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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए मतदान निपटते ही सरकार ने सिलेंडर के दामों में भारी भरकम वृद्धि कर दी! यह अप्रत्याशित नहीं था बल्कि बाजार को इस बात का एहसास था कि पांच राज्यों के चुनाव निबटते ही देश में ‘बहुत होगी महंगाई की मार !’
अभी कमर्शियल गैस सिलेंडरों के दाम में सीधे 993 रुपए की और छोटे सिलेंडरों में 261 रुपए की वृद्धि हुई है। अब यह चर्चा तेज है कि गैस सिलेंडरों के बाद पेट्रोल डीजल पर भी महंगाई की मार हो सकती है। विपक्ष यह आशंका पहले ही जता चुका है। महंगाई की इस ताजा मार का सीधा और सबसे ज्यादा असर तो इस देश की फूड इंडस्ट्री पर पड़ेगा।
इस वृद्धि से छोटे होटलों से लेकर स्ट्रीट फूड संचालक तक कराह उठे हैं। उनकी समस्या यह है कि वो कीमतें बढ़ाएंगे तो ग्राहक कम हो जायेंगे और नहीं बढ़ाएंगे तो धंधा करना मुश्किल है। कम मुनाफे में गुजारा करना इन छोटे व्यवसायियों की मजबूरी होगा। इसका असर सीधे रोजगार पर भी पड़ेगा।
एक गैर सरकारी अनुमान के मुताबिक भारत में छोटे होटल, ढाबों और स्ट्रीट फूड करीब 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का धंधा है। इस देश के खाद्य बाजार की असली ताकत यह यही छोटे खाद्य कारोबारी हैं जो करोड़ों छोटी छोटी नौकरियां भी देते हैं।
मोदी सरकार के इस कदम इस केवल इस सेक्टर का अर्थशास्त्र ही नहीं बिगड़ेगा बल्कि बड़ी संख्या में रोजगार भी छिन जाने की आशंका है। प्रवासी मजदूर जो 5 किलो सिलेंडर पर निर्भर होता है उसका जीवन भी इस महंगाई से संकट में पड़ेगा ही।
इस महंगाई के बाद आम लोगों के लिए बाहर का खाना भी महंगा होगा क्योंकि इस बढ़ोतरी की कीमत तो अंततः आम नागरिकों से ही वसूली जाएगी।
दर्ज करने की बात यह है कि इसी समय पड़ोसी नेपाल की सरकार ने पेट्रोल पर दो रुपये और डीजल पर 12 रुपये की कटौती कर दी है। जबकि चीन ने अप्रैल में गैसोलीन पर 555 युआन प्रति टन और डीजल पर 530 युआन प्रति टन की कटौती की।
चीन सरकार ने जनता पर बोझ कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया। भारत, नेपाल को पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक है। सालाना लगभग 1.1 बिलियन डॉलर के उत्पाद नेपाल भेजे जाते हैं।
नेपाल पूरी तरह भारत पर निर्भर है। फिर भी, जब भारत में दाम बढ़ रहे हैं, पड़ोसी देश अपनी जनता को कुछ राहत देने की कोशिश कर रहे हैं। यह तुलना जनता के मन में स्वाभाविक सवाल भी पैदा करती है।
सरकार पहले से कह रही थी कि देश में न तेल की कमी है, न गैस की। लेकिन अचानक यह बढ़ोतरी क्यों? कारण स्पष्ट था फरवरी से अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच तनाव के चलते स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज प्रभावित हुआ। यह जलडमरूमध्य दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल व्यापार का रास्ता है। भारत की लगभग 40-60 फीसदी एलपीजी और क्रूड आयात इसी रूट से आता है।
भारत ने रूस से आयात बढ़ाया और कुछ हद तक ईरान से भी। लेकिन पहले की तरह सस्ता कच्चा तेल अब आसानी से नहीं मिल रहा। भारत में कमर्शियल सिलेंडर पूरी तरह से बाजार से लिंक्ड हैं और इन पर जीएसटी भी अधिकतम 18 % है।
सरकार का तर्क होता है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों की वजह से देश में कीमतें बढ़ाना उसकी मजबूरी है लेकिन कुछ जरूरी सवाल भी हैं। यह तो छोटा सवाल ही है कि चलते चुनाव में कीमतें बढ़ाने में सरकार के हाथ क्यों कांपे? अभी चुनाव निपटने के बाद कीमतों में भारी वृद्धि जबकि 2023 में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सरकार ने 14.2 किलो के सिलेंडर के दाम में 2 सौ रुपयों की कटौती की थी। क्या यह एक पैटर्न को नहीं दर्शाता? तब इसे रक्षा बंधन का तोहफा कहा था सरकार ने।
आज मजदूर दिवस पर इस कमरतोड़ वृद्धि को क्या कहेगी सरकार ? लेकिन बड़ा सवाल है कि पिछले दिनों जो सस्ती क्रूड डील्स का दावा किया गया था, उसका एलपीजी की कीमतों में क्या लाभ मिला ?
