लाखों बरस का इंसानी दिमाग, एक पीढ़ी में ही इतना ओवरलोड

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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : लाखों बरस का इंसानी दिमाग, एक पीढ़ी में ही इतना ओवरलोड

सुनील कुमार ने लिखा है


26-Feb-2026 2:50 PM

एल्विन टॉफलर ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘फ्यूचर शॉक’ (1970) में एक ऐसी भविष्यवाणी की थी जो आज पूरी तरह सत्य साबित हो रही है। उन्होंने कहा था कि तकनीकी और सामाजिक बदलाव इतनी तेजी से होंगे कि इंसान का दिमाग और भावनाएं उन्हें संभाल नहीं पाएंगी। इस स्थिति को उन्होंने ‘फ्यूचर शॉक’ नाम दिया, यानी भविष्य का झटका। टॉफलर के अनुसार, औद्योगिक युग में बदलाव धीमे होते थे, लेकिन 20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी में जानकारी, तकनीक और जीवनशैली में बदलाव इतनी तेजी से आएंगे कि लोग लगातार तालमेल (एडजस्टमेंट) की कोशिश में थक जाएंगे। वे लिखते हैं कि जब बदलाव की गति इंसान की तालमेल क्षमता से ज्यादा हो जाती है, तो व्यक्ति में तनाव, भ्रम, चिंता और निर्णय लेने में असमर्थता पैदा होती है। उन्होंने तीन तरह के झटकों की बात की। तकनीकी बदलाव (नई मशीनें, कंप्यूटर), सामाजिक बदलाव (परिवार, रिश्ते, काम का तरीका), सांस्कृतिक बदलाव (मूल्य, विश्वास, जीवनशैली) टॉफलर ने चेतावनी दी कि अगर समाज ने इस तेजी को नियंत्रित नहीं किया, तो लोग ‘ओवरलोड’ महसूस करेंगे। जानकारी की बाढ़, विकल्पों की अधिकता और लगातार अनिश्चितता से। आज सोशल मीडिया, स्मार्टफोन और 24×7 न्यूज से हम ठीक वही अनुभव कर रहे हैं। टॉफलर की भविष्यवाणी ने हमें बताया कि बदलाव अच्छा है, लेकिन उसकी गति अगर इंसान से ज्यादा तेज हो, तो वह ‘शॉक’ बन जाता है।

