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नई दिल्ली। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) में 21 वीं सदी की शुरुआत से जारी अनिर्णय का संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है, 2004 में पीएम पद को लेकर जो ऊहापोह की स्थिति पैदा हुई थी वो अब तक जारी है। इस अनिर्णय के कारण ना केवल उसे आम जानता और विपक्ष की आलोचना झेलनी पड़ रही है बल्कि सत्ता गंवाने आपसी खींचतान के बढ़ने और गुटबाजी का भी सामना करना पड़ रहा है।
यह बात यकीनन चौंकाने वाली है कि केरल में मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदार के चयन में पार्टी को दस दिन लग गए इन दस दिनों में ना केवल दिल्ली से तिरुवनंतपुरम तक आपसी खींचतान शुरू हो गई। यहां तक कि राहुल गांधी को शीर्ष नेताओं की बैठक में केरल में हो रही पोस्टरबाजी और सोशल मीडिया पर चल रहे अभियान को लेकर सवाल करने पड़े।
यह लगभग सर्वविदित है कि कांग्रेस अपने महासचिव संगठन के सी वेणुगोपाल को केरल का सीएम बनाना चाहती थी और सारी कसरतें इसलिए की जा रही थी। वहीं दूसरी तरफ विधायक दल में भी एक वर्ग इसके समर्थन में था लेकिन केरल से दिल्ली तक पार्टी का संगठन और केरल की आम जनता किसी पैराशूट से लैंडिंग करने वाले चेहरे को सीएम के पद पर नहीं देखना चाहती थी।
2004 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की अप्रत्याशित जीत के बाद पार्टी में प्रधानमंत्री पद को लेकर जो अनिर्णय की स्थिति बनी, वह अनवरत जारी है। जब कभी किसी प्रदेश में मुख्यमंत्री के चयन की नौबत आती है तो हाईकमान के सामने आज केरल में मुख्यमंत्री चयन को लेकर मचे गतिरोध की याद दिलाती है। दोनों मामलों में हाईकमान की भूमिका, आंतरिक गुटबाजी और फैसले में देरी कांग्रेस की पुरानी समस्या को उजागर करती है।
इस रिपोर्ट में हम पूरी कहानी के साथ ऐतिहासिक संदर्भों, हाईकमान के गलत फैसलों और उनके प्रभावों पर चर्चा करेंगे।13 मई 2004 को घोषित परिणाम में कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को अप्रत्याशित रूप से पराजित किया था। इसके पूर्व सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया गांधी पार्टी अध्यक्ष बनी थी। पार्टी में उनका कद बहुत बढ़ा था।
जीत के बाद कांग्रेस संसदीय दल ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए चुना, लेकिन विदेशी मूल को लेकर भाजपा और कांग्रेस के ही कुछ सहयोगियों ने उनके खिलाफ अभियान छेड़ दिया था। हालांकि लालू प्रसाद यादव समेत विपक्ष के कई नेता उन्हें प्रधानमंत्री पद स्वीकारने को कह रहे थे। यह ऊहापोह की स्थिति पाँच दिनों तक बनी रही। एक तरफ पीएम पद के लिए सोनिया गांधी पर जनता का दबाव दूसरी तरफ प्रणव मुखर्जी समेत दूसरे नेताओं की महत्वाकांक्षा का असर साफ दिख रहा था।
पांच दिनों की गहन बहस के बाद अंततः के बाद 18 मई 2004 को सोनिया गांधी ने पद ठुकरा दिया। उन्होंने कहा, ‘आज हर आवाज मुझे बताती है कि मुझे इस पद को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करना चाहिए।’
मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया। यह फैसला तत्कालीन संकट का समाधान था, लेकिन पार्टी कैडर और नेताओं में गहरी निराशा और विभाजन पैदा कर गया। कई सांसदों ने रोते हुए विरोध जताया वही लालू प्रसाद यादव धरने पर बैठ गए। यह पहला निर्णय था
ऐसी ही स्थिति 2018 में आई जब कांग्रेस ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जीत हासिल कर सबको चौंका दिया था। तीनों ही प्रदेशों में भाजपा सरकार का अंत हुआ था, लेकिन कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद पर निर्णय को लेकर दबाव, गुस्सा, गुटबाजी और तमाम तरह के तिकड़म चलते रहे।
जनता को अब भी याद है कि किस तरह से राहुल गांधी ने कमलनाथ- ज्योतिरादित्य, अशोक गहलोत- राजेश पायलट के साथ तस्वीरें खिंचाई। सबसे अजीब स्थिति छत्तीसगढ़ में थी जहां दो नहीं चार उम्मीदवार थे।भूपेश बघेल, टी एस सिंहदेव, चरणदास महंत, और ताम्रध्वज साहू अपनी अपनी दावेदारी को लेकर तमाम कसरतें कर रहे थे। राहुल गांधी लगातार सबको साधने की कोशिश करते रहे।
