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नई दिल्ली। लोकतंत्र तब खत्म नहीं होता जब आखिरी वोट डाला जाता है। यह तब तक जीवित रहता है जब तक नागरिक यह विश्वास करते रहें कि उन वोटों को गिनने वाली संस्थाएं पारदर्शी, जवाबदेह और विश्वास के योग्य हैं।इसीलिए कोलकाता के अलीपुर में सरकारी गोदाम में हुई हालिया आग को सिर्फ एक प्रशासनिक दुर्घटना के रूप में खारिज नहीं किया जा सकता, जिसमें हजारों इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें (EVM) क्षतिग्रस्त हो गईं। यह आग आकस्मिक थी, लापरवाही का नतीजा थी या कुछ और, यह अभी तक अज्ञात है। फॉरेंसिक जांच अभी चल रही है। फिर भी इस घटना का महत्व न केवल इस बात में है कि क्या हुआ, बल्कि उस राजनीतिक संदर्भ में भी जिसमें यह हुई।
सरकारी बयानों के अनुसार, आग में लगभग चार हजार EVM क्षतिग्रस्त हो गए। राज्य के अग्निशमन मंत्री ने कहा कि आग निचली मंजिलों से शुरू हुई और ऊपरी मंजिलों पर फैल गई जहां मशीनें रखी थीं। लेकिन जांचकर्ताओं ने प्रारंभिक जांच भी पूरी नहीं की थी कि अधिकारियों ने क्षतिग्रस्त मशीनों की संख्या पहले ही बता दी। सवाल तुरंत उठे।ये मशीनें किन चुनावों से जुड़ी थीं? इन्हें वहां क्यों रखा गया था? सुरक्षा प्रोटोकॉल क्या थे? नुकसान का आकलन इतनी जल्दी कैसे किया गया? यह भी सवाल उठा कि आग निचले मंजिल पर लगी थी तो अचानक बीच के मंजिलों को छोड़कर ऊपरी मंजिल पर कैसे चली गई जहां ईवीएम रखे थे।
चुनाव विश्लेषक विभव जोशी कहते हैं कि महत्वपूर्ण यह है कि जब लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास पहले से ही कम हो रहा है तो नागरिकों को सरकारी आश्वासनों को क्यों स्वीकार कर लेना चाहिए?यह आग पश्चिम बंगाल में अत्यंत विवादास्पद चुनावी मौसम के बीच जनमानस में आई।हाल के राज्य विधानसभा चुनाव के दौरान विपक्षी दलों और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों ने चुनाव आयोग की वेबसाइट पर गिनती के आंकड़ों के प्रकाशन में देरी को लेकर बार-बार चिंता जताई थी। द रिपोर्ट्स कलेक्टिव ने सिलसिलेवार रिपोर्ट छापी। जब जानकारी में देरी होती है, असंगति होती है या सत्यापन मुश्किल हो जाता है तो संदेह स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।
पत्रकारों और ऑल्ट न्यूज जैसे फैक्ट-चेकर्स की जांच में कम से कम एक बूथ पर अनियमित वोटिंग पैटर्न पाए गए, जहां आधिकारिक आंकड़े स्थानीय जनसांख्यिकी और मतदाताओं के बयानों से बिल्कुल मेल नहीं खाते थे।यह सब चुनावी हेराफेरी का प्रमाण नहीं है। अंतिम परिणाम कानूनी रूप से वैध रहा। लेकिन लोकतांत्रिक वैधता कानूनी वैधता से कहीं ज्यादा मांग करती है।कानूनी जीत जनता का विश्वास क्यों नहीं जीत पाती यह अंतर समकालीन भारत में तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है।
इस अगलगी के बाद तृणमूल ,सपा। कांग्रेस समेत सभी दल इस बात पर एकमत है कि बंगाल के नतीजों में कुछ न कुछ ऐसा है जिसे छिपाया जा रहा। विभव कहते हैं कि एक राजनीतिक व्यवस्था सभी औपचारिक कानूनी आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है लेकिन साथ ही जनता का विश्वास खो सकती है। चुनाव स्थापित प्रक्रियाओं के अनुसार हो सकते हैं, फिर भी आबादी के बड़े हिस्से को यह विश्वास नहीं होता कि ये प्रक्रियाएं निष्पक्ष तरीके से काम कर रही हैं। जब ऐसा होता है तो संकट केवल तकनीकी नहीं रह जाता, वह राजनीतिक हो जाता है।यह मुद्दा पश्चिम बंगाल से कहीं आगे तक फैला हुआ है।
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