टॉफलर ने आधी सदी के और पहले भविष्य का अपना जो अनुमान सामने रखा था वह कई टुकड़ों में सही साबित हो रहा है। आज इंफर्मेशन ओवरलोड दुनिया के लोगों की एक बहुत बड़ी समस्या बन चुका है। जो देश, समाज, या व्यक्ति जितने अधिक विकसित, संपन्न, या कामकाजी हैं, वे उतने ही अधिक थके हुए भी हैं। जिस तरह किसी ऊंची इमारत पर रेत की बोरी चढ़ाते हुए मजदूर थकते हैं, कुछ वैसे ही आज लोग थके हुए हैं। अमरीका की एक शोध रिपोर्ट बताती है कि वहां एक औसत व्यक्ति दिन में 74 बार फोन चेक करते हैं, और साल में हजारों घंटे से ज्यादा डिजिटल कंटेट पढ़ते, सुनते, या देखते हैं। बहुत से लोग व्यस्त कामकाजी रहते हैं, और वे कंप्यूटरों पर काम करते हुए कुछ सुनते भी रहते हैं, या किसी दूसरी स्क्रीन पर कुछ देखते भी रहते हैं। यह डिजिटल-सहूलियत लोगों पर एक पीढ़ी के भीतर ही आ गई है। 1990 के दशक के लोगों को टीवी, और साधारण मोबाइल फोन ही हासिल थे। धीरे-धीरे वॉक-मैन जैसे चलते-फिरते संगीत उपकरण भी मिलने लगे। लेकिन तब से अब तक की एक पीढ़ी के भीतर ही अब नए लोग दिन में 8-10 घंटे तक स्क्रीन पर गुजारने लगे हैं। इंसानी दिमाग का विकास लाखों बरस में हुआ, लेकिन डिजिटल युग ने इसे इस तेजी से बदला है और एक साथ बहुत से काम करने का बोझ उस दिमाग पर लाद दिया है जो एक वक्त पर दो-चार ही चीजों पर ध्यान देता था। अब हर स्क्रीन एक औसत व्यक्ति के लिए कई तरह के मैसेंजरों पर लगातार संदेश या सूचना लाती है, सोशल मीडिया के जाने कितने ही प्लेटफॉर्म पर उसे उसकी दिलचस्पी के फोटो-वीडियो, या पोस्ट सुझाती है, दफ्तर या कारोबार का काम लादती है, दोस्तों या रिश्तेदारों के सुख और दुख की खबरें पहुंचाती है। एक स्क्रीन आज इंसानों के आंख-कान के रास्ते उसके दिमाग को चारों तरफ से सूचनाओं से घेर देती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि दिमाग की वर्किंग मेमोरी सीमित रहती है, और ओवरलोड से आगे का सीखना भी धीमा होता है, और बुरी तरह प्रभावित होता है। यह ठीक उसी तरह का है जैसे कम क्षमता के कंप्यूटर, धीमे प्रोसेसर पर कोई बड़ा सा वीडियो एडिट करने के लिए बैठ जाए। कुछ मनोवैज्ञानिकों का यह कहना है कि जब किसी व्यक्ति के सामने देखने, सुनने, पढऩे की अपार पसंद पेश हो जाती है, तो उनकी पसंद करने की क्षमता को लकवा सरीखा मार जाता है। हमारा खुद का यह मानना है कि जब लोग लगातार, पल-पल निजी, कारोबारी, और महज दिलचस्पी के संदेशों और पोस्ट से घिरे रहते हैं, तो इन सबको पल-पल देखने की उनकी बेचैनी बढ़ती जाती है। कुछ दशक पहले जब ई-मेल शुरू हुआ तो पश्चिम की एक संपन्न महिला एक सैलानी जहाज पर गई हुई थी। समंदर के बीच उस वक्त उसे इंटरनेट हासिल नहीं था, और अपने ई-मेल बॉक्स में झांके बिना उसे चैन नहीं पड़ रहा था। ऐसे में उसने जहाज से संदेश भिजवाकर किराए का हेलिकॉप्टर बुलवाया उससे वह किनारे पहुंची, अपना ई-मेल बॉक्स देखा, जिसमें कुछ भी काम का नहीं था, लेकिन इसके बाद ही वह लौटकर सैलानी जहाज पर अपना बाकी का वक्त चैन से गुजार सकी।

