वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी 2026 को बजट पेश करेंगी, लेकिन ट्रंप के टैरिफ्स की वजह से यह बजट ट्रंप-सेंटर्ड होगा। इस मायने में यह ऐतिहासिक बजट होगा। आम तौर पर आम बजट के पहले अनुमान लगाए जाते हैं कि सरकार इस साल किस वर्ग को ध्यान में रखकर बजट पेश करेगी। किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी, छोटे किसान, महिलायें, पिछड़ा वर्ग आदि कभी भी बजट के केन्द्र बिंदु नहीं रहे। इस बार भी नहीं रहेंगे। अनहोनी यह होगी कि इस बार सरकार को बजट में शेयर बाजार, व्यापारी, बड़े उद्योगपतियों की तुलना में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की चिंता ज्यादा रहेगी। कह सकते हैं कि एक फरवरी को पेश होनेवाला बजट ट्रम्प सेंटर्ड या ट्रम्प सेंट्रिक होगा।
बजट 2026 में ट्रंप टैरिफ अनहोस्ट गेस्ट होंगे। इस मामले में यह इतिहास का पहला बजट होगा जो ट्रम्प की नीतियों के अनुसार होगा – उसके आतंक से बचने की तैयारी का होगा। जैसे एयरबीएनबी के गेस्ट हाउस होते हैं, जिसमें मेजबान गेस्ट से मिलता नहीं, पर उसकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखता है, समझ लो ट्रम्प हमारे बजट के लिए ऐसे ही गेस्ट हैं।
ट्रंप के टैरिफ्स का मुद्दा 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था और आगामी केन्द्रीय बजट के लिए बहुत बड़ा चैलेंज बन गया है। आठ साल से हर साल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश करती हैं, लेकिन इस बार ट्रंप के टैरिफ की वजह से बजट में कई फैसले ट्रंप के टैरिफ को ध्यान में रखकर लिए जा रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी दूसरी टर्म में रेसिप्रोकल टैरिफ की नीति अपनाई यानी अगर कोई देश अमेरिका से ज्यादा टैरिफ लगाता है, तो अमेरिका भी वैसा ही या ज्यादा लगाएगा। भारत पर मुख्य रूप से दो चरणों में टैरिफ बढ़े। अप्रैल-जुलाई 2025:रेसिप्रोकल टैरिफ के तहत भारत पर शुरू में 25-26% टैरिफ लगाया गया। फिर अगस्त 2025 में अतिरिक्त 25% टैरिफ पैनल्टी के रूप में लगाया गया, क्योंकि भारत रूसी तेल खरीदना जारी रखे हुए है। कुल मिलाकर 50% तक टैरिफ हो गया, जो दुनिया के ज्यादातर देशों से ज्यादा है (कुछ अपवादों को छोड़कर)। यह टैरिफ अगस्त 2025 से प्रभावी है और भारतीय एक्सपोर्ट्स को सीधा नुकसान पहुंचा रहा है।
इससे प्रभावित सेक्टर हैं टेक्सटाइल्स, गारमेंट्स, जेम्स एंड ज्वेलरी, फुटवियर, केमिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स, लेदर गुड्स। इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स में कुछ छूट है, लेकिन कुल एक्सपोर्ट्स में 60-65% हिस्सा प्रभावित। सितंबर 2025 में अमेरिका को भारतीय एक्सपोर्ट्स 15% तक गिरे, और FY 2025-26 में 40-45% तक गिरावट की आशंका है। ट्रम्प का कहना है कि तुम मेरे सामान पर जितना टैक्स लगाओगे, मैं भी तुम्हारे सामान पर उतना ही या वैसा ही टैक्स लगाऊंगा। ट्रंप ने कहा कि अगर भारत हमारे सामान पर ज्यादा टैरिफ लगाता है, तो हम भी भारत के सामान पर वैसा ही या उतना ही टैरिफ लगाएंगे।
ट्रम्प के फैसलों का भारत की ग्रोथ पर 0.5% से 0.9% तक नकारात्मक प्रभाव पड़ा है ऐसा भारत के चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर का मानना है। इस कारण एमएसएमई सेक्टर यानी माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं क्योंकि ये एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड हैं और रोजगार देते हैं।
