दिल्ली हाईकोर्ट ने कुणाल शुक्ला वर्सेज हिमायनी पूरी मामले में शोध सुनवाई का आदेश दिया

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नेशनल ब्यूरो। नई दिल्ली

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को एकल न्यायाधीश को सामाजिक कार्यकर्ता कुणाल शुक्ला द्वारा दायर याचिका पर “शीघ्रता से” (expeditiously) फैसला करने का निर्देश दिया। इस याचिका में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की बेटी को जेफ्री एपस्टीन से जोड़ने वाले कथित मानहानिकारक कंटेंट के प्रकाशन पर लगाए गए अंतरिम आदेश को हटाने की मांग की गई है।

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की डिवीजन बेंच ने शुक्ला की अपील का निपटारा करते हुए उन्हें हिमायनी पुरी द्वारा दायर अंतरिम निषेधाज्ञा आवेदन पर अपना जवाब दाखिल करने की अनुमति दे दी।

बेंच ने एकल न्यायाधीश के सामने सुनवाई की अगली तारीख भी अगस्त से आगे बढ़ाकर 23 अप्रैल कर दी। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कुणाल शुक्ला की ओर से डिवीजन बेंच के समक्ष दलीलें पेश कीं। अधिवक्ता मयंक जैन, मधुर जैन और अर्पित गोयल भी कुणाल शुक्ला की ओर से उपस्थित थे। हालांकि, कोर्ट ने इस चरण में अंतरिम राहत में दखल नहीं दिया और कहा कि दोनों पक्षों को सुनने के बाद मामले पर शीघ्र विचार किया जाना चाहिए।

यह अपील रायपुर-आधारित सामाजिक और आरटीआई कार्यकर्ता कुणाल शुक्ला द्वारा दायर की गई थी, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश द्वारा 16 मार्च को दिए गए एक्स पार्टे टेकडाउन ऑर्डर को चुनौती दी गई थी। उक्त आदेश में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और ऑनलाइन इंटरमीडियरीज़ को भारत में उन कंटेंट्स को हटाने या ब्लॉक करने का निर्देश दिया गया था, जिनमें हिमायनी पुरी को दोषी अमेरिकी सेक्स ऑफेंडर जेफ्री एपस्टीन से जोड़ा गया था।

यह आदेश हिमायनी पुरी द्वारा अधिवक्ता मधुलिका राय शर्मा के माध्यम से दायर सिविल सूट में दिया गया था। उन्होंने तर्क दिया था कि उनके खिलाफ एक समन्वित और दुर्भावनापूर्ण ऑनलाइन अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें उन्हें झूठे तरीके से एपस्टीन और उनकी आपराधिक गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है। शुरुआती चरण में उनकी याचिका स्वीकार करते हुए एकल न्यायाधीश ने एक्स पार्टे इंजंक्शन जारी किया और कंटेंट को तुरंत हटाने का आदेश दिया।

अपील में शुक्ला ने तर्क दिया कि बिना पूर्व सूचना दिए और बिना सूचना छोड़ने के कारण दर्ज किए बिना इंजंक्शन दिया गया, उन्होंने कहा कि यह आदेश एक पूर्व-परीक्षण गैग ऑर्डर (pre-trial gag) की तरह काम कर रहा है, जो बिना सुनवाई का अवसर दिए भाषण की स्वतंत्रता को सीमित कर रहा है।

यह भी तर्क दिया गया कि एकल न्यायाधीश ने प्रथम दृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति पर विस्तृत न्यायिक विश्लेषण नहीं किया। अपीलकर्ता ने जोर दिया कि मानहानि के मामलों में पूर्व-परीक्षण इंजंक्शन देते समय अदालतों को सतर्कता बरतनी चाहिए।

शुक्ला ने यह भी कहा कि विवादित कंटेंट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री, अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और नियामक दस्तावेजों पर आधारित है और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर उचित टिप्पणी है। उनके अनुसार, यह टेकडाउन ऑर्डर स्वतंत्र भाषण और जांचात्मक पत्रकारिता पर ठंडा प्रभाव (chilling effect) डालता है और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लंघन करता है।

अपील में क्षेत्राधिकार संबंधी चिंताएं भी उठाई गईं, जिसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता हिमायनी पुरी विदेशी नागरिक हैं जो भारत के बाहर रहती हैं और दिल्ली हाईकोर्ट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में उनकी कोई स्पष्ट प्रतिष्ठा नहीं है।इसके अलावा, अपीलकर्ता ने “समान कंटेंट” की पहचान कर हटाने की अनुमति देने वाले निर्देश का विरोध किया, तर्क देते हुए कि इससे न्यायिक जांच को दरकिनार किया जा रहा है और न्यायिक शक्ति का प्रत्यायोजन हो रहा है।

अपीलकर्ता ने हिमायनी पूरी को दी गई राहत को अत्यधिक और अनुपातहीन बताते हुए, विवादित आदेश को रद्द करने, अंतरिम इंजंक्शन हटाने और हटाए गए कंटेंट को बहाल करने की मांग की।अब डिवीजन बेंच द्वारा शीघ्र सुनवाई का निर्देश दिए जाने के साथ, मामले पर एकल न्यायाधीश 23 अप्रैल को सुनवाई करेंगे, जहां दोनों पक्षों को अंतरिम इंजंक्शन की निरंतरता पर अपनी दलीलें पेश करने का अवसर मिलेगा।



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