नेहरू की जुबानी वंदेमातरम की सच्ची कहानी

NFA@0298
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नेशनल ब्यूरो

रात हो चुकी थी। दिल्ली पहुंचकर ट्रेन पकड़नी थी, इसलिए हम लोग रोहतक-दिल्ली सड़क पर तेजी से जा रहे थे। मुझे बार बार झपकी आ जाती थी। अचानक हमारी गाड़ी रुक गयी। हमारे सामने रास्ते में आदमियों और औरतों की भीड़ जमा थी। हम गाड़ी से बाहर निकले और युप अंधेरे में इन लोगों में शामिल हो गये। ये लोग करीब एक हजार रहे होंगे।

किसी ने आवाज लगायी, ‘कौमी नारा’। इस पर इन एक हजार लोगों ने जोरदार आवाज में ‘तीन बार’ जवाब दिया विदेमातरम और उसके बाद ‘भारत माता की जय’ और कई दूसरे नारे सुनने को मिले।

“यह सब किस बारे में है मैंने उनसे कहा, विदेमातरम और यह भारत माता की जय, यह सब क्या है?”

सब चुप। उन्होंने मेरी ओर देखा और फिर वे सब एक-दूसरे की तरफ देखने लगे। मुझे लगा कि वे मेरे इस सवाल से कुछ परेशान से हैं। मैंने उनसे अपना यह सवाल फिर किया, ‘ये नारे लगाने से आपका क्या मतलब है?” वे फिर भी चुप रहे। उस इलाके में कांग्रेस का कार्यकर्ता झुंझला रहा था। उसने मुझे इस बारे में कुछ बताने की कोशिश की, लेकिन मैंने ज्यादा नहीं बोलने दिया।

“यह माता कौन है? आप सब किसकी जय बोल रहे हैं। मैंने जोर देकर पूछा। फिर भी वे चुप रहे। वे भौचक्के से थे। ये अजीबो-गरीब सवाल उनसे पहले कभी नहीं किये गये थे। वे हर बात को मान लेते थे, जब उनसे नारे लगाने के लिए कहा जाता, तब बिना कुछ समझने की कोशिश किये वे नारे लगाने लगते थे।

अगर कांग्रेस के लोग उनसे जोर से और पूरी ताकत से नारा लगाने के लिए कहें तो वे ऐसा क्यों करें यह नारा एक अच्छा नारा था। इससे उनमें जोश पैदा होता और शायद इससे उनके विरोधियों में घबराहट होती थी।

मैं फिर भी अपने सवाल पर अड़ा रहा, तब एक आदमी ने बड़ी हिम्मत बांधकर कहा कि माता का मतलब धरती है। इस किसान का इशारा जमीन की तरफ या. जो उसकी असली मां और उसका सहारा होती है।

“कौन सी धरती?” मैंने फिर पूछा, “वह धरती जो तुम्हारे गांव की है, पंजाब की है या यह सारी दुनिया की धरती” वे मेरे इस चुमा- फिराकर पूछे गये सवालों से बकरा यये और परेशानी महसूस करने लगे। और उसके बाद कई लोग एक साथ बोल पड़े कि इसके बारे में में उन्हें कुछ बताऊं। वे कुछ भी नहीं जानते थे और हर बात को समझना पाहते थे।

मैने उन्हें बताया कि भारत पहले क्या था। मैंने उन्हें हिंदुस्तान के बारे में बताया कि वह दूर दूर तक उत्तर में कश्मीर और हिमालय से लेकर दक्षिण में लंका तक हिंदुस्तान ताऊ फैला हुआ है, इसमें पंजाय, यंगाल, बंबई और मद्रास जैसे बड़े बड़े सूबे हैं।

इस लंबे-चौड़े मुल्क में उन जैसे लाखों किसान हैं, जिनके सामने भी वही सवाल, वहीं मुश्किलें, बेइंतिहा गरीबी और दुख-तकलीफें हैं, जो उनके सामने हैं। लंबा-थोड़ा बही मुल्क हम सबके लिए, जो यहां रहते हैं, हिंदुस्तान है, भारत माता है। हम सब इसके बच्चे हैं। भारत माता कोई औरत नहीं है, जो रंगीन तस्वीरों में सुंदर और उदास दिखाई जाती है।

भारत माता की जय। हम किसकी जय पुकारते हैं? क्या उस काल्पनिक स्त्री की, जिसका कोई वजूद ही नहीं है। तो फिर क्या यह हिंदुस्तान के पहाड़ों, नदियों, रेगिस्तानों, त्योचों और पत्थरों की जय है। ‘नहीं’, उन्होंने जवाब दिया, लेकिन वे मुझे कोई पुख्ता जवाब नहीं दे सके।

मैंने उनसे कहा, “निश्चय ही हम हिंदुस्तान के लाखों-करोड़ों लोगों की जय मनाते हैं, जो उसके गांवों और शहरों में रहते हैं। मेरा जवाब उन्हें अच्छा लगा और उन सबने महसूस किया कि यही ठीक है।

ये लोग फोन है। बेशक आप और आपके जैसे बहुत से लोग। और इसलिए जव ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते हैं, तब आप अपनी और इस सारे हिंदुस्तान में बसने वाले हमारे भाइयों और बहनों की जय का नारा लगाते हैं। याद रखिए कि आप ही भारत माता हैं और यह जय आपकी जय है।

वे बड़े ध्यान से ये बातें सुन रहे थे और ऐसा लग रहा था जैसे इन किसानों के भोले-भाले जहन में कोई रोशनी-सी उतर रही है। उनके लिए यह एक ताज्जुब की बात थी कि जो नारा वे अब तक लगाते चले आ रहे थे, वह उन्हीं के बारे में था। जी हां, वे रोहतक जिले के एक गांव के गरीब जाट किसानों के बारे में था। यह उन्हीं की जय थी।

यह कहानी पंडित नेहरू ने 16 सितंबर 1936 को त्रिवेणी मद्रास में लिखी थी

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