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इरावती कर्वे : भारतीय, जिन्होंने नाजी थिअरी को गलत साबित किया
04-Apr-2026 10:29 PM
इरावती कर्वे भारत की पहली महिला एंथ्रोपॉलजिस्ट के साथ-साथ साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता भी थीं। जर्मनी में पीएचडी करते हुए उन्होंने अपने नाजी प्रोफेसर की नस्लभेदी थिअरी को गलत साबित किया था।
डॉयचे वैले पर रितिका की रिपोर्ट-
इरावती कर्वे को भारत की पहली महिला एंथ्रोपॉलजिस्ट के तौर पर जाना जाता है। हालांकि, बेहद कम लोगों को यह जानकारी है कि इरावती ने जर्मनी आकर अपनी पीएचडी पूरी की थी। 1920 के दशक में पीएचडी के दौरान ही उन्होंने अपने नाजी प्रोफेसर यूजीन फिशर की नस्लभेदी थिअरी को गलत साबित किया था।
इरावती का जन्म 15 दिसंबर 1905 बर्मा (अब म्यांमार) में हुआ था। उनके पिता गणेश करमरकर ने बर्मा की सबसे प्रमुख नदी ‘इरावडी’ के नाम पर बेटी को इरावती नाम दिया। वह बचपन से ही पढऩे-लिखने में बेहद होशियार थीं।
उस दौर में लगभग हर डिग्री के लिए उन्हें कोई-न-कोई स्कॉलरशिप जरूर मिली थी। साल 1926 में पुणे के फग्र्यूसन कॉलेज से उन्होंने दर्शनशास्त्र में अपनी ग्रैजुएशन पूरी की। इसके बाद मास्टर्स की डिग्री के लिए उन्हें बॉम्बे यूनिवर्सिटी से दक्षिणा फेलोशिप मिली।
आजाद खयाल थीं इरावती कर्वे
इरावती उस जमाने में भी अपने दौर से कहीं आगे की सोच रखती थीं। 1920 के दशक में एक भारतीय लडक़ी का स्कूटर चलाना, स्विमसूट पहनना या फिर अपनी मर्जी से शादी करना नामुमकिन सी बात लगती है। लेकिन इरावती ने ये सब करके दिखाया था।
उन्होंने दिनकर धोंडो कर्वे से शादी की। दिनकर एक प्रगतिशील और समाज सुधारकों के परिवार से आते थे। उन्होंने इरावती के हर फैसले में उनका साथ दिया था। इसलिए जब इरावती ने बर्लिन जाकर डॉक्टरेट करने का फैसला किया तो उनके पिता और ससुर दोनों नाराज हुए, लेकिन पति दिनकर ने साथ दिया। कर्वे ने खुद भी जर्मनी से पढ़ाई की थी, इसलिए उन्हें लगा कि इरावती की पीएचडी के लिए जर्मनी मुफीद जगह होगी।
इरावती कर्वे की नातिन और लेखिका उर्मिला देशपांडे बताती हैं, ‘वे उस जमाने में पीएचडी करने इसलिए आ पाईं क्योंकि उनके पति साथ खड़े थे। यह मुख्य वजह थी। और, ऐसा करने की उनकी अपनी इच्छाशक्ति भी इसके पीछे थी। मैंने अपनी किताब में भी लिखा है कि मैं सात साल की थी, जब उनकी मौत हुई तो एक व्यस्क के तौर पर मैं उन्हें नहीं जानती। लेकिन वो एक बेहद दृढ़ निश्चय वाली आत्मविश्वास से भरपूर इंसान थीं।’
भारत से बर्लिन तक का सफर
साल 1927 में इरावती ने जर्मनी आकर पीएचडी करने का फैसला किया। तब भारत से जर्मनी की कोई सीधी फ्लाइट तो थी नहीं। पानी के जहाज में कई हफ्तों का सफर तय करके वह हैम्बर्ग पोर्ट पहुंचीं और वहां से बर्लिन की ट्रेन पकड़ी।
इरावती को ‘काइजर विलहेल्म इंस्टीट्यूट ऑफ एंथ्रोपॉलजी’ में रिसर्च के लिए दाखिला मिला था। उनके पीएचडी सुपरवाइजर थे, जर्मन वैज्ञानिक प्रोफेसर यूजीन फिशर। यह वही शख्स थे, जिन्होंने यह ‘थिअरी’ सामने रखी थी कि वाइट यूरोपियंस की खोपड़ी एसिमेट्रिकल होती है। उनके दिमाग का दाईं तरफ का हिस्सा ज्यादा बड़ा होता है, जो उनकी श्रेष्ठता का सबूत है।
फिशर ने इरावती को एक टास्क दिया, जिसमें उन्हें यूरोपीय नस्ल की खोपडिय़ों की तुलना दूसरी नस्लों की खोपडिय़ों से करनी थी। और, यह साबित करना था कि यूरोपीय नस्ल ज्यादा तार्किक और समझदार होती है। इसके लिए इरावती को 149 इंसानी खोपडिय़ों पर यह स्टडी करनी थी।
स्टडी में शामिल दूसरी नस्लों की खोपडिय़ां रवांडा, तंजानिया और मेलानेशिया से थीं। तब इनमें से कुछ इलाके जर्मनी की कॉलनी हुआ करते थे। उर्मिला देशपांडे ने अपनी किताब में लिखा है अपनी रिसर्च के दौरान इरावती इन खोपडिय़ों से माफी मांगती थीं।