रुपए की कीमतों में गिरावट ऐसी वृद्धि के लिए कितनी जिम्मेदार है और इसकी जिम्मेदारी किस पर होनी चाहिए ? क्या इसका रिश्ता अंततः हमारी अपनी आर्थिक नीतियों से नहीं है ?
भारत को क्यों ईरान जैसे भारत हितैषी देश से आयात सीमित करना पड़ा, इसका भी जवाब सरकार को देना चाहिए। कौन नहीं जानता कि अमरीका के दबाव का भारत की जनता किस किस तरह खामियाजा भुगत रही है ?
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1956 में देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के मकसद से तत्कालीन सोवियत रूस के सहयोग से ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन ( पहले कमीशन ) – ओएनजीसी की स्थापना की थी।
ओएनजीसी इस देश की ताकत थी लेकिन दुर्भाग्य से सार्वजनिक क्षेत्र की इस कंपनी पर अब विनिवेशीकरण और निजीकरण की तलवार लटक रही है।
देश के तेल और गैस के सेक्टर पर कॉरपोरेट नजरें टिकी हैं और जिस तरह एयरइंडिया का निजीकरण हुआ, आसान तो नहीं पर गैस और तेल सेक्टर के भी निजीकरण का खतरा है ही।
दअरसल ऊर्जा के क्षेत्र हमें पूरी तरह आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए लम्बा सफर तय करना होगा और आज की सरकार की नीतियां इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय बाजार,कॉर्पोरेट और मुनाफे के शिकंजे से मुक्त करने की दिशा में नजर नहीं आतीं।
अगर गैस या तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार से नियंत्रित हैं तो चीन या नेपाल जैसे देश इनकी कीमतों में कमी कैसे कर पा रहे हैं ? साफ है कि ऐसी स्थिति में घरेलू नीतियां महत्वपूर्ण होती हैं। क्यों नहीं सरकार को गैस सिलेंडरों पर जीएसटी की दर घटा कर जनता के एक बड़े हिस्से को राहत देनी चाहिए ?
पेट्रोलियम सेक्टर से सरकार की कमाई कम नहीं है लेकिन दुर्भाग्य है कि आज देश में राहत की पाइप लाइन सिर्फ बड़े कॉरपोरेट्स तक ही पहुंचती है। याद होगा कि 2019 में कॉरपोरेट टैक्स रेट में कटौती से सरकार ने करीब डेढ़ लाख करोड़ या इससे भी ज्यादा का राजस्व छोड़ कर बड़े उद्योगपतियों को राहत दी थी।
जबकि उसी दौर में, 2023-24 के बजट में LPG सब्सिडी 75% घटा दी गई – 9,170 करोड़ रुपए से सीधे 2,257 करोड़ रुपए कर दी गई। ताजा वृद्धि का सड़क पर विरोध हो न हो पर इससे आने वाले दिनों में हाहाकार ही मचेगा, इंतजार कीजिए।
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