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सत्तापक्ष को याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र मात्र संख्या-बल का जुआ नहीं, बल्कि सामूहिक सहमति और संघीय एकता का पवित्र अनुबंध है। उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम तक फैला यह देश एक अखंड इकाई है, जिसकी मजबूती राज्यों की चिंताओं के सम्मान पर टिकी है। परिसीमन जैसे अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर बिना किसी व्यापक चर्चा, बिना राज्यों की सहमति और बिना भावी परिणामों की गहन समीक्षा के आगे बढ़ने की कोशिश संघीय ढांचे की जड़ों पर प्रहार था, जो कि फिलहाल विफल हुआ है।
महिला आरक्षण के नाम पर सरकार जो बिल लाई, वह दरअसल परिसीमन को लागू करने की रणनीति थी। विपक्ष ने इस मंशा को भांप लिया और नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम पर लाए गए संविधान संशोधन बिल को लोकसभा में पास नहीं होने दिया। यह 12 साल की मोदी सरकार का पहला स्पष्ट मौका था, जब सत्ता और विपक्ष की आमने-सामने की जंग में सरकार की फ्लोर पर मात हुई।
लोकसभा में यह घटना होने के 24 घंटे बाद पीएम मोदी ने देश को संबोधित किया और कहा कि विपक्ष को इसकी सजा मिलेगी। निश्चित ही प्रधानमंत्री संसदीय लोकतंत्र में किसी राजनीतिक सजा की बात कर रहे होंगे। यह भी ध्यान चाहिए कि विपक्ष ने संसदीय लोकतंत्र के अपने हथियार और अधिकार का उपयोग किया था। पीएम ने अपने संबोधन में आगे की मंशा को भी जाहिर किया कि उनकी पार्टी और सरकार पीछे नहीं हटेगी।
मोदी सरकार को पहले से पता था कि दो-तिहाई बहुमत उसके पास नहीं है। फिर भी वह बिल लेकर आई। सत्ताधारी दल दिल्ली से लेकर देश भर के मोहल्लों में यह प्रचार करने में दिन-रात जुटा हुआ था कि मोदी सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने की ‘पवित्र मंशा’ रखती है। 2011 की जनगणना के आधार पर होने वाले परिसीमन से दक्षिण भारत के राज्यों के साथ घोर अन्याय होने की आशंका थी।
प्रधानमंत्री ने भले ही यह कहा हो कि हर राज्य को कुछ न कुछ मिलता, लेकिन आज समूचा विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक भी इस बात को कह रहे हैं कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को सख्ती से लागू किया, उनकी संसदीय सीटें घटने वाली थीं, जबकि उत्तरी राज्यों की बढ़ती आबादी के कारण उनका वजन केंद्र में और भारी हो जाता। यह राजनीतिक शक्ति-संतुलन को उलट-पुलट कर देने वाला है।
यह आरोप भी आधारहीन नहीं है कि सरकार जानबूझकर महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ जोड़कर लाई थी, ताकि विपक्ष को ‘महिलाविरोधी’ ठहराकर फायदा उठाया जा सके। लेकिन कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी, सपा समेत पूरा इंडिया गठबंधन ने एकजुटता के साथ सरकार की रणनीति को मात दी। इन दलों ने कहा कि वे महिला आरक्षण का समर्थन करते हैं, लेकिन परिसीमन को इसके साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए। विपक्ष की एकजुटता के बाद नतीजा साफ था। बिल दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका और सरकार को पीछे हटना पड़ा।
दरअसल शुक्रवार को सदन में जिस तरह एनडीए की मात हुई है वह संसदीय इतिहास में दर्ज ही नहीं हुआ है बल्कि इस घटना का साफ संदेश है कि मुद्दे की स्पष्ट शिनाख्त, एकजुटता और किसी भी तरह के दबाव या अवसरवाद से मुक्त राजनीति के सामने ऐसी कोई चाणक्य नीति नहीं चलती है, जिसे भाजपा अपने साथ तमगे की तरह इस्तेमाल करती आती है।
सदन में प्रियंका गांधी ने भाजपा के कथित चाणक्य छवि वाले अमित शाह को लेकर इसी तरह का तंज वोटिंग के पहले किया था। उसी समय इस बिल को लेकर विपक्ष का भरोसा कि बिल पास नहीं होगा नजर आने लगा था।
यह पहला मौका नहीं था। तीन कृषि कानूनों को जब किसानों ने ‘काला कानून’ करार दिया और लंबा आंदोलन किया, तब भी सरकार को वापस लेना पड़ा। जीएसटी को ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कहकर जब व्यापारियों और विपक्ष ने विरोध किया, तब भी नियमों में बार-बार संशोधन करने पड़े। हर बार सरकार ने बहुमत के जोर पर फैसले थोपने की कोशिश की, लेकिन सहमति की कमी ने उसे मजबूर किया कि अल्पमत की आवाज को अनसुना नहीं किया जा सकता।
हकीकत यह है कि सरकार की मंशा, उसकी कोशिशें इतनी साफ थीं कि उसमें किसी भी तरह की चाणक्य नीति खोजने की गुंजाइश ही नहीं थी।
सत्तापक्ष के लिए यह सबक है कि संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है संघीय भावना का सम्मान। अगर यह सबक नहीं लिया गया, तो आने वाला समय और कठिन सवाल पूछेगा। यह राहत की बात है कि विपक्ष ने कम से कम उस संघीय भावना के लिए लड़ाई लड़ी।
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