WORLD NEWS: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर हुए हमले के बाद दुनिया भर में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर 18 खुफिया एजेंसियों और अरबों डॉलर के सुरक्षा बजट के बावजूद ऐसी बड़ी चूक कैसे हो गई। कार्यवाहक अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच ने दावा किया है कि यूएस सीक्रेट सर्विस एजेंट की जैकेट पर लगी गोली संभवतः हमलावर की थी, न कि एजेंटों की जवाबी फायरिंग की। जांच में सामने आया है कि संदिग्ध ट्रेन से लॉस एंजिल्स से शिकागो और फिर वॉशिंगटन डीसी पहुंचा, होटल में ठहरा और सुरक्षा जांच से भी गुजर गया। इसके बाद सवाल उठ रहा है कि हथियारों के साथ वह पकड़ा क्यों नहीं गया।
Acting AG Blanche: The bullet that hit the USSS agent's vest likely came from the shooter, not crossfire. The suspect traveled by train from L.A. to Chicago to D.C. and checked into the Washington Hilton.
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— Open Source Intel (@Osint613) April 26, 2026

अमेरिका में कुल 18 खुफिया एजेंसियां काम करती हैं, जिन्हें मिलाकर U.S. Intelligence Community कहा जाता है। इनमें CIA, NSA, FBI, DIA, NGA, NRO और अन्य एजेंसियां शामिल हैं। इन सभी पर हर साल करीब 100 बिलियन डॉलर खर्च किए जाते हैं और एक लाख से ज्यादा कर्मचारी इनसे जुड़े हैं। इनका काम विदेशी खतरों, साइबर हमलों, जासूसी, आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों की निगरानी करना है।
अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा की जिम्मेदारी U.S. Secret Service के पास होती है, जो 2003 से Department of Homeland Security के अधीन काम कर रही है। राष्ट्रपति की सुरक्षा करने वाली टीम को Presidential Protective Division कहा जाता है। इसमें हजारों स्पेशल एजेंट, स्नाइपर्स, K-9 यूनिट, काउंटर असॉल्ट टीम, मोटरकेड सुरक्षा और एडवांस इंटेलिजेंस टीम शामिल रहती है। इनके साथ FBI, स्थानीय पुलिस, व्हाइट हाउस मिलिट्री ऑफिस और अन्य एजेंसियां भी सुरक्षा में मदद करती हैं।
इतने मजबूत सुरक्षा ढांचे के बावजूद ट्रंप पर हमला होना सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अमेरिका में हथियार रखने के कानून कई राज्यों में अपेक्षाकृत ढीले हैं, लेकिन राष्ट्रपति सुरक्षा के घेरे तक हथियार पहुंचना बड़ी चूक माना जा रहा है। यह पहली बार नहीं है जब अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों से चूक हुई हो। इतिहास में चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों की हत्या हो चुकी है, जबकि कई बार हमले की कोशिशें भी सामने आई हैं। इस ताजा घटना ने फिर साबित किया है कि दुनिया की सबसे ताकतवर सुरक्षा व्यवस्था भी पूरी तरह अभेद्य नहीं है।

