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सरकारी तेल कंपनियों ने पिछले 11 दिनों में चौथी बार पेट्रोल और डीजल के दाम में बढ़ोतरी की है, जिसका चौतरफा बोझ आम आदमी पर पड़ना तय है। 25 मई को सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल के दामों में क्रमशः 2.61 रुपये और 2.71 रुपये प्रति लीटर कर दिए हैं। इस तरह अब राजधानी दिल्ली में पेट्रोल और डीजल के दामों में करीब 7.5 रुपयों की बढ़ोतरी हो चुकी है।
ऐसा लगता है कि सरकार किस्तों में आम आदमी पर बोझ डाल रही है। गजब यह है कि सरकार की ओर से बार-बार दावा किया जा रहा है कि वह युद्ध से उपजे हालात से निटपने के लिए तैयार है और देश में पेट्रोलियम का संकट नहीं है। हालांकि खुद प्रधानमंत्री मोदी देश के नागरिकों से पेट्रोल-डीजल के इस्तेमाल में कटौती की अपील कर चुके हैं।
आम आदमी पर तो पहले से ही बोझ कम नहीं है। दरअसल सरकार अपनी रणनीतिक नाकामियों को स्वीकार करने के बजाय आम आदमी पर बोझ डाल रही है। वास्तविकता यह है कि 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इस्राइल के हमले से पहले भारत को मिलने वाले कच्चे तेल का दाम 72 डॉलर प्रति बैरल था। इसके बावजूद सरकारी तेल कंपनियों ने आम उपभोक्ताओं को कोई रियायत नहीं दी थी और देश भर में पेट्रोल सौ रुपये प्रति लीटर के आसपास ही बिक रहा था।
बेशक, 2022 में रूस के यूक्रेन पर संकट से तेल का संकट पैदा हुआ था, लेकिन बीते कई बरसों से कच्चे तेल के दाम अमूमन औसत रूप से 100 डॉलर से नीचे ही थे। यही नहीं, बीते 12 सालों में सरकार ने कच्चे तेल के दाम गिरने पर आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल के दाम में कमी कर किसी तरह की रियायत नहीं दी गई है।
सरकार अब कहती है कि ईरान युद्ध छिडने और होर्मज के संकट के बावजूद उसने 76 दिनों तक लोगों पर बोझ नहीं डाला। मगर वह यह नहीं बताती कि उसे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव खत्म होने का इंतजार था।
सरकार के रणनीतिकार कहते हैं कि अब भी तेल कंपनियों को रोजाना 700 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा हो रहा है। मीडिया के एक वर्ग में माहौल बनाया ही जा रहा है कि पेट्रोल और डीजल के दामों में और बढोतरी आर्थिक व्यवस्था की स्थिरता के लिए जरूरी है।
दूसरी ओर देश में 90 फीसदी तेल के लिए जिम्मेदार तीन तेल कंपनियों ने इस साल जनवरी से मार्च के बीच की तिमाही में 41 फीसदी का मुनाफा कमाया! ऐसे में सवाल तो यही है कि ये मुनाफा कहां गया? आखिर सरकार पारदर्शिता के साथ सही स्थिति देश के सामने क्यों नहीं रखती?
मई, 2014 से पहले गुजरात का मुख्यमंत्री रहते मोदी डॉ. मनमोहन सिंह की अगुआई वाली तत्कालीन यूपीए सरकार पर महंगाई को लेकर हमालवर रहते थे। इन दिनों वायरल हो रखे उनके वीडियो में वह पेट्रोल और डीजल के दामों में हुई बढ़ोतरी को सरकार की नाकामी बताते नजर आ रहे हैं। याद दिलाया जा सकता है कि यह तब की बात है, जब कच्चे तेल के दाम 100 ड़ॉलर को पार कर रहे थे और तब भी पेट्रोल के दाम 60 रुपये के आसपास थे।
अर्थशास्त्र की एक पुरानी कवाहत है, अच्छी राजनीति, अर्थव्यवस्था के लिए खराब होती है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद जिस तरह से मोदी सरकार पेट्रोल डीजल के दामों में बढ़ोतरी कर रही है, वह इसका उदाहरण है।
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