अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में अमेरिकी लड़ाकू विमानों की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर जो टिप्पणी की है, उसे भारत और अमेरिका के बदलते रिश्ते के संदर्भ में देखना चाहिए।
डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे कहा था कि ‘सर, क्या मैं आपसे मिल सकता हूं!’ उनकी यह टिप्पणी न तो दोनों देशों के रिश्तों की गरिमा के अनूकूल है और न ही भारतीय प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा के।
डोनाल्ड ट्रंप हाल के समय में ऐसा कई बार कर चुके हैं। वह भारत पर लगातार दबाव बना रहे हैं कि वह रूस से तेल न ले। मोदी सरकार ने रूस से तेल आयात में कटौती भी कर रखी है। तीन दिन पहले ही ट्रंप ने धमकाने वाले अंदाज में कहा था कि भारत अगर रूस के साथ व्यापार जारी रखता है, तो उस पर जल्दी टैरिफ़ बढ़ाया जा सकता है।
हफ्ते भर पहले ही डोनाल्ड् ट्रंप यह कहते हुए नजर आए थे कि प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि मैं खुश नहीं हूं। उनकी इस भाषा में दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के रिश्तों की ऊष्मा नहीं, बल्कि साम्राज्यवादी मानसिकता की झलक देखी जा सकती है।
डोनाल्ड ट्रंप इससे पहले कई बार दावा कर ही चुके हैं कि उन्होंने भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम करवाया। यही नहीं, उन्होंने दावा किया था कि उनकी प्रधानमंत्री मोदी से फोन पर बात हुई है। हालांकि भारत की ओर से संसद में भी कहा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर को रोकने का फैसला किसी दबाव में नहीं लिया गया है।
लेकिन डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह के दावे कर रहे हैं और जिस भाषा में हमारे प्रधानमंत्री को संबोधित कर रहे हैं, वह अस्वीकार्य है औऱ भारत विदेश मंत्रालय की ओर से इसका पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए।
दरअसल डोनाल्ड ट्रंप की ऐसी टिप्पणियों को प्रधानमंत्री मोदी पर व्यक्तिगत टिप्पणी की तरह नहीं, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र के मुखिया पर की गई टिप्पणी की तरह देखने की जरूरत है।
वास्तविकता यही है कि अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी 2019 में प्रधानमंत्री मोदी पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। छह साल पहले जनवरी, 2019 में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहते हुए मोदी का मजाक उड़ाया था कि हमने जो पांच घंटे साथ में बिताए उसमें अधिकांश समय मोदी लगातार यह बताते रहे कि उन्होंने अफगानिस्तान में लाइब्रेरी बनवाई।
ट्रंप ने फब्ती कसी थी कि इसका इस्तेमाल कौन करेगा?याद दिलाने की जरूरत नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान किस तरह का दोस्ताना दिखाया था, यहां तक ट्रंप के चुनाव प्रचार करने से भी उन्होंने गुरेज नहीं किया था।
इसके साथ ही यह भी याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि 1960-70 के दशक के उथल-पुथल भरे घनघोर संकट के समय भी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और उनके बाद प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी से इस भाषा में बात नहीं की। इसके उलट शास्त्री और इंदिरा अमेरिकी प्रशासन के आगे झुके नहीं थे।
दरअसल समझने की जरूरत है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए भारत सिर्फ एक बाजार है और उन्हें धंधे से मतलब नहीं है। अच्छा हो कि भारतीय विदेश मंत्रालय ट्रंप की मोदी पर की गई ताजा टिप्पणी को लेकर स्थिति स्पष्ट करे।

