्वानुमान अमेरिकी टैरिफों और FII बहिर्वाह पर आधारित हैं। यदि यूएस-भारत व्यापार वार्ता में प्रगति नहीं हुई, तो निर्यात और गिर सकते हैं, जो CAD को चौड़ा करेगा। हालांकि, वाइज और बुकमाईफॉरेक्स 89.49 का औसत देख रहे हैं, यदि RBI हस्तक्षेप जारी रखे। रॉयटर्स पोल में 38 विश्लेषकों का मीडियन 88.36 है।

कुल मिलाकर, 90 का स्तर टूटना संभव है, लेकिन RBI के 600 अरब डॉलर के भंडार से इसे रोका जा सकता है। यदि फेड दिसंबर में दरें काटे, तो राहत मिल सकती है, वरना 90 पार होना तय।

मार्च 2026 तक  रूपया संभल जायेगा?  मार्च 2026 तक रुपये की ‘वापसी’ की उम्मीद आशावादी लगती है, लेकिन पूर्वानुमान सतर्क हैं। ट्रेडर्स यूनियन 93.16 का औसत देखता है, जबकि यूनियन बैंक ऑफ इंडिया 90 के मनोवैज्ञानिक स्तर की ओर इशारा करता है। वेस्टपैक और रॉयटर्स 87-88 के दायरे में स्थिरता का अनुमान लगाते हैं, यदि फेड की दरें 2026 में धीमी हों।

सकारात्मक संकेत हैं: भारत की GDP वृद्धि 7% (2025) और 6.4% (2026) रहने का अनुमान है, जो एशिया-प्रशांत में नेतृत्व करेगी। सेवा क्षेत्र, विशेष रूप से रेमिटेंस (28% यूएस से), मजबूत है। यदि H-1B वीजा परिवर्तन नए आवेदकों तक सीमित रहें, तो प्रभाव कम होगा।

हालांकि, यदि टैरिफ बने रहें, तो निर्यात 50 अरब डॉलर तक गिर सकते हैं, जो CAD को दबाएगा। RBI की नीति में ढील (SBI रिपोर्ट के अनुसार 8-10% गिरावट ट्रंप 2.0 में) भी चुनौती है। कुल मिलाकर, मार्च तक 87.40-90 के बीच रहना संभव है, लेकिन पूर्ण ‘वापसी’ के लिए वैश्विक स्थिरता जरूरी। 2026 में रुपये को कई मोर्चों पर चुनौतियां झेलनी पड़ेंगी।

पहली, वैश्विक व्यापार तनाव: यूएस टैरिफ निर्यात को 50 अरब डॉलर तक सीमित कर सकते हैं, जो CAD को 1.3% GDP तक ले जाएगा। दूसरी, भू-राजनीतिक जोखिम: रूस-यूक्रेन संघर्ष और यूएस-चीन प्रतिद्वंद्विता से तेल कीमतें 74 डॉलर से ऊपर रहेंगी, आयात बिल बढ़ाएंगी। तीसरी, पूंजी बहिर्वाह: FIIs का रुझान जारी रह सकता है, यदि भारतीय इक्विटी वैल्यूएशन प्रीमियम पर रहें। एसएंडपी ग्लोबल के अनुसार, फेड की दरें 2026 तक उच्च रहेंगी, जो डॉलर को मजबूत रखेंगी।

चौथी, घरेलू मुद्दे: मुद्रास्फीति नियंत्रण से बाहर हो सकती है, यदि तेल महंगा हो। पॉलिसी सर्कल के अनुसार, FY26 में 3% की मामूली गिरावट संभव है। पांचवी: H-1B वीजा परिवर्तन से रेमिटेंस प्रभावित हो सकता है। नागा.कॉम के अनुसार, यदि भारत टैरिफ पर समझौता न करे, तो INR 90-102 तक जा सकता है। ये चुनौतियां रुपये को अस्थिर रखेंगी।

रुपये को मजबूत करने के लिए बहुआयामी रणनीति जरूरी है। सबसे पहले, RBI को सक्रिय हस्तक्षेप जारी रखना चाहिए। विदेशी भंडार का उपयोग अस्थिरता रोकने के लिए प्रभावी है, लेकिन लंबे समय के लिए निर्यात बढ़ाना पड़ेगा। दूसरा, व्यापार विविधीकरण: यूरोप और एशिया के साथ समझौते, जैसे EU-भारत FTA, टैरिफ प्रभाव कम करेंगे।

तीसरा, घरेलू सुधार: ‘मेक इन इंडिया’ से विनिर्माण बढ़ाकर आयात निर्भरता घटाएं। तेल आयात के लिए रिन्यूएबल एनर्जी पर जोर दें। चौथा, FII आकर्षण: कर सुधार और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से निवेश लाएं। वित्त मंत्री के अनुसार, AI निवेश से 2026 में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

पांचवां, वैकल्पिक भुगतान: INR में व्यापार बढ़ाकर डॉलर मांग घटाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि GDP वृद्धि बनी रही, तो 2026 में स्थिरता आएगी। हालांकि, वैश्विक सहयोग के बिना चुनौतियां बरकरार रहेंगी।

डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति चिंताजनक है, लेकिन अपरिहार्य नहीं। 2025 में 89.36 से दिसंबर तक 90 की संभावना मजबूत है, जबकि मार्च 2026 तक मामूली राहत मिल सकती है। दिन-ब-दिन की कमजोरी व्यापार घाटे, FII बहिर्वाह और टैरिफों से उपजी है, लेकिन 2026 की चुनौतियां—जैसे निर्यात ह्रास और तेल मूल्य—और कठिन होंगी।

फिर भी, RBI के हस्तक्षेप, निर्यात प्रोत्साहन और वैश्विक साझेदारियों से रुपये टिक सकता है। भारत की 7% GDP वृद्धि एक मजबूत आधार है। अंततः, सतर्क नीतियां ही रुपये को स्थिर रखेंगी, ताकि अर्थव्यवस्था वैश्विक तूफानों में डूबे नहीं। 

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि वे Thelens.in के संपादकीय नजरिए से मेल खाते हों।



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