स्विटजरलैंड के दावोस में चल रहे डब्ल्यूटीओ (विश्व आर्थिक मंच) के सालाना जलसे में जारी की गई ऑक्सफैम की रिपोर्ट भारत सहित दुनिया के बड़े हिस्से में बढ़ती असमानता और राजनीतिक व्यवस्था पर अमीरों के बढ़ते नियंत्रण की भयावह तस्वीर पेश करती है, जिसका संज्ञान लिया जाना चाहिए।
ऑक्सफैम पिछले कई सालों से ऐसी रिपोर्ट जारी करता है, लेकिन उसकी ताजा रिपोर्ट से यही लगता है कि सरकारें असमानता और गरीबी को दूर करने में नाकाम साबित होती जा रही हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि यह उनकी प्राथमिकता में है ही नहीं।
रिपोर्ट में जो आंकड़े दिए गए हैं, वे खासतौर से गरीबी को लेकर किए जाने वाली सरकारी दावों की कलई खोलते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया का हर चौथा आदमी भूख से संघर्ष कर रहा है और दुनिया की आधी आबादी गरीबी में गुजर-बसर करने को मजबूर है।
हकीकत यह है कि कोविड जैसी महामारी के दौरान भी अरबपतियों की संपत्ति बढ़ गई थी। मौजूदा हालात के संदर्भ में महामारी के बाद 2021 में हुए दावोस सम्मेलन में जारी की गई ऑक्सफैम की रिपोर्ट को याद किया जा सकता है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने कहा था, ‘महामारी ने यह मिथक तोड़ा है कि हम सब एक नाव में सवार हैं। हम सब जब समुद्र में बह रहे हैं, तो यह साफ दिख रहा है कि कुछ लोग याट्स में सवार हैं, जबकि बाकी लोग बहते हुए मलबे से चिपटे हुए हैं!’
यह चौंकाने वाली बात नहीं है कि ऐसे समय, जब दुनिया भर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मनमानियों के कारण वैश्विक व्यवस्था में उथल-पुथल मची हुई है, यह रिपोर्ट कहती है कि नवंबर, 2024 में ट्रंप के दोबारा अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद अरबपतियों की संपत्ति पिछले पांच साल की तुलना में तीन गुना बढ़ गई।
दरअसल इससे भी चिंताजनक बात यह है कि राजनीतिक व्यवस्था यानी सत्ता पर अमीरों का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक अमीरों के राजनीतिक पद हासिल करने की संभावना गरीबों की तुलना में 4000 गुना अधिक है। वास्तव में इसे लोकतंत्र के लिए खतरे की तरह देखना चाहिए।
बात सिर्फ अमेरिका की भी नहीं है, भारत की तस्वीर भी कोई उजली नहीं दिखती है। बेशक, रिपोर्ट में विधायिका में एससी, एसटी और अन्य वंचित समूहों के लिए की गई आरक्षण की व्यवस्था को असमानता दूर करने की दिशा में एक कदम माना गया है, लेकिन अपने यहां सार्वजनिक संपत्ति खासतौर से जल, जंगल और जमीन पर सरकार के करीबी कुछ उद्योगपतियों का जिस तरह से नियंत्रण बढ़ रहा है, उसे लोकतंत्र के लिए चुनौती की तरह ही देखना चाहिए।
राजनीतिक व्यवस्था पर अमीरों का शिकंजा जिस तरह से बढ़ रहा है, वह लोकतंत्र पर छाए घनघोर संकट के लिहाज से खतरे की घंटी है।

