नेपाल चुनाव में भारत विरोधी राजनीति क्यों प्रभावी?

NFA@0298
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नेपाल में आम चुनाव इसी साल पांच मार्च को होने हैं। नेपाल भारत का पड़ोसी है और उसके लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। हाल के वर्षों में नेपाल के साथ भारत के रिश्तों में पहले जैसी सहजता नहीं रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि चुनावों के बाद नेपाल में नई सरकार बनती है, तो क्या भारत भरोसे, सहयोग और साझेदारी की नीति से इस पड़ोसी देश के साथ संबंधों को फिर से मजबूत कर सकेगा?

नेपाल हमेशा से भारत के लिए संवेदनशील मुद्दा रहा है। बीते कुछ बरसों में दोनों देशों के संबंध धीरे-धीरे कटुतापूर्ण होते गए हैं। चीन का नेपाल में हस्तक्षेप बढ़ रहा है। कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख दर्रे को लेकर विवाद भी तूल पकड़ रहा है। देश के पांच राज्यों से सटी नेपाल की सीमा ज्यादातर जगहों पर खुली हुई है। वहां एक मजबूत और स्थिर सरकार दोनों देशों के संबंधों के लिए अहम है।

नेपाल में आगामी चुनाव को लेकर बिहार-नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में पुलिस सुरक्षा सतर्कता बढ़ा दी गई है। शांति–सुरक्षा बनाए रखने तथा आम नागरिकों को सुरक्षा का एहसास दिलाने के उद्देश्य से विभिन्न क्षेत्रों में पैदल गश्त बढ़ाई गई है। प्रमुख चौराहों, भीड़भाड़ वाले इलाकों, संवेदनशील स्थानों और सार्वजनिक स्थलों पर सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से कड़ी निगरानी की जा रही है।

इसके साथ ही आवश्यक स्थानों पर वाहनों की सघन जांच और अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है। अवैध आवागमन, आपराधिक गतिविधियों व चुनाव प्रभावित करने वाली साजिशों को रोकने के लिए सीमा नाकों व खुली सीमाओं पर नेपाल पुलिस भी नियमित गश्त कर रही है।

जेन-जी आंदोलन से लेकर धार्मिक हिंसा तक

अगस्त 2025 में नेपाल में एक अभूतपूर्व युवा आंदोलन देखने को मिला, जिसने प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ‘ओली’ की सरकार को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। इन विरोध प्रदर्शनों को ‘जेन ज़ी आंदोलन’ नाम दिया गया। साल 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए लोगों को ‘जेनरेशन ज़ूमर्स’ या ‘जेन ज़ी’ कहते हैं। इस आंदोलन में कई लोगों की मौत हुई। सरकारी इमारतों में आग लगा दी गई। फिलहाल वहां भारत समर्थक मानी जाने वाली सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार है।

2008 से पहले नेपाल में हिंदू और मुसलमानों के बीच छिटपुट घटनाएं देखने को मिलती थी, लेकिन पिछले कुछ बरसों में दोनों के बीच तनाव में बढ़ोतरी हुई है। हिंदू और मुसलमानों के बीच भारत के सीमावर्ती इलाकों में 17 दंगे हुए हैं। हाल ही में नेपाल और भारत के सीमावर्ती इलाकों हिंदू बनाम मुस्लिम की लड़ाई एक बार फिर छिड़ गई है। सोशल मीडिया पर एक आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद मस्जिद में तोड़फोड़ हुई, इसके बाद हालात बेकाबू हो गए। पारसा और धनुषाधाम जिलों में जमकर तोड़फोड़ और हिंसा हुई है।

भारत की तरफ से सीमा सील कर दी गई है। धार्मिक कट्टरता नेपाल में भी पैर पसार चुकी है। दोनों समुदाय आमने-सामने हैं। आमने-सामने से नारेबाजी की जा रही है। पुलिस के ऊपर भी जमकर पत्थरबाजी हुई । पुलिस ने कर्फ्यू लगाया, जो बेअसर साबित हुआ। अब हालात संभालने के लिए आपसी बातचीत का सहारा लिया जा रहा है। नेपाल में 82 प्रतिशत हिंदू हैं, जबकि मुसलमानों की संख्या केवल नौ प्रतिशत के आसपास है।

भीमनगर में बॉर्डर पर दुकान चलाने वाले सहदेव कहते हैं, “जैसे भारत में मुसलमानों को कहा जाता हैं कि पाकिस्तान चले जाओ उसी तरह हम लोगों को भी भारत जाने को कहा जाता हैं, क्योंकि भारत में हमारे सगे संबंधी हैं और हम पहाड़ियों से अलग दिखते हैं।”

भारतीय राष्ट्रवाद की तरह नेपाली राष्ट्रवाद भी भारत और हिन्दी विरोधी भावना की वजह से बहुत मजबूत हो रहा है।

