युद्ध अपराधी इजरायल और युद्धोन्मादी अमेरिका ने बगैर किसी उकसावे के रमजान के दौरान ही ईरान पर हमला कर दिया है। अमेरिका ने इसके पीछे जो कारण बताए हैं वह बेहद ही हल्के हैं। ईरान के आंतरिक संकट का हवाला देकर किए इस हमले की जितनी भर्त्सना की जाए कम है।
इस हमले से मध्य पूर्व में अफरा-तफरी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे “प्रमुख युद्ध अभियान” बताया और ईरान की सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। लेकिन क्या अमेरिका के इस हस्तक्षेप को ईरान के आंतरिक मुद्दों जैसे जनता के विरोध प्रदर्शनों या मानवाधिकार उल्लंघनों को हल की दिशा में उठाया गया कदम मान कर चुपचाप तमाश देखने का वक्त है।
अमेरिका को ईरान की इतनी ही चिंता थी तो वह दूसरे रास्ते अख्तियार कर सकता था। इतिहास बताता है कि अमेरिका के ऐसे हस्तक्षेप अक्सर लोकतंत्र की दुहाई देते हैं, लेकिन पीछे व्यापारिक और सामरिक हित छिपे होते हैं।
इराक में 2003 का आक्रमण “बड़े पैमाने पर विनाश के हथियारों” की अफवाह पर आधारित था, लेकिन बाद में साबित हुआ कि यह झूठ था। अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को हटाया, लेकिन परिणामस्वरूप इराक में अस्थिरता आई और आईएसआईएस का उदय हुआ।
इसी तरहअफगानिस्तान में 2001 का अमेरिकी हस्तक्षेप अल-कायदा के खिलाफ था, लेकिन 20 साल बाद तालिबान की वापसी ने दिखाया कि लोकतंत्र थोपना कितना असफल रहा। इन मामलों में तेल संसाधन, क्षेत्रीय प्रभाव और सैन्य ठिकानों की स्थापना अमेरिका के प्रमुख हित थे। वेनेजुएला में भी 2019 से अमेरिका ने निकोलस मदुरो के खिलाफ प्रतिबंध लगाए और जुआन गुआइदो को मान्यता दी। और 2026 में अमेरिका वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर कब्जाि कर चुका है।
राष्ट्रंपति ट्रंप ईरान में जिस परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने की बात कह रहे हैं, वह 2015 में बातचीत के जरिए सुलझने के मुहाने पर था। लेकिन ट्रंप के सत्ता में आने बाद विश्व शक्तियों के समूह (पी5+1) जिसमें चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका और जर्मनी के साझा प्रयासों को भी झटका लगा। देशों का यह समूह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को ध्या न में रखकर बनाया गया था।
मध्य पूर्व का तेल आपूर्ति वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और अमेरिका इसे नियंत्रित करने के लिए वही सब कर रहा है, जो पहले से करता आया है। अमेरिका की नीति अक्सर एकतरफा होती है, जहां वह खुद को “विश्व पुलिस” मानता है, लेकिन अन्य देशों के हस्तक्षेप की निंदा करता है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार किसी देश के आंतरिक मामलों में बिना अनुमति हस्तक्षेप अवैध है, जब तक कि सुरक्षा परिषद की मंजूरी न हो। यहां कोई ऐसी मंजूरी नहीं है, जिससे यह हमला अंतरराष्ट्रीय कानून का साफ साफ उल्लंघन है।
अमेरिकी हस्तक्षेप की भर्त्सना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाता है। ईरान की जवाबी कार्रवाई से युद्ध फैल सकता है, खतरा परमाणु युद्ध तक भी जा सकता है। तेल कीमतें आसमान हो सकती हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
ऐसे में जब इस हमले को लेकर चिंता पूरी दुनिया में थी, भारत के पीएम नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा भी आलोचनाओं के केंद्र में है। सवाल यह भी है कि क्या इजरायल में मौजूद भारतीय अधिकारियों ने पीएम को सही जानकारी नहीं दी। यह संभव है कि ऐसे कार्यक्रम पहले से तय होते हैं, लेकिन जिन हालात में यह यात्रा हुई है उसने हमारी तटस्थ विदेश नीति को लेकर अच्छा संदेश नहीं गया है।
संयुक्त राष्ट्र तक की बैठकों में इजरायल पर गजा में नरसंहार के आरोप लग चुके हैं। ईरान हमेशा से भारत का दोस्त रहा है। क्या पुरानी दोस्ती चाहे वह रूस से हो या ईरान से वह इस वक्त दांव पर नहीं लगी है? नहीं भूलना चाहिए कि भारत की विदेश नीति वसुधैव कुटुंबकम, महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत और गुटनिरपेक्षता पर आधारित है।
यह सही है कि ईरान में आंतरिक संकट लंबे समय से चला आ रहा है। 2020 के दशक में ईंधन कीमतों में वृद्धि, आर्थिक प्रतिबंधों और महिलाओं के अधिकारों पर विरोध प्रदर्शन बढ़े। ईरानी कुर्द युवती महसा अमीनी, जिसे बुर्क प्रथा का विरोध करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और पुलिस हिरासत में मौत के बाद 2022 में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए, जिन्हें सरकार ने दबाया था।
लेकिन अमेरिका का सैन्य हस्तक्षेप समस्या हल करने की बजाय बढ़ाता है। वैश्विक समुदाय को संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से हल निकालना चाहिए, ताकि मध्य पूर्व में शांति बनी रहे। अन्यथा, ऐसे हमले केवल चक्रव्यूह बनाते हैं, जहां निर्दोष नागरिक पीड़ित होते हैं।

