दूषित पानी पीने से हुई मौतों के कारण सुर्खियों में आए देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में एक पत्रकार से बदतमीजी करने वाले मध्य प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भारी दबाव के बीच खेद जरूर जताया है, लेकिन उनमें सत्ता की जो हनक है, वह नई नहीं है।
जागरूक पत्रकार अनुराग द्वारी ने जब कैलाश विजयवर्गीय से इंदौर के भागीरथपुरा में हुई इस भीषण घटना के संबंध में सवाल किए तो वह भड़क गए और कहने लगे फोकट के प्रश्न मत करो…। वह यहीं नहीं रुके, इसके बाद उन्होंने जो कुछ कहा, उसकी देशभर में चर्चा है। उनके कहे शब्दों को हम यहां नहीं दोहराना चाहते। अनुराग ने जिस साहस के साथ इस बदजुबान मंत्री से तीखे सवाल किए दरअसल बात उस पर होनी चाहिए।
ऐसे समय में जब चौतरफा पत्रकारिता की गिरावट और उसके सत्ता के सामने दंडवत हो जाने की चर्चा आम है, अनुराग ने जिस तरह से जिम्मेदार पत्रकार के रूप में मंत्री से द टूक सवाल किए हैं, वैसे उदाहरण आज कम ही देखने को मिलते है।
कैलाश विजयवर्गीय ऐसी बदजुबानी और पत्रकारों से ऐसी बदतमीजी पहले भी कर चुके हैं। दशकभर पहले इंदौर में ही एक पत्रकार की रहस्यमय परिस्थितियों पर हुई मौत के समय भी उन्होंने विवादित बयान दिया था। यह सिलसिला कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी से लेकर इंदौर में ऑस्ट्रेलिया की दो महिला क्रिकेटरो के साथ हुए यौन उत्पीड़न की घटना पर गई विवादित टिप्पणियों तक जाता है।
दरअसल बात सिर्फ कैलाश विजयवर्गीय की बदजुबानी भर की नहीं है। इसे पत्रकारों के असहज करने वाले सवालों से निकली बौखलाहट के रूप में भी देखना चाहिए। इस घटना के वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि विजयवर्गीय के साथ चल रहे उस इलाके पार्षद, जिनकी जिम्मेदारी लोगों का साफ पानी मुहैया कराने की है, पत्रकार को लगभग धमकाते नजर आ रहे हैं।
राजनीति और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता वगैरह की बात करना तो पहले ही बेमानी हो चुका है, वरना दूषित पानी से हुई मौतों के बाद संबंधित मंत्री को शर्म से पानी-पानी हो जाना चाहिए था!
दरअसल हमारी चिंता जवाबदेह पत्रकारिता से जुड़ी है, जिसका घनघोर संकट हमारे समाने है। सत्ता और जिम्मेदार लोगों से पत्रकार सवाल नहीं करेंगे तो कौन करेगा?

