शासकीय राजीव लोचन स्नातकोत्तर महाविद्यालय राजिम में जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत ऐतिहासिक सामाजिक व आध्यात्मिक योगदान पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन हुआ ।

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“जनजातियों के सामाजिक, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक योगदान को जन जन तक पहुंचाना “शासकीय राजीव लोचन स्नातकोत्तर महाविद्यालय,राजिम में जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत ऐतिहासिक सामाजिक व आध्यात्मिक योगदान पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन हुआ ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुश्री छाया राही (अध्यक्ष, जनभागीदारी समिति) कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे संस्था प्रमुख डॉ. सविता मिश्रा, मुख्य वक्ता के रूप में अनिल पुरोहित (सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ पत्रकार), शंकरलाल छेदेहा ( जिला अध्यक्ष, युवा प्रकोष्ठ, गोंडी धर्म संरक्षण समिति,जिला गरियाबंद), पुरनमाल नेताम ( जिला संरक्षक, युवा प्रकोष्ठ, गोंडी धर्म संरक्षण समिति,जिला गरियाबंद) रहे।कार्यशाला के संयोजक श्री आकाश बाघमारे सहा. प्राध्यापक, इतिहास ने स्वागत भाषण देते हुए सभी अतिथियों का स्वागत कर कार्यक्रम के उद्देश्य पर प्रकाश डाला।

मुख्य अतिथि सुश्री छाया राही जी ने कहा तीज-त्योहार, नृत्य, संगीत एवं रीति-रिवाज जनजातीय समुदाय की पहचान हैं और उन्होंने जनजाति समाज के पारंपरिक वाद्य यंत्र, विशेष परिधानों और लोकनृत्यों का विस्तृत उल्लेख किया।मुख्य वक्ता की आसंदी में उपस्थित श्री अनिल पुरोहित ने कहा, राजिम धार्मिक और साहित्यिक शिक्षा का त्रिवेणी संगम है। जनजाति का इतिहास जंगल से गांव एवं गांव से नगर तक का इतिहास है। 15 नवंबर बिरसा मुंडा के जन्म दिवस को जनजाति दिवस के रूप में मनाया जाएगा ताकि जनजाति समाज को सब जाने। छत्तीसगढ़ से देश की स्वतंत्रता में वीर नारायण सिंह,बिरसा मुंडा, कुंजाम ,भील, हलदर आदि ने बलिदान दिया है। बलिदान केवल पुरुषों ने ही नहीं महिलाओं ने भी बलिदान दिया है। उन्होंने जनजाति समाज के प्रकृति प्रेम को बताते हुए कहा कि पर्यावरण की रक्षा करना एवं उसे हरा-भरा रखना अपना दायित्व समझते हैं। जनजाति समाज का मानना हैं कि प्रकृति से उतना ही लेना चाहिए जितना हम उन्हें वापस कर सकते हैं। अध्यक्षीय उद्बोधन में संस्था प्रमुख डॉ. सविता मिश्रा ने अपने उद्बोधन में असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय की अवधारणा को बताते हुए मातृशक्ति के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा जनजाति समाज में सभी को औषधि का अच्छा ज्ञान है। आदिवासी समाज ने मातृ शक्ति को बहुत महत्व दिया है। इस समाज में महिला पुरुष दोनों को वर वधु चुनने की स्वतंत्रता है। उद्बोधन की कड़ी में पुरनमाल नेताम जी ने जनजातियों के महत्व पर रामायणकाल से लेकर वर्तमान काल तक प्रकाश डाला। उन्होंने बतलाया जनजाति समाज स्वाभिमानी समाज है। हमेशा लोगों की मदद के लिए तत्पर रहा है। जनजाति समाज सामूहिक रूप से कार्य करने में विश्वास रखते हैं। इन्हें अपने परिवार एवं समाज में रहने में ही आनंद आता है। उन्होंने जनजातियों के योगदान पर प्रकाश डालते हुए विभिन्न उदाहरण दिए जिनमें गुण्डाधुर, भीमा नायक, बिरसा मुंडा, वीर नारायण सिंह, तिलका मांझी, रानी दुर्गावती। उद्बोधन की कड़ी में शंकरलाल छेदेहा ने चर्चा परिचर्चा करते हुए तुर्रा, सिरमौर की महत्ता को बतलाया। कार्यक्रम की अगली कड़ी में विभिन्न प्रतियोगिताओं में स्थान प्राप्त विद्यार्थियों को पुरस्कार वितरण किया गया।

कार्यक्रम का संचालन कैप्टन डी. के. धुर्वा ने किया। अतिथियों के प्रति आभार प्रदर्शन श्री एम. एल. वर्मा (सहा. प्राध्यापक, वाणिज्य) ने किया

।इस अवसर पर महाविद्यालय के डॉ. के. आर. मतावले, श्री एम. एल. वर्मा, डॉ. समीक्षा चंद्राकर, प्रो. चित्रा खोटे, डॉ. राजेश बघेल, डॉ. भानु प्रताप नायक,योगेश तारक ,श्वेता खरे,मनीषा भोई, मुकेश कुर्रे, डॉ. देवेंद्र देवांगन, तामेश्वर मार्कंडेय आदि सहायक प्राध्यापकगण ख़ोमन साहू,डॉ. ग्रीष्मा सिंह, तृप्ति साहू, नेहा सोनी,निधि बग्गा, हनी पाटकर, डॉ. सर्वेश कौशिक पटेल, वाणी चंद्राकर, हेमचंद साहू,मनीष साहू, डाहरू सोनकर, डॉ. अश्विनी साहू, तोपचंद बंजारे, प्रदीप टंडन आदि अतिथि व्याख्याता, सोनम चंद्राकर,सुमन साहू, शुभम शर्मा, वासुदेव धीवर , मनीष साहू, गरिमा साहू, टेमन साहू,खूबलाल साहू, तरुण साहू, किशन साहू, वासुदेव आदि जनभागीदारी शिक्षक एवं कर्मचारी गण के साथ-साथ महाविद्यालय के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।



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