13 अप्रैल 1919 की रोज जब जलियांवाला बाग़ में शांतिपूर्वक जमा हुए लोगों पर अंग्रेज़ों ने गोलियां चला दीं, तो वे सिर्फ लाशें नहीं छोड़ गए….

NFA@0298
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13 अप्रैल 1919 की रोज जब जलियांवाला बाग़ में शांतिपूर्वक जमा हुए लोगों पर अंग्रेज़ों ने गोलियां चला दीं, तो वे सिर्फ लाशें नहीं छोड़ गए….


13-Apr-2026 2:49 PM

वे छोड़ गए थे दर्द..

वे छोड़ गए थे अनाथ बच्चे..

और सिसकती हुईं विधवाएं!


उन्हीं में दो महिलाएं थीं,अत्तर कौर और रत्तन देवी, जिनकी हिम्मत इतिहास में दर्ज है ।

अत्तर कौर उस वक्त गर्भवती थीं, जब उनके पति भगमल भाटिया को गोली मार दी गई। उस रात, खून और मौत के बीच, वो अपने पति की लाश के पास बैठी रहीं।

मरते हुए अजनबियों को पानी पिलाया, उनके दर्द में साथ बैठीं, जबकि उनका खुद का दिल टूट चुका था।

कुछ दिन बाद अंग्रेज़ ₹50,000 लेकर आए, उस दौर में एक बहुत बड़ी रकम। उन्हें लगा, शायद इससे अत्तर कौर ‘आगे बढ़ पाएंगी’। लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया। दो बार!

मना इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें पैसों की ज़रूरत नहीं थी, वो अकेली थीं, अपने तीसरे बच्चे को जन्म देने वाली थीं।

बल्कि इसलिए किया क्योंकि उनके शब्दों में, “इस पैसे को लेने का मतलब, मेरे पति की शहादत को बेच देना होगा।”

रत्तन देवी को जब गोलियों की आवाज़ सुनाई दी, तो वो भागकर बाग़ पहुंचीं, और वहां अपने पति की लाश देखी।

कर्फ्यू था, कोई मदद नहीं कर सकता था।

.तो वो पूरी रात वहीं रुकीं, अपने पति की लाश की अकेले रखवाली की।

अगली सुबह, उसे चारपाई पर उठाकर घर ले आईं।

कुछ दिन बाद अंग्रेज़ ₹25,000 लेकर आए।

रत्तन देवी का जवाब था, “मैं अपने पति के हत्यारों से पैसे नहीं लूंगी।”

इन दो महिलाओं ने न हथियार उठाए, न नारे लगाए।

लेकिन अपने दर्द, अपने इनकार और अपनी ख़ामोशी से, उन्होंने विरोध किया।

और ये विरोध, हमेशा याद रखा जाना चाहिए!

(द बेटर इंडिया)

 



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