नेपाल भारत सीमा पर स्थित कुनौली गांव के रहने वाले सौरभ बताते हैं कि,”नेपाल में जेन-जी आंदोलन खत्म तो हो गया है, लेकिन इससे जुड़े लोग सोशल मीडिया पर अभी भी एक्टिव हैं। व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से लोग जुड़े हैं। ग्रुप के माध्यम से आंदोलन के विचारधारा को अभी भी प्रचारित किया जा रहा है।”

भारत विरोधी काठमांडू मेयर बालेन शाह PM उम्मीदवार घोषित

नेपाल में वर्ष 2025 के सितंबर में युवाओं के नेतृत्व में हिंसक आंदोलन शुरू हुआ था, जिसमें केपी शर्मा ओली की सरकार का पतन हो गया था। आंदोलन में शामिल युवा वर्ग में एक नाम काफी चर्चा में रहा था। काठमांडू महानगर के मेयर बालेन शाह। 35 साल के बालेन शाह को गठबंधन का संसदीय दल नेता और प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया गया है। बालेन और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने 5 मार्च को होने वाले नेपाल चुनावों में मिलकर चुनाव लड़ने के लिए समझौता किया है।

बालेन शाह भारत की कई बार आलोचना कर चुके हैं। उन्होंने कई बार भारत के साथ सीमा विवाद, जैसे कालापानी-लिपुलेख को लेकर सख्त बयानबाजी की है। उन्होंने अपने बयानों में नेपाल की राजनीति में भारत के हस्तक्षेप का भी आरोप लगाया है। बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से परेशान युवा नए विकल्प की तलाश में है।

भारतीयों का नेपाल से जमीन का नाता टूट रहा

भारत और नेपाल के बीच रोटी-बेटी के साथ-साथ जमीन का भी गहरा रिश्ता रहा है, लेकिन अब यह बंधन कमजोर पड़ता दिख रहा है। नेपाल सरकार ने सख्त कानून लागू किया है कि कोई व्यक्ति सिर्फ एक देश की नागरिकता रख सकता है। ऐसे में जिन भारतीयों की जमीन नेपाल में है, उन्हें या तो संपत्ति बेचनी होगी या नेपाल की नागरिकता लेनी होगी। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो सरकार जमीन पर कब्जा कर लेगी।

यह कानून सात साल पहले बना था, पर अब जेन-जी आंदोलन (सितंबर, 2025) के बाद फिर सुर्खियों में है। आंदोलन के दौरान कई जिला कार्यालयों में भूमि दस्तावेज जला दिए गए थे। अब पुराने रिकॉर्ड न मिलने पर नेपाल सरकार भारतीय नागरिकों की जमीन जब्त करने की तैयारी में है।

भारत नेपाल के रिश्ते पर प्रोफेसर शशी झा बताते हैं कि,” बेटी रोटी के संबंध होने के बावजूद भारत-नेपाल संबंध हमेशा एक जैसे नहीं रहे हैं। नेपाल के साथ हमारे रिश्ते कभी अच्छे होते हैं और कभी बिगड़ जाते हैं। भारत को कोशिश करनी चाहिए कि नेपाल की जनता के बीच भारत के खिलाफ जो नकारात्मक भावना है, उसे खत्म किया जाए।”

प्रोफेसर हर्ष वी. पंत, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली में ओआरएफ और अध्ययन के उपाध्यक्ष हैं। वे अंतर्राष्ट्रीय संबंध के प्रोफेसर हैं। वह लिखते हैं कि,”ओली के नेतृत्व वाली इस सरकार और पुरानी सरकारों ने सीमा संबंधी मुद्दों और आपसी विवाद के अन्य मसलों पर भारत-विरोधी भावना भड़काकर जनता का समर्थन हासिल करने का प्रयास किया है।

हालांकि, हालिया विरोध-प्रदर्शन और उसके बाद के हिंसक हालात ने नई दिल्ली के सामने भी सुरक्षा संबंधी चिंताएं पैदा की, लेकिन दोनों देशों के शासनाध्यक्षों का फोन पर आपस में बातचीत करना और नेपाली प्रधानमंत्री का भारत के प्रधानमंत्री के प्रति सकारात्मक रुख अपनाना बता रहा है कि दोनों देश संपर्क स्थापित करने में कोई समय बर्बाद नहीं करना चाहते।”

चार जनवरी को नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और वरिष्ठ नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने अपनी बेटी के साथ भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ मुलाकात की है। माना जा रहा है कि इस उच्च स्तरीय बैठक में नेपाल के वर्तमान राजनीतिक हालात और रणनीतिक जरूरत पर चर्चा हुई।

सूत्रों के मुताबिक, डोभाल ने बैठक में भारत का स्पष्ट रुख बताया कि नेपाल चुनाव न केवल प्रक्रियागत जरूरी है, बल्कि राष्ट्रीय स्थिरता के लिए अनिवार्य हैं। भारत नेपाल के लोकतंत्र की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। चुनाव ही लोकतांत्रिक बहुमत दिलाकर इसे मजबूत रखने का सबसे अच्छा विकल्प है।





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