इस कारण रुपया कमजोर हुआ, डॉलर 90 के पार पहुंचा और एफआईआई मतलब विदेशी संस्थागत निवेशकों का आउटफ्लो बढ़ा। लेकिन इसका सकारात्मक असर यह हुआ कि भारत ने एक्सपोर्ट डाइवर्सिफिकेशन शुरू किया और नए नए देशों की ग्राहकी पर ध्यान देना शुरू किया।
इस बार का बजट एक्सपोर्टर्स को सपोर्ट देनेवाला होने का अनुमान है। एमएसएमई के लिए स्पेशल फंड की घोषणा बजट में हो सकती है। भारत सरकार सब्सिडी, क्रेडिट गारंटी या एक्सपोर्ट इंसेंटिव्स बढ़ने जा रही है। भारत सरकार अपने कारोबारियों के लिए मार्केट डाइवर्सिफिकेशन के पक्के मूड में है। यूरोप, अफ्रीका, एसियान , लैटिन अमेरिका जैसे नए बाजारों को प्रमोट करने के लिए इंसेंटिव्स दिए जानेवाले हैं। निर्यात को बढ़ावा देनेवाली पीएलआई स्कीम्स को और मजबूत करना सरकार की भी बाध्यता हो गई है।
इसके अलावा डोमेस्टिक डिमांड बूस्ट करने, इंफ्लेशन कंट्रोल, मिडिल क्लास को टैक्स राहत, एफएमसीजी कंज्यूमर गुड्स पर सरकार का फोकस है ताकि एक्सपोर्ट कम होने पर घरेलू बाजार संभाले। भारत भी कुछ अमेरिकी प्रोडक्ट्स (जैसे हाई-एंड मोटरसाइकिल, इलेक्ट्रॉनिक्स, स्टील) पर अपना टैरिफ कम कर सकता है, ताकि ट्रेड नेगोशिएशंस में मदद मिले और ट्रंप से डील हो सके।
बजट में भारत सरकार रिटेलिएशन भी कर सकती है। भारत ने पहले ही अमेरिकी दाल पर 30% टैरिफ बढ़ाया है, बजट में और ऐसे कदम या एंटी-डंपिंग ड्यूटीज आ सकती हैं। अब सेल्फ-रिलायंस पर जोर है, आत्मनिर्भर भारत को और पुश, मैन्युफैक्चरिंग बूस्ट, लोकल प्रोडक्शन को बढ़ावा सरकार की नीति है ताकि अमेरिका की निर्भरता कम हो।
ट्रम्प की टैरिफ़ नीति ‘अमेरिका फर्स्ट’ पर आधारित है, जो घरेलू उद्योगों को संरक्षित करने के लिए है। भारत के संदर्भ में, ये टैरिफ़ मुख्य रूप से फार्मास्युटिकल्स, सेमीकंडक्टर, टेक्सटाइल्स और अन्य क्षेत्रों पर लगाए जा रहे हैं। जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट के अनुसार, फार्मास्युटिकल्स पर टैरिफ़ 200% तक बढ़ सकते हैं, जो मध्य से देर 2026 तक लागू हो सकते हैं। केपीएमजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊंचे टैरिफ़ से भारत की आर्थिक गति कमजोर हो सकती है, क्योंकि निर्यात घटेगा और व्यापार कम होगा। assets.kpmg.com इससे कंपनियां हायरिंग में सतर्क हो सकती हैं, जिससे रोजगार प्रभावित होंगे।
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है, जहां से $80 बिलियन से अधिक का निर्यात होता है। टैरिफ़ से यह 20-30% तक घट सकता है, खासकर एमएसएमई सेक्टर में। लेकिन इसका एक पहलू या है कि ट्रम्प की टैरिफ़ वॉर भारत के एमएसएमई, रोजगार और बजट को पुनर्गठित कर रही है। टैरिफ़ से भारत सरकार के राजस्व में कमी आ सकती है, क्योंकि निर्यात-आधारित कर (जैसे जीएसटी) घटेंगे। टैक्स फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे टैरिफ़ अमेरिका में भी आय को 0.9% तक कम कर सकते हैं, लेकिन भारत के लिए यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करेगा।
अब बेसब्री से बजट के आने का इंतज़ार है। बजट आने के बाद कई क्षेत्रों में से घुंध छंटेगी।
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