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हसदेव में 7 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव, छत्तीसगढ़ को रेगिस्तान बनाने की साजिश
05-May-2026 3:57 PM
आंदोलन का आरोप
रायपुर, 5 मई। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि लगभग 7 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव राज्य के पर्यावरण और भविष्य के लिए आत्मघाती कदम साबित होगा।
आंदोलन से जुड़े नेताओं आलोक शुक्ला, शालिनी गेरा, उमेश्वर सिंह आर्मो और रामलाल करियाम ने आरोप लगाया कि यह खनन राजस्थान की बिजली जरूरत के नाम पर नहीं, बल्कि निजी कंपनी के हित में किया जा रहा है। उनका कहना है कि केंद्र सरकार की वन सलाहकार समिति 8 मई को होने वाली बैठक में केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को वन स्वीकृति देने पर विचार करेगी, जिसके लिए राज्य सरकार पहले ही अनुशंसा भेज चुकी है।
विज्ञप्ति के अनुसार, प्रस्तावित खदान क्षेत्र में लगभग 7 लाख पेड़ काटे जाने का अनुमान है। इससे न केवल घने साल जंगलों का नुकसान होगा, बल्कि हसदेव नदी और बांगो जलाशय पर भी गंभीर असर पड़ेगा। बांगो जलाशय से लाखों हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती है, ऐसे में इसके प्रभावित होने से व्यापक कृषि संकट खड़ा हो सकता है।
संगठन ने बताया कि हसदेव क्षेत्र में पहले से संचालित परसा ईस्ट केते बासेन और परसा खदानों के कारण 10,000 एकड़ से अधिक जंगल खत्म हो चुका है और करीब 6 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं। नए प्रोजेक्ट से यह नुकसान कई गुना बढ़ने की आशंका है।
विज्ञप्ति में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण देश में तापमान लगातार बढ़ रहा है और छत्तीसगढ़ भी अत्यधिक गर्मी झेल रहा है। ऐसे समय में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से स्थिति और गंभीर हो सकती है।
आंदोलन ने दावा किया कि प्रस्तावित क्षेत्र का 98 प्रतिशत हिस्सा घना वन है, जिस पर हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका निर्भर है। जंगलों से होने वाली आय ग्रामीणों की कुल आय का बड़ा हिस्सा है। खनन से उनकी आजीविका, संस्कृति और परंपराओं पर सीधा असर पड़ेगा।
विज्ञप्ति में लेमरू हाथी रिजर्व और हाथियों के प्राकृतिक मार्ग पर खतरे की भी बात कही गई है। साथ ही ऐतिहासिक रामगढ़ पहाड़ को भी खनन से नुकसान होने की आशंका जताई गई है।
हसदेव बचाओ आंदोलन ने याद दिलाया कि 26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा ने सर्वसम्मति से हसदेव के कोल ब्लॉकों को निरस्त करने का प्रस्ताव पारित किया था। आरोप लगाया गया है कि वर्तमान सरकार उस संकल्प के विपरीत जाकर निर्णय ले रही है।
विज्ञप्ति में केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया कि राजस्थान की बिजली जरूरत पहले से कम आंकी गई है और सौर ऊर्जा परियोजनाओं के चलते कोयले की मांग भी घट रही है। ऐसे में नए कोल ब्लॉक की जरूरत नहीं है।
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