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नई दिल्ली। नार्वे (Norway) के अखबार आफ्टेनपोस्टेन ने पीएम मोदी पर एक बड़ा लेख छापा है। स्तंभ लेखक फ्रैंक रोजाविक के लिखे लेख का कार्टून चर्चा में है जिसमें पीएम मोदी ईंधन के पाइप के आगे बीन बजा रहे हैं। आइए उस लेख का अनुवाद प्रस्तुत है
‘नरेंद्र मोदी जितने अधिक लोगों से संभव हो, उतने से संबंध बनाए रखते हैं। इसी तरह भारत अपनी शक्ति का प्रयोग करता है।’ सोमवार को दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री नॉर्वे की आधिकारिक यात्रा पर आ रहे हैं। नरेंद्र मोदी और भारत के साथ ओस्लो में आखिरी शीर्ष बैठक मई 2018 में हुई थी।
भारत दुनिया की एक मध्यम महाशक्ति हैं। लेकिन भला इस ध्रुवीय छोटे से देश में रुचि क्यों? नॉर्वे एक तेल उत्पादक देश है, जो ऊर्जा क्षेत्र में अग्रणी है। अचानक नार्वे नरेंद्र मोदी के लिए उपयोगी बन जाता है। आखिर क्यों?
जहां डोनाल्ड ट्रंप कहते हैं, ‘अमेरिका पहले’, वहीं मोदी कहते हैं ’भारत पहले’। लेकिन मोदी इसे रॉकेटों और धमकियों के साथ नहीं करते। मोदी यात्रा करते हैं, सिर हिलाते हैं और मुस्कुराते हैं, बात करते हैं और व्यापार, प्रौद्योगिकी तथा अन्य मामलों में सबके साथ समझौते करते हैं। उनके अनुसार दुनिया के देशों को भारत से सीखना चाहिए।
मोदी के मित्र मानते हैं कि वे एक बड़े रणनीतिकार हैं। उनके विरोधी कहते हैं कि वे दुनिया भर में घूमते हैं और अच्छे परिणाम की उम्मीद करते हैं, लेकिन वास्तव में उनके पास कोई समग्र योजना नहीं है। भारत ने कम-से-कम मोदी के आने से बहुत पहले से बहु-राष्ट्रीय गठबंधन नीति को एक रणनीति के रूप में अपनाया है।
भारत के नेता को इस बात से बहुत फर्क नहीं पड़ता कि अलग-अलग देशों की शासन प्रणाली कैसी है। क्या वे युद्ध करते हैं? इतना महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि भारत उनके साथ अच्छे संबंधों से क्या हासिल कर सकता है।
यह निश्चित रूप से परेशान करने वाली बात है, क्योंकि भारत (चीन के विपरीत) एक लोकतंत्र है और इसी कारण उसे उस तानाशाही की मदद नहीं करनी चाहिए जो लोकतांत्रिक यूक्रेन पर हमला कर रही है।
इसके अलावा, भारत की अपनी पुरानी आत्म-छवि भी है कि वह छोटे देशों के हितों का रक्षक है। भले ही यूक्रेन उस चीज़ का हिस्सा नहीं है जिसे अब ’वैश्विक दक्षिण’ कहा जाता है, फिर भी इस सिद्धांत के अंतर्गत उसे शामिल किया जाना चाहिए। लेकिन नहीं, यह पश्चिमी सोचने का तरीका है।
इसके अलावा भारत इस रूसी तेल के एक हिस्से को परिष्कृत करता है और फिर उसे यूरोप के देशों को बेचता है, इसलिए यहाँ के लोगों को उंगली उठाने में सावधानी बरतनी चाहिए।मोदी किसी भी स्थिति में एक गैर-पश्चिमी व्यवहारवादी (प्रैग्मैटिस्ट) हैं।
पहली बात, ऐसा लगता है कि वे लोकतंत्र, कम-से-कम उदार लोकतंत्र – को लेकर बहुत चिंतित नहीं हैं। वे खुले चुनावों में हिस्सा लेते हैं, लेकिन उन पर लगातार बढ़ती आलोचना हुई है कि वे सत्तावादी प्रवृत्तियाँ दिखाते हैं, हिंदू राष्ट्रवाद का उपयोग करते हैं और प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं। Freedom House भारत को केवल ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ श्रेणी में रखता है।
रूस के साथ भारत के निकट संबंधों का एक और कारण है।जब 1947 में ब्रिटिश उपनिवेश को स्वतंत्रता मिली, तब दो नए देश बने: मुस्लिम-बहुल पाकिस्तान और हिंदू-बहुल भारत। पाकिस्तान अमेरिका का सहयोगी बना, जबकि भारत सोवियत संघ से जुड़ गया
सालों से भारत और अमेरिका भी कुछ हद तक मित्र रहे हैं। तो रूस के तेल का क्या? ट्रंप नाराज हो गए और भारत पर दंडात्मक शुल्क लगा दिए। इसके बाद व्यवहारवादी मोदी ने रूसी तेल का आयात कुछ कम किया। फिर भी वह काफी हद तक बना रहा। एक तरफ़ पुतिन नाराज नहीं हुए, तो दूसरी तरफ़, ट्रंप शांत हो गए
फिर अचानक अमेरिका और भारत ने एक व्यापार समझौता भी कर लिया।अब जबकि ईरान के साथ अमेरिका के संघर्ष ने तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है, ट्रंप ने भारत को फिर से रूसी तेल आयात करने की ‘अनुमति’ दे दी है।
चीन और अमेरिका एक अशांत दुनिया में प्रमुख खिलाड़ी हैं, लेकिन कई अन्य भी शक्ति का प्रयोग करते हैं। यूरोपीय संघ महत्वपूर्ण है। भारत महत्वपूर्ण है। इस वर्ष अप्रैल में दोनों ने मुक्त व्यापार और सुरक्षा नीति पर व्यापक सहयोग समझौता किया।लेकिन मोदी के संबंध हर दिशा में फैले हुए हैं। भारत इज़राइल का सबसे बड़ा हथियार ग्राहक बन चुका है।
योजना के अनुसार दोनों देश तथाकथित ‘इंडिया मिडिल ईस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर’ के माध्यम से और अधिक निकट सहयोग करेंगे, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन भी भागीदार हैं। और-तो-और भारत की फ्रांस से भी घनी मित्रता हैं। क्या मोदी उत्तरी ध्रुव पर भी एक उपयोगी मित्र बनाने वाले हैं, यदि भारत और यूरोपियन यूनियन के मध्य कुछ दरार आती है तो?
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