फिशर की थिअरी का हिटलर ‘कनेक्शन’
महीनों की मेहनत के बाद इरावती ने अपनी थीसिस में वही लिखा, जो उन्होंने महसूस किया। उन्होंने लिखा कि इंसानी खोपड़ी के एसिमेट्रिकल होने का नस्ल से कोई लेना-देना नहीं है। और, यह किसी के बुद्धिमान होने का सबूत तो कतई नहीं है।
इससे भी आगे बढक़र उन्होंने एक अलग थिअरी रखी कि इंसानी खोपड़ी की बनावट उस माहौल और वातावरण की देन है, जिसमें वह पला-बढ़ा होता है। कौन किस नस्ल से है, इससे उसकी खोपड़ी की बनावट का कोई लेना-देना नहीं होता।
इरावती ने फिशर की थिअरी को पूरी तरह अवैज्ञानिक घोषित कर दिया। इससे प्रोफेसर फिशर को गुस्सा आया। फिशर ने इरावती को फेल नहीं किया, लेकिन बस उतने ही ग्रेड दिए जो डॉक्टरेट के एक विद्यार्थी के पास होने के लिए जरूरी थे। यानी, न्यूनतम।
1923 में जब एडोल्फ हिटलर जेल में था, तब उसने फिशर की यह नस्लभेदी थिअरी पढ़ी थी। अपनी ‘प्योर आर्यन रेस’ की नस्लभेदी ‘विचारधारा’ की प्रेरणा उसने फिशर के काम से ली थी। 1940 में फिशर ने आधिकारिक तौर पर नाजी पार्टी भी जॉइन कर ली।
फिशर की ‘नस्ली श्रेष्ठता’ की थिअरी की बुनियाद पर हिटलर ने यहूदी विरोधी न्युरेमबर्ग कानून बनाए। इन कानूनों ने नाजी नस्ली विचारधारा को संस्थागत और कानूनी रूप दे दिया। लेकिन, फिशर की इस थिअरी को इरावती ने पहले ही गलत साबित कर चुकी थीं।
हालांकि, उर्मिला ध्यान दिलाती हैं, ‘वह भारत की पहली महिला एंथ्रोपॉलजिस्ट थीं, लेकिन कभी-कभी ये कुछ ज्यादा ही हो जाता है। मतलब, अब लोग उन्हें ऐसे देखने लगे हैं जैसे वह अकेली अपने दम पर हिटलर से लड़ रही थीं।’
भारत वापसी और एक नई शुरुआत
1931 में इरावती ने अपनी थीसिस पूरी की और वह भारत लौटकर अपना काम शुरू किया। उन्होंने कई भारतीय आदिवासी समुदायों पर अध्ययन किया। जो कुछ जर्मनी से सीखा था, उसे भारत में लागू किया। इस तरह उन्हें भारत की पहली महिला एंथ्रोपोलॉजिस्ट की पहचान मिली।
इरावती जब बर्लिन आई थीं, वह दूसरे विश्व युद्ध के ठीक पहले का बर्लिन था। नाजी विचारधारा अभी उतनी हावी नहीं हुई थी, लेकिन रिसर्च के दौरान उन्होंने अपने आसपास यहूदियों के खिलाफ नफरत की भावना पनपते हुए बहुत नजदीक से महसूस किया था। भारत लौटने के बाद वह प्रोफेसर फिशर या अपने उन जानकारों या सहकर्मियों से कभी नहीं मिलीं, जिन्होंने नाजी विचारधारा का समर्थन किया था।
लेकिन जो तरीके उन्होंने जर्मनी में सीखे थे उन्हें भारत में लागू किया और इसे लेकर उनकी थोड़ी-बहुत आलोचना भी हुई। जैसा कि उर्मिला बताती हैं, "मजेदार बात यह है कि फिशर ने उन्हें जो काम दिया, वो इरावती ने किया। मैं ये कहना चाहती हूं कि उस तरीके को अपनाकर भी उन्होंने फिशर के नस्लीय सिद्धांत को गलत साबित किया। लेकिन उन्होंने मेथडोलॉजी को खारिज नहीं किया। वे उसे भारत लेकर आईं और कुछ हद तक उसका इस्तेमाल भी किया।
इरावती का काम सिर्फ इंसानी शरीर तक सीमित नहीं था। इंसानी खून के विज्ञान, भारत के इतिहास, साहित्य और महाराष्ट्र की संस्कृति पर तो उन्होंने खूब लिखा। ब्रिटेन और अमेरिका के नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों ने उन्हें बतौर लेक्चरर बुलाया।
उनकी किताब ‘युगांता’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 11 अगस्त 1970 को इरावती कर्वे इस दुनिया से चली गईं। उनका काम और योगदान आज भी इस बात का सबूत है कि एक युवा लडक़ी ने किस तरह नाजी विचारधारा की बुनियाद को चुनौती दी थी। वो भी तब, जब दुनिया ने उस विषैले, बर्बर, नृशंस, अमानवीय और अवैज्ञानिक नस्ली ‘सिद्धांत’ की चरम हिंसा नहीं देखी थी। (dw.com/hi)
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