केंद्र और राज्य की सत्ता में रहते संवैधानिक जिम्मेदारियों को दरकिनार कर खुलेआम हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी लगता है कि ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरनांद सरस्वती से टकराव मोल लेकर गंभीर धर्म संकट में फंस गई है। उसे न निगलते बन रहा है और न ही उगलते।
मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जिस तरह संगम में स्नान करने से रोका, वह सत्ता की निरंकुशता का ही उदाहरण है। उनकी यात्रा को न केवल पुलिस के बल पर रोका गया, बल्कि उनके अनुयायियों पर ज्यादती किए जाने की भी खबरें हैं।
उसके बाद से नाराज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ठिठुरती ठंड में छह दिन से धरने पर बैठे हैं और उनकी तबियत बिगड़ गई है, जो निश्चय ही योगी सरकार की अदूरदर्शिता को भी दिखाता है।
हालत यहां तक पहुंच गई कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनका नाम लिए बिना शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया और उन्हें कालनेमी बता दिया! बताने की जरूरत नहीं है कि कालनेमि रामायण में एक राक्षस है, जिसने हनुमान को संजीवनी बूटी लाने से रोकने के लिए साधु का वेश धारण कर लिया था।
पलटवार करते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आदित्यनाथ को न केवल संत मानने से इनकार कर दिया, बल्कि उन्हें मंदिर तोड़ने वाला करार दिया और उन्हें औरंगजेब की उपाधि से नवाज दिया!
बेशक, शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद 2022 में जब अविमुक्तेश्वरानंद को उनकी जगह शंकराचार्य बनाया गया था, तो उसका विरोध हुआ था। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी जिक्र किया जा रहा है, जिसके मुताबिक उसने अविमुक्तेश्वरानंद के पटटाभिषेक पर रोक लगा दी थी।
लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अप्रैल, 2003 में दंड संन्यास की दीक्षा ली थी और यह तय हो गया था कि वे अगले शंकराचार्य होंगे। ताजा घटनाक्रम में भी उत्तराखंड के साधु-संत स्वामी अविमुक्तेश्वरनांद को ही शंकराचार्य मानते हैं।
दरअसल संगम के तट पर योगी सरकार और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच हो रहे टकराव को उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुखर आलोचक हैं। राष्ट्रीय मुददों पर भी उन्होंने अपनी राय जाहिर कर कई बार मोदी सरकार को असहज कर दिया है।
खुद को हिंदुओं का हितरक्षक कहने वाले आरएसएस की इस मामले में चुप्पी कम हैरान नहीं करती। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हैं। भाजपा को इसका अहसास होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि योगी आदित्यनाथ के रुख के उलट उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का बयान आया है, जिसमें वह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को पूज्य शंकराचार्य करते हुए कहा है कि वे अच्छे से संगम में स्नान करें और विवाद को खत्म करें।
केशव प्रसाद मौर्य क्या नहीं जानते कि शंकराचार्य की पालकी को यह कहते हुए रोका गया कि उससे ट्रैफिक का उल्लंघन होगा! उनका बयान तब आया है, जब संगम में काफी पानी बह चुका है।