गौरतलब है कि तीनों राज्यों के चुनाव परिणाम 11 सितंबर को आ गए थे लेकिन निर्णय लेने में हाईकमान को छह दिन लग गए और 17 सितंबर को शपथ ग्रहण हो पाया।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस को बहुमत के लिए दो सीटों की जरूरत थी कांग्रेस 114 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत के लिए BSP सहयोग लेना पड़ा जिसमे कमलनाथ ने बड़ी भूमिका निभाई।
राहुल गांधी के तुगलक रोड स्थित आवास पर कमलनाथ और राहुल के नजदीकी ज्योतिरादित्य सिंधिया की कई राउंड बैठक चलीं। कमलनाथ वरिष्ठ, अनुभवी और दिग्विजय सिंह के करीबी थे वहीं सिंधिया युवा, बड़े कैंपेनर और गांधी परिवार की नजदीकियों की वजह से बेहद चर्चा में रहते थे। अंततः राहुल गांधी ने कमलनाथ को तरजीह दी। लेकिन यह सरकार ज़्यादा दिन तक नहीं टिक सकी।
कांग्रेस की यह 15 महीने पुरानी सरकार 20 मार्च 2020 को गिर गई । दरअसल पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस्तीफ़ा दे दिया फिर 22 कांग्रेस विधायकों ने बगावत करके भाजपा की नई सरकार बनने का रास्ता साफ़ कर दिया। कांग्रेस और कमलनाथ तमाम दावों और कोशिशों के बावजूद अपनी सरकार नहीं बचा सके।
ऐसा ही बवाल राजस्थान में भी हुआ था। मतगणना के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी तब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को सीएम पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। उन्होंने पांच साल तक पार्टी को मजबूत किया था। लेकिन हाई कमान्ड ने अनुभव को तरजीह दी।
14 दिसंबर को राहुल गांधी की बैठक के बाद फैसला हुआ – गहलोत मुख्यमंत्री बने, जबकि पायलट उप-मुख्यमंत्री। शपथ 17 दिसंबर को हुई।गहलोत ने होम और वित्त जैसे अहम मंत्रालय अपने पास रख लिए। पायलट गुट को लगा कि उन्हें किनारे किया जा रहा है। निर्दलीय विधायकों ने गहलोत के समर्थन में शर्त रखी थी, जिससे पायलट की उम्मीद टूट गई।
गहलोत ने पायलट को ‘निकम्मा’ कहकर तीखा हमला बोला। जनवरी 2019 से टेंशन बढ़ा। पायलट ने मेयर चुनाव, कोटा अस्पताल में शिशु मौतें, कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकार की आलोचना शुरू कर दी।
इस तरह 2018 के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद सत्ता बंटवारे, वरिष्ठता और महत्वाकांक्षा की टकराहट ने गहलोत-पायलट गतिरोध की नींव रख दी, जो 2020 में खुली बगावत में बदल गई। ऐसा लगने लगा कि सचिन पायलट बीजेपी में चले जाएँगे लेकिन यह तो नहीं हुआ, 2023 का चुनाव कांग्रेस हार गई।
छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव परिणामों के आने के बाद टीएस सिंह देव और भूपेश बघेल, ताम्रध्वज और चरणदास महंत नई दिल्ली पहुंचे। चरणदास महंत ने शुरुआती बातचीत के बाद अपनी दावेदारी वापस ले ली लेकिन ताम्रध्वज नाराज हो गए।
दरअसल ताम्रध्वज उस वक्त सांसद भी थे और सबसे प्रबल दावेदार भी माने जा रहे थे। उस वक्त यह खबर चर्चा में थी कि सीएम का नाम फाइनल होने से पहले भूपेश बघेल और टी एस सिंह देव के साथ राहुल गांधी ने कई दौर की बैठक की।
पार्टी सूत्रों के अनुसार बैठक के अंत में जो निर्णय लिया गया वह बेहद चौंकाने वाला था दोनों को ही ढाई ढाई साल सीएम पद के अवसर दिए गए और सबसे पहले यह अवसर भूपेश बघेल को दिया गया।
इस अजब गजब स्थिति का नतीजा यह निकला कि सरकार बनने के साथ ही टीएस सिंहदेव और भूपेश बघेल के बीच खींचतान शुरू हो गई। इसका नतीजा पूरे देश ने और पार्टी ने देखा। टीएस सिंहदेव बार बार दोहराते रहे कि ढाई ढाई साल का फार्मुला अमल में लाया जाएगा। लेकिन जैसे ही ढाई साल बीता हाईकमान के लिए विचित्र स्थिति पैदा हो गई।
भूपेश बघेल के समर्थन में विधायक दिल्ली पहुँच गए।हाईकमान ने दोनों नेताओं को तलब किया लेकिन दो दिनों तक चले हाइप्रोफाइल ड्रामे के बाद भूपेश बघेल सीएम बने रहे ।अंत में प्रियंका, राहुल की मौजूदगी में जैसे तैसे बवाल टला और टीएस सिंहदेव को डिप्टी सीएम बनाना पड़ा।
