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द लेंस के लिए विशेष रिपोर्ट माधवी शर्मा गुलेरी (स्वतंत्र पत्रकार और पर्वतारोही) की
माउंट एवरेस्ट की ऊँचाइयों पर जब हवा सांसें छीनने लगती है और हर कदम जीवन और मृत्यु के बीच का फर्क बन जाता है, तब वहां कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो दूसरों के लिए रास्ता बनाते हैं। लेकिन इस बार कहानी बिल्कुल अलग है- एक अनुभवी शेरपा, जो खुद डेथ ज़ोन में खो गया था, छह दिनों बाद रेंगते हुए जीवन की ओर लौट आया।
यह कहानी है नेपाल के वरिष्ठ पर्वतारोहण गाइड हिलेरी दावा शेरपा की- एक ऐसी वापसी, जिसे उनके साथी “चमत्कार” कह रहे हैं और दुनिया का पर्वतारोहण समुदाय इसे “एवरेस्ट की सबसे अविश्वसनीय सच्चाइयों” में से एक मान रहा है।
माउंट एवरेस्ट सीज़न अपने चरम पर था। एवरेस्ट की ढलानों पर सैकड़ों पर्वतारोही ऊपर से नीचे की ओर लौट रहे थे। मौसम का संकरा ‘विंडो पीरियड’ खत्म होने के करीब था और हर टीम तेज़ी में थी।
इसी हलचल के बीच, 29 मई 2026 को हिलेरी दावा शेरपा अपने एक क्लाइंट के साथ ऊपर के कैम्प से नीचे उतर रहे थे। यह वह क्षेत्र है जो 8,000 मीटर से थोड़ा नीचे है- जहाँ ऑक्सीजन बहुत कम और एक ग़लत निर्णय की कीमत बहुत बड़ी होती है।
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यहीं कहीं, कैंप 3 और कैंप 4 के बीच, वे अलग हो गए।
कुछ समय तक सबको ये लगता रहा कि शायद वे पीछे रह गए होंगे, जल्द ही नीचे पहुँच जाएंगे। लेकिन घंटे दिन में बदल गए, और फिर वे संपर्क से पूरी तरह बाहर हो गए।
और यह भी एक दिलचस्प संयोग है कि 29 मई को एवरेस्ट डे के रूप में याद किया जाता है- 1953 में इसी दिन सर एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे शेरपा ने पहली बार माउंट एवरेस्ट पर सफल चढ़ाई की थी। ठीक उसी दिन, 2026 में हिलेरी दावा शेरपा अपनी टीम से अलग होकर लापता हो गए।
एवरेस्ट का वह हिस्सा जहाँ हिलेरी दावा शेरपा लापता हुए, उसे पर्वतारोहियों की दुनिया में “डेथ ज़ोन” कहा जाता है। यहाँ:
•ऑक्सीजन सामान्य स्तर से लगभग एक-तिहाई रह जाती है
•शरीर धीरे-धीरे ख़ुद को खाना शुरू कर देता है
•निर्णय क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होती है
•और बिना ऑक्सीजन के लंबे समय तक जीवित रहना लगभग असंभव माना जाता है
यहाँ सवाल यह नहीं होता कि आप कितने मजबूत हैं- सवाल यह होता है कि आपका शरीर कब हार मान लेगा!
