बस्तर की समृद्ध  संस्कृति और लोक का  प्रामाणिक दस्तावेज

NFA@0298
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वर्ष 2012 पहली बार बस्तर गया था- कोंडागांव , गजब का चुंबकीय आकर्षण हैं इस इलाके में। फिर बार-बार जाता रहा। हर बार लगा कि  अभी कुछ देखा-घुमा ही नहीं ।  बस्तर  अकेले बम-बंदूक और बारूद ही नहीं है, लेकिन देश की दूसरे हिस्से को बस्तर की याद तभी आती है, जब वहाँ कोई अनहोनी होती है । बस्तर ने चरम माओवाद का दौर देखा, सलवा जुड़ूम की हिंसा देखी, लेकिन कभी आम नागरिक या बाहर से गए लोगों को कोई चोट नहीं पहुंचाई ।

बस्तर पर आम तौर पर वहां के जनजातीय जीवन या लोक कथाओं पर या फिर नक्सलवाद पर लिखा जाता रहा है। बस्तर इससे अधिक है । गंभीर अध्येता , बस्तर की तीन प्रमुख बोलियों- हलबी, भतरी  और गोंडी के जानकार, रंगकर्मी और  नृशास्त्री  रुद्र नारायण पाणिग्रही ने इस पर गंभीर काम किया है। उन्होंने जिस मेहनत से बस्तर के हर रंग को पाँच खंडों में समेटा है, वह स्तुत्य कार्य है ।

कांगेर घाटी की कोटमसर गुफा में प्रागेतिहासिक काल में इंसान के रहने के प्रमाण मिले हैं। यह पहले दक्षिण कोसल नाम से जाना जाता था। आज के भूगोल के लिहाज से बस्तर के एक तरफ ओडिशा है, तो पास में ही झारखंड की सीमा लगती है, तो तेलंगाना और उत्तर प्रदेश की भी। इंद्रावती नदी के सहारे यहां महाराष्ट्र लगा है , फिर मध्य प्रदेश तो है ही, जिससे अलग हो कर छत्तीसगढ़ बना था। तभी बोली-भाषा हो या लोक-संस्कार, रीति-रिवाज हो या भोजन, बस्तर अंचल में इसका वैविध्य हर जगह मिल जाता है।

‘‘बस्तर’’ बाहरी दुनिया के लिए एक ऐसा नाम जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित तो करता है, लेकिन वहां कोई भी वह सब कुछ नहीं देखना चाहता, जो सामने दिखता है, वे देखना चाहते हैं हाथ में असलहा लिए नक्सलियों को, समाज के सामने आने से परहेज करने वाले आदिवासियों को और वहां की अकूत प्राकृतिक संपदा को। भरोसा ना हो तो जरा बताएं कि कहीं दिल्ली में पढ़ा-सुना है कि यहां हर साल कोई सौ लोग पीलिया से मर गए हैं।

जुलाई-अगस्त में अबूझमाड़ के जंगलों में  ना जने कितने आदिवासी हैजा-अतिसार से हर साल जान देते है। भले ही देश में मलेरिया घट रहा हो, लेकिन यहां मलेरिया मौसम की तरह मार करता हे। इस बात का लेखा-जोखा तो हर हफ्ते छपता रहेगा कि कब किसने कितने लोगों को मार गिराया, लेकिन साफ पानी या दवा के अभाव के चलते बेआसरा मरने वालों की सुध दिल्ली लेती नहीं है।

बस्तर असल में एक भौगोलिक क्षेत्र है । किसी स्थान विशेष के नाम पर बस्तर असल में एक छोटा सा गांव है-रायपुर से विशाखापत्तनम जाने वाले राजमार्ग पर कोंडागांव से जगदलपुर के बीच, जहां के राजा का महल, किसी गांव के आम किसान के घर की तरह सड़क पर ही दिखता है। 

बस्तर नाम से कभी इतना बड़ा जिला हुआ करता था कि केरल राज्य उसके क्षेत्रफल के सामने छोटा था। आज उस बस्तर को सात जिलों में बांट दिया गया है – कांकेर, कोंडागांव, जगदलपुर, नारायणपुर, बीजापुर, दंतेवाड़ा और कोंटा। इस संभाग का मुख्यालय जगदलपुर है। कह सकते हैं कि बस्तर की राजधानी अब जगदलपुर बन गया है।

जगदलपुर को समझे बगैर बस्तर को बूझना जरा मुश्किल होगा। यहां देश के हर राज्य, भाषा के लोग हैं – उड़िया, तेलुगु, उ.प्र व बिहार के , नेपाल और पूर्वोत्तर राज्यों के, ईसाई मिशिनरी में काम करने वाले बहुत से तमिल व मलयाली, सिख-सिंधी, बंगाली….. गजब बसावट है। तभी तो यहां जमीन के दाम रायपुर से भी ज्यादा हैं। यहां कई रिर्सोट्स हैं । कहते हैं कि बस्तर में पैसा कमा कर यहीं खर्च किया तो प्रगति होगी, यदि पैसा बाहर ले जाने की कोशिश की तो बर्बादी। तभी यहां जो कोई भी नौकरी-व्यापार को  आया , यहीं बस गया। कहते हैं कि जो यहाँ बस गए, वो तर गया – सो यह बस्तर कहलाया।

बस्तर का अपना समृद्ध इतिहास है, जो रखरखाव के बगैर नष्ट हो रहा है। यहां की अपनी बोलियां-साहित्य-संस्कार हैं जो यहां की बेशकीमती जमीन व अयस्कों की खरीद में लुप्त हो रही हैं, यहां का मधुर संगीत-नाट्य- नृत्य बारूद की गंध में बेसुध हो रहा है।