10 मई 2023 को हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भारी जीत हासिल की। 224 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को 135 सीटें मिलीं। यह 1989 के बाद कांग्रेस की सबसे बड़ी जीत थी।परिणाम आने के तुरंत बाद सीएम पद को लेकर सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार के बीच तीखा विवाद खड़ा हो गया।
दोनों नेता लंबे समय से CM पद के दावेदार थे।
सिद्धारमैया ने बहुमत साबित करने का दावा किया, जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार को लगता था कि चुनाव जीत में उनकी भूमिका सबसे बड़ी थी। कांग्रेस हाईकमान राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे को दो दिन तक खींचतान सुलझानी पड़ी। अंततः 19 मई को सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और डी.के. शिवकुमार को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया।
20 मई 2023 को शपथ ग्रहण हुआ। शिवकुमार को राज्य कांग्रेस अध्यक्ष पद भी बरकरार रखने की अनुमति दी गई।विवाद की जड़ में छत्तीसगढ़ वाले रोटेशनल फॉर्मूला की अफवाह थी, जिसे शिवकुमार गुट ने आगे बढ़ाया।
सिद्धारमैया ने इसे खारिज किया और पूरा कार्यकाल पूरा करने पर जोर दिया। यह गुटबाजी आज भी जारी है और कांग्रेस की छवि को नुकसान पहुंचा रही है।कुल मिलाकर, शानदार चुनावी जीत के बावजूद सीएम पद की महत्वाकांक्षा ने कर्नाटक कांग्रेस में अस्थिरता पैदा कर दी।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा 1991 में कांग्रेस में शामिल हुए the और तरुण गोगोई सरकार में स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त जैसे अहम मंत्रालय संभाले। 2011 विधानसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी को 78 सीटें दिलाईं और खुद को सीएम पद का प्रबल दावेदार माना। राहुल गांधी और हाईकमान ने तरुण गोगोई को ही जारी रखा।
तब से नाराज चल रहे में हिमंता ने गोगोई सरकार में बगावत कर 21 जुलाई 2014 को इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 58 विधायकों का समर्थन होने का दावा किया, लेकिन राहुल गांधी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।
इसके बाद हिमंता, तरुण गोगोई और सीपी जोशी राहुल गांधी से मिलने गए। बैठक में राहुल का कुत्ता टेबल पर रखे बिस्किट खाने लगा, जिससे हिमंता नाराज हुए और उन्होंने कहा कि ‘मैं ऐसे माहौल में काम नहीं कर सकता।’
23 अगस्त 2015 को हिमंता ने अमित शाह के दिल्ली आवास पर भाजपा जॉइन कर ली। 15 सितंबर 2015 को उन्होंने विधायक पद से भी इस्तीफा दे दिया। भाजपा में शामिल होते ही वे पार्टी के नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (NEDA) के कन्वीनर बने और 2016,2026 असम चुनाव में भाजपा की जीत में अहम रोल निभाया।
कांग्रेस छोड़ने के पीछे मुख्य कारण CM पद की महत्वाकांक्षा, गोगोई से टकराव और राहुल गांधी की उदासीनता मानी जाती है। इस बदलाव ने असम में कांग्रेस का अंत कर दिया और हिमंता को भाजपा का सबसे ताकतवर चेहरा बना दिया।
वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग कहते हैं कि तानाशाही के इस दौर में अगर कोई पार्टी समय लेकर लोकतांत्रिक तौर तरीकों से कोई निर्णय ले रही है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। मिसेज गांधी के समय सब कुछ आलाकमान तय करता था लेकिन अब स्थितियां ऐसी नहीं है।
अब संगठन, जनमत और जमीनी परिस्थितियों को देखकर निर्णय लिए जाते हैं। श्रवण गर्ग कहते हैं कि भाजपा ने तो अलग अलग राज्यों में जिनको मुख्यमंत्री बनाया है आप उन्हें देख लीजिए और कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों को देख लीजिए। अगर कांग्रेस पार्टी अपने निर्णयों में समय ले रही है तो यह बेहतर बात है इससे किसी का क्या नुकसान हो सकता है?
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