युद्ध, बच्चे और बर्बर सत्ताएं

NFA@0298
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युद्ध केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की हत्या है। बर्बर सत्ताएं चाहे वे राज्य हों या आतंकवादी समूह, अपनी सनक और वर्चस्व की लड़ाई में बच्चों तक को नहीं छोड़ रही हैं।

जब पूरा मध्य पूर्व युद्ध की आग में झुलस रहा है तब सबसे अधिक चिंता का विषय है बच्चों का भविष्य ही है। गजा, लेबनान, यमन, सीरिया और अब ईरान तक फैली हिंसा ने न सिर्फ इमारतों को ध्वस्त किया है, बल्कि बर्बर सत्ताओं ने लाखों मासूमों की मासूमियत, सपनों और बचपन को हमेशा के लिए छीन लिया है।

गजा में पिछले दो साल के युद्ध में हजारों बच्चों मार दिए, हजारों बच्चे यतीम हो गए। जो बच गए वो दर्दनाक घटनाओं से उपजे तनाव (पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) का शिकार हैं। एक रिपोर्ट में बताया गया कि गाजा के 80 प्रतिशत बच्चे अब नींद में चीखते हैं, भोजन देखकर कांपते हैं और स्कूल जाने से डरते हैं। उनके गुड्डे गुड़िया का खेल में भी मौत का अभियन है।

हाल ही में ईरान के मिनाब में एक स्कूल पर गिरी अमेरिकी मिसाइल ने 150 से अधिक स्कूली बच्चों को मौत की नींद सुला दिया। मिनाब के उस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे न तो सैनिक थे, न आतंकवादी। वे सिर्फ पढ़ाई और भविष्य के सपने देख रहे थे। यमन में सऊदी गठबंधन की बमबारी ने हजारों बच्चों को कुपोषण और बीमारियों की चपेट में धकेल दिया। सीरिया में असद शासन और विद्रोहियों के बीच छिड़ी जंग में केमिकल हमलों ने बच्चों के फेफड़ों को जहर दिया।

आखिर जेनेवा कन्वेंशन और यूनिसेफ के नियमों का पालन क्योंक नहीं किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पास होते हैं, रेड क्रॉस राहत सामग्री भेजता है, लेकिन हथियारों की आपूर्ति रुकती नहीं। इसका मनोवैज्ञानिक असर यह होगा कि एक ऐसी पीढ़ी जो हिंसा को सामान्य मानकर बड़ी होगी, जो संवाद की बजाय बंदूक को समाधान मानेगी।

इतिहास गवाह है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान और जर्मनी ने बच्चों के पुनर्वास पर ध्यान दिया तो समाज फिर से खड़ा हुआ। लेकिन आज मध्य पूर्व में वैसा कोई प्रयास दिखाई नहीं देता।

समय आ गया है कि बर्बर सत्ताएं समझें कि युद्ध कोई खेल नहीं, यह सभ्यता का अंत है। संयुक्त राष्ट्र को अब सिर्फ अपील नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई करनी होगी। हथियारों पर रोक, बच्चों के लिए सुरक्षित गलियारे और युद्ध अपराधियों पर तुरंत मुकदमे हों। रेड क्रॉस को और अधिक संसाधन दिए जाएं। लेकिन सबसे जरूरी है दुनिया की जनता का दबाव। जब तक हम चुप रहेंगे, तब तक मिसाइलें स्कूलों पर गिरती रहेंगी।

बच्चे युद्ध नहीं चाहते। वे सिर्फ स्कूल, किताबें, दोस्त और सपने चाहते हैं। अगर हम इस पीढ़ी को बचाने में नाकाम रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।



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