रिपोर्ट्स के अनुसार, हिलेरी दावा संभवतः ख़राब मौसम, थकान और रास्ते से भटकने के कारण पीछे छूट गए। अनौपचारिक रूप से यह भी कहा जा रहा है कि शायद वे ख़तरनाक दरार या किसी अस्थिर बर्फ़ीली ढलान में फँस गए थे। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वो किसी भी अनुमान से परे था।
जो लोग एवरेस्ट की ऊँचाइयों पर काम कर चुके हैं, वे जानते हैं कि 7,000 मीटर के ऊपर शरीर पर हर समय हमले होते हैं।
हिलेरी दावा शेरपा के लिए अगले छह दिन संघर्ष का ऐसा सिलसिला थे, जिसके बारे में अभी भी पूरी तस्वीर स्पष्ट नहीं है। लेकिन जो जानकारी सामने आई है, वह बेहद कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने की कहानी बयान करती है:
•सीमित या लगभग शून्य भोजन और पानी
•लगातार घटती शारीरिक और मानसिक ऊर्जा
•अत्यधिक ठंड, जो हड्डियों तक असर करती है
•और सबसे खतरनाक- ऑक्सीजन की भारी कमी
कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, वे किसी हिम दरार (crevasse) में फँस गए थे, जिससे बाहर निकलने में उन्हें काफी समय लगा। इसके बाद उन्होंने बेहद धीमी गति से, रेंगते हुए, नीचे की दिशा में यात्रा जारी रखी।
छठे दिन… एक चमत्कार हुआ! सागरमाथा पॉल्यूशन कंट्रोल कमेटी (SPCC) की एक टीम, जो एवरेस्ट क्षेत्र में सफाई और निगरानी का काम करती है, खुम्बू आइसफॉल के पास गश्त पर थी। उन्हें बर्फ के बीच एक हलचल दिखाई दी। पास जाकर देखा गया- एक व्यक्ति बेहद कमजोर हालत में, बर्फ पर लगभग रेंगता हुआ आगे बढ़ रहा था।
शरीर थका हुआ, कपड़े जमे हुए, लेकिन आँखों में अभी भी जीवन बाकी था। वो हिलेरी दावा शेरपा थे। रेस्क्यू टीम ने तुरंत उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया और प्राथमिक उपचार दिया। बाद में उन्हें नीचे बेस कैंप और फिर काठमांडू अस्पताल भेजा गया।
काठमांडू में डॉक्टर बता रहे हैं कि हिलेरी दावा शेरपा को गंभीर फ्रॉस्टबाइट और अत्यधिक थकान है। शरीर लंबे समय तक ऑक्सीजन और पोषण की कमी से प्रभावित हुआ है। लेकिन सबसे बड़ी राहत यह है कि:
•वे होश में हैं
•संवाद कर पा रहे हैं
•और धीरे-धीरे रिकवरी की ओर बढ़ रहे हैं
उनके परिवार और शेरपा समुदाय के लिए यह ख़बर किसी चमत्कार से कम नहीं है!
एवरेस्ट की हर सफल चढ़ाई के पीछे शेरपा समुदाय की अदृश्य मेहनत होती है। वे-
•रस्सियाँ लगाते हैं
•रास्ता बनाते हैं
•भारी सामान उठाते हैं
•और अक्सर दूसरों की जान बचाते हैं लेकिन कई बार, ख़ुद वही लोग सबसे ज्यादा जोखिम में होते हैं।
हिलेरी दावा शेरपा की कहानी इस सच्चाई को और पुख़्ता करती है कि पर्वतारोहण की दुनिया में “हीरो” अक्सर सबसे पहले ख़तरे में होते हैं। एक सवाल- जो अब भी सवाल ही है
हिलेरी दावा शेरपा की कहानी सिर्फ एक रेस्क्यू नहीं है। यह उस सिस्टम की कहानी भी है जो हर साल दुनिया के सबसे ऊँचे पर्वत पर खुद को दोहराती है। यह घटना कई बड़े सवाल खड़े करती है:
हिलेरी दावा शेरपा का जीवित लौटना सिर्फ एक मेडिकल रिकवरी नहीं है। यह एक संदेश है- मानव शरीर की सीमाओं का, हिमालय की कठोरता का, और उस अदृश्य संघर्ष का जो हर बार- हर सीज़न में एवरेस्ट की ढलानों पर चलता है। दावा शेरपा बचे हैं- लेकिन उनकी कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि एवरेस्ट पर सफलता और जीवित रहने के बीच की दूरी कितनी कम हो चुकी है।
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