जगदलपुर में ही देख लें यहां के पारंपरिक शिल्प बाजार पर पूरी तरह बंगालियों का कब्जा है, स्थानीय आदिवासी केवल पत्थर-लकड़ी-धातु तराशता है, उस पर मुनाफा दूसरे ही कमाते हैं। एक और चौंकाने वाला आंकडा गौरतलब है कि बस्तर अंचल में आदिवासियों की जनसंख्या ना केवल कम हो रही है, बल्कि उनकी प्रजनन क्षमता भी कम हो रही है।

यहां कुपोषण, उल्टी-दस्त और मलेरिया जैसी बीमारियों के कारण हर साल हजारों लोगों का मरना सरकार व समाज की संवेदना को झकझोरता नहीं है।  बस्तर के जंगल, वनोपज, अयस्कों पर सभी अपना हिस्सा चाहते हैं, लेकिन यहां के सामाजिक दर्द, सांस्कृतिक क्षरण और पर्यावरणीय संकटों को गंभीरता से लेने को कोई तैयार नहीं है। 

इसका 65,96.90 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्रफल बेल्जियम, इजराइल जैसे दर्जनों देशों से बड़ा था। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार बस्तर संभाग की जनसंख्या तीस लाख नब्बे हजार आठ सौ अट्ठाईस है, जो छत्तीसगढ़ की कुल जनसंख्या का 12.09 प्रतिशत है। बस्तर संभाग की 86.46 प्रतिशत अर्थात 2672634 ग्रामीण अंचलों में रहती है। शहरी आबादी महज 13.54 प्रतिशत ही  है । यहां के आंचलिक गांव बहुत दूर-दूर बसे हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के लिए लंबा चलना पड़ता है। संभाग के प्रति किलोमीटर क्षेत्र में महज औसतन 79 लोग ही रहते हैं।

बड़ा सवाल है इन दिनों ! क्या अब नक्सल मुक्त बन कर बस्तर का विकास हो जाएगा जिससे स्थानीय आदिवासियों के जीवन में भी बदलाव आ जाएगा ?

यहाँ के लिए योजना-नीति बनाने वालों को असली बस्तर को समझना होगा  और इसके लिए रुद्र नारायण पाणिग्रही की हाल में आई पाँच खंडों की किताब आधार सामग्री हो सकती है । बस्तर के बारे में “समग्र बस्तर” के पाँच खंड में पहला – लोक संस्कृति पर केंद्रित है, जिसमें बस्तर की नदियां, ताल तलैया, , लोकनृत्य और गीत,  देवी देवता, मुर्ग लड़ाई , शिल्प, भोजन आदि पर सामग्री हैं । दूसरा खंड इतिहास और पुरातत्व पर है ।

लेखक ने दूरस्थ गाँव और मजरों तक पहुँच  कर ऐसे दुर्लभ स्थानों को शब्दों में उकेरा है जिस पर शायद सरकारी तंत्र की निगाह भी नहीं गई । इसमें पाषाणकालीन बस्तर से नागवंश , चालुक्य शासन  के बस्तर से ब्रितानी  हुकूमत के पॉलिटिकल एजेंट के बस्तर तक का विवरण हैं।  बस्तर के महत्त्वपूर्ण शिलालेख के विवरण और उनके चित्र यहाँ के समृद्ध अतीत से रूबरू करवाते  हैं ।  बस्तर की पुरातन प्रशासनिक व्यवस्था-  मुकासे और जागीर , परगनों  के संचालन का विवरण इस खंड में है ।

बस्तर में पर्यटन और तीज त्योहार पर केंद्रित तीसरे खंड में इस क्षेत्र के बहुत सारे झरनों और गुफाओं का रोमांचित करने वाला विवरण है । यहाँ के कई  ऐतिहासिक मंदिरों से जुड़ा इतिहास और वहाँ पहुँचने के मार्ग सहित  बस्तर के मशहूर दशहरा और गोन्चा  का विवरण भी आकर्षित करता  है ।  धरती की उत्पत्ति, इंसान के आपसी संबंध, देवताओं की कृपया जैसे विषयों पर  बस्तर के अलग- अलग आदिवासी समूहों में अलग -अलग मान्यताएं हैं ।

चौथे खंड में ऐसी ही लोक कथाओं को समेत गया है। इसके अलावा बस्तर की विभिन्न शिल्प कलाओं जैसे- बांस , भित्ति ,  लौह , काष्ठ , गोदना यदि पर बड़ी बारीकी से  शोध किया है।  पाँचवें  खंड में  बस्तर की प्रशासनिक और सर्वाधिक प्रचलित भाषा हलबी पर विस्तार   से सामग्री है । इसमें लोक कथाएं, पहेलियाँ  , कहावत और मुहावरे तो हैं ही , हलबी के व्याकरण को भी प्रस्तुत किया गया है ताकि इन किताबों को पढ़ कर यदि कोई शोधार्थी  बस्तर जाए तो उसे स्थानीय संवाद में सहूलियत हो।

कोई 2100 पन्नों में बस्तर को बूझने का यह प्रयास अनूठा  है। हाँ !  उन लोगों को निराशा हो सकती है, जो बस्तर में  केवल नक्सल पढ़ना – देखना चाहते  हैं । बस्तर जैसे  दुरूह क्षेत्र में   भीतर तक जाना और सामग्री को सचित्र प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत करना बेहद कठिन कार्य है क्योंकि यहाँ आज भी बहुत सी जगह न सड़क है और न ही  मोबाइल के सिग्नल ।



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