आज फ्रांस सरीखे कुछ विकसित देशों ने ऐसे कानून बना दिए हैं कि कोई भी कंपनी, या एम्प्लॉयर अपने किसी कर्मचारी को दफ्तर या कंपनी के कामकाज के बारे में काम के घंटों के बाद न कोई संदेश भेज सकते, न कोई ई-मेल भेज सकते। सरकार का मानना है कि अगर दफ्तर का कोई ई-मेल आया हुआ रहता है, तो घर बैठे या पिकनिक पर गए हुए लोग भी उसे खोलकर पढ़े बिना चैन से नहीं रह सकते। ऐसी बेचैन हो चुकी दुनिया ने एक-दो पीढ़ी के भीतर ही दिन में एक बार आने वाले अखबार, या कुछ बार आने वाले रेडियो-टीवी के बुलेटिन से परे ले जाकर अब उसे पल-पल खबर देना शुरू किया है। बहुत से लोग ऐसे समाचार-संदेशों के साथ नोटिफिकेशन भी चालू रखते हैं, और नतीजा यह होता है कि दूर कहीं किसी हादसे में 20 लोगों के मरने की खबर पुख्ता होने के पहले वे उसके एक दर्जन नोटिफिकेशन देख चुके रहते हैं, और इनमें से किसी से उनका अधिक लेना-देना नहीं रहता, किसी को भी अपनी जिंदगी में पल-पल की ऐसी खबर की जरूरत नहीं रहती, सिवाय खबरों के पेशे में काम करने वाले लोगों के। लेकिन आज हालत यह है कि तरह-तरह के मीडिया के नोटिफिकेशन लोग लेना शुरू करते हैं, और अपने दिमाग की धार कम हो जाने तक भी वे उसमें उलझे रहते हैं। दूसरा यह कि लोग अपनी पसंद या अपने शौक से बिना किसी उपयोग की फालतू की रील देखते घंटों गुजार देते हैं। इसके बाद ऐसी रील दिखाने वाले प्लेटफॉर्म उनकी पसंद भांपकर उनके सामने वैसी ही पोस्ट की कतार लगा देते हैं। किसी के नशे का अंदाज लगाकर उसके सामने उसी नशे की कतार लगा देने जैसा यह काम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लगातार कर रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि लोगों की अपनी कोई पसंद सीमित करना उनके हाथ में नहीं रह जाता, सोशल मीडिया के एल्गोरिदम हर दिन उनकी पसंद पर अधिक हद तक कब्जा करते चलते हैं, और वे डिजिटल कैदी होकर रह जाते हैं। आज चारों तरफ थोड़े से समझदार लोग भी लगातार नोटिफिकेशन की आवाज बंद करने का काम कर रहे हैं, बहुत से समझदार लोग अपने ऊपर ही बंदिश लगा लेते हैं कि वे दिन में एक या दो बार से अधिक बार सोशल मीडिया को चेक नहीं करेंगे। कुछ लोग छुट्टी के दिन को डिजिटल डी-टॉक्स की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं, स्क्रीन से उपवास का एक दिन। यह अनुशासन याद दिलाता है कि किस तरह दुनिया के बहुत सारे धर्मों में हफ्ते में एक दिन खान-पान के उपवास का रहता था, अब लोग खान-पान के साथ-साथ अपने धार्मिक आराध्य के किसी दिन, या छुट्टी के दिन डिजिटल-उपवास कर सकते हैं।

हम मनोविज्ञान की भाषा में बहुत अधिक तकनीकी जानकारी यहां देना नहीं चाहते, लेकिन लोग इतना जरूर समझ लें कि जिस तरह एक सब्जीवाली के टोकरे पर अंधाधुंध वजन रहने से उसकी गर्दन का हमेशा के लिए नुकसान होता था, जिस तरह ओवरलोड मजदूर अपने बदन का नुकसान झेलते हैं, ठीक वैसे ही आज लोग स्क्रीन का नुकसान झेल रहे हैं। लोगों को बहुत सोच-समझकर आज चारों तरफ से हो रही कंटेट की बौछार को संभलकर झेलना चाहिए, वरना प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की वॉटर-कैनन की धार जिस तरह उनके पांव उखाड़ती है, उसी तरह आज इंसान की जिंदगी में डिजिटल बौछारें तेज धार से उसके दिमाग के पांव उखाड़ रही हैं। यह नौबत ऐसी भयानक है कि लोग इसे अपनी कामयाबी मानते हैं कि वे कितना कुछ देख लेते हैं, और उन्हें समझ ही नहीं पड़ रहा कि वॉटर-कैनन की धारदार मार से अस्पताल पहुंच जाने वाले लोगों की तरह उनके दिमाग को अस्पताल की जरूरत आ चुकी है।

अपने धार्मिक, या खान-पान के उपवास की तरह, डिजिटल उपवास के बारे में सोचें, और दिल-दिमाग के अघा जाने तक उसे कचरा न खिलाएं, सोच-सोचकर अपनी सेहत और जरूरत के लायक चीजें ही उसे परोसें। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)



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