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नई दिल्ली। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के चुनाव आयोग (Election Commission) के कार्यालय से जारी एक विवादास्पद आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें कथित तौर पर लगभग 800 व्यक्तियों को ‘उपद्रवी’ के रूप में पहचाना गया था और विधानसभा चुनावों से पहले उनके खिलाफ कार्रवाई का आह्वान किया गया था।
न्यायालय ने प्रथम दृष्टया यह पाया कि जब चुनावी अपराध पहले से ही कानून द्वारा शासित हैं, तो चुनाव आयोग इस तरह का व्यापक निर्देश जारी नहीं कर सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में पुलिस पर्यवेक्षक द्वारा जारी 21 अप्रैल, 2026 के ज्ञापन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अंतरिम आदेश पारित किया।
न्यायालय ने टिप्पणी की, ‘हमारी प्रथम दृष्टया राय में, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में पुलिस पर्यवेक्षक ने कुछ नागरिकों को ‘उपद्रवी’ मानकर व्यापक निर्देश जारी करने में गलती की है।’
तदनुसार, पीठ ने आदेश दिया कि अंतरिम उपाय के रूप में, हम दिनांक 21.04.2026 के विवादित आदेश के प्रभाव और संचालन पर जून 2026 के अंतिम दिन तक या अगले आदेश तक, जो भी पहले हो, रोक लगाना उचित समझते हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय ने तर्क दिया कि विवादित ज्ञापन में कहा गया है कि संलग्न सूची में नामित व्यक्ति ‘मतदाताओं को डराने और चुनावी प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करने में सक्रिय रूप से शामिल थे।’
उन्होंने बताया कि सूची में पार्षदों, पंचायत सदस्यों, विधायकों और सांसदों जैसे निर्वाचित प्रतिनिधियों सहित लगभग 800 व्यक्तियों के नाम शामिल थे।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग के पास किसी भी व्यक्ति को उपद्रवी के रूप में वर्गीकृत करने का कोई अधिकार नहीं है, यह शब्द किसी भी कानून के तहत मान्यता प्राप्त नहीं है, और एक सामान्य आदेश के माध्यम से पुलिस अधिकारियों को उनके खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश देने का भी कोई अधिकार नहीं है।
आगे यह तर्क दिया गया कि चुनाव से संबंधित अपराध विशेष रूप से भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अंतर्गत आते हैं, जिसके तहत सक्षम वैधानिक अधिकारियों को स्वतंत्र रूप से विवेक का प्रयोग करना चाहिए।
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