डिजास्टर स्ट्रोक, बीजेपी के ये चेहरे… और आखिरी पारी!

NFA@0298
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भाजपा के भीतर एक तबका ऐसा भी है, जो मोदी-शाह के हर फैसले को अब तक “मास्टर स्ट्रोक” मानकर स्वीकार करता रहा, मगर इस बार यह हिसाब लगाने में व्यस्त है कि “राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के पद पर नितिन नबीन की ताजपोशी”, पार्टी की पहली और दूसरी पंक्ति के नेताओं को किस हद तक प्रभावित करने वाली है?

नबीन की नियुक्ति का फैसला आधिकारिक तौर पर बीजेपी के संसदीय बोर्ड ने लिया, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि बोर्ड की बैठक कब और कहां हुई? राजनीतिक जानकार मानते हैं कि गृह मंत्री अमित शाह ने भले ही छह साल पहले अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ दी हो, लेकिन “बिग बॉस” की तरह वे ही संगठन के “सुप्रीम” हैं।

घर के नियम उनकी ‘आवाज़’ से ही संचालित होते हैं। नितिन नबीन को भी उनकी ही खोज माना जा रहा है। बिहार चुनाव के दौरान वे नबीन के घर गए थे। हालांकि, “घर जाना” कोई पैमाना नहीं है। अन्यथा, नरोत्तम मिश्रा मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष हो जाते और ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल जाती। लेकिन यह सच है कि किसी को “अंदाज़ा” नहीं था कि अमित शाह ने नितिन को ‘पसंद’ कर लिया है।

दिलचस्प यह है कि ‘पसंद’ को जाहिर भी नहीं होने दिया गया। इसीलिए, एनडीए की बंपर जीत के बाद नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में नबीन को शपथ भी दिलवाई गई। ताकि, जब ऐलान हो तो मीडिया या राजनीतिक विमर्श में सिर्फ “इस बात की चर्चा हो कि यह फैसला क्यों “मास्टर स्ट्रोक” है? खासकर, पश्चिम बंगाल के संदर्भ में, जहां अगले साल विधानसभा के चुनाव हैं। नितिन जिस कायस्थ बिरादरी से आते हैं, वह बंगाल का सियासी आख्यान गढ़ने में खासी भूमिका निभाती है।

मतलब, इस कथित ‘मास्टर स्ट्रोक’ से बंगाल में बीजेपी को लाभ होने वाला है। और, यह भी कि यह फैसला ‘अचानक’ और बंगाल चुनाव को ध्यान में रखकर लिया गया है। तर्क है कि यदि कार्यकारी अध्यक्ष का दायित्व ही सौंपना होता तो नबीन को मंत्री क्यों बनाया जाता?” बहरहाल, मोदी-शाह के चलचित्र का यह, वह पक्ष है, जिसका प्रचार किया या करवाया जा रहा है। लेकिन दूसरा पक्ष, विशुद्ध रूप से बीजेपी की अंदरूनी और भावी सियासत की ओर इशारा करता है।

पहली बात तो ये कि यदि बंगाल के कायस्थ ही वजह होते तो बिहार के नबीन के बजाय दिलीप घोष को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाता, जो ‘लोकल कायस्थ’ हैं। वह राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे हैं और बंगाल ईकाई के अध्यक्ष भी। लेकिन, दिक्कत यह थी की वे 61 के हो चुके हैं, जबकि नबीन सिर्फ 45 के हैं। साफ है कि एक झटके में बीजेपी की पहली और दूसरी पंक्ति नेपथ्य में धकेल दी गई है, या कहें रेस से बाहर कर दी गई है। केंद्र में राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान से लेकर भूपेंद्र यादव तक तमाम ऐसे नाम हैं, जो इस सूची में रखे जा सकते हैं।

जाहिर है, इसका असर राज्यों पर भी पड़ने वाला है। जो चेहरे लंबे समय से दौड़ में बने हुए हैं, वे धीरे-धीरे बाहर किये जा रहे हैं। मध्यप्रदेश की प्रथम और द्वितीय पंक्ति भी “चपेट” में आती प्रतीत हो रही है। हालांकि, काफी कुछ तो दो साल पहले तभी स्पष्ट हो गया था, जब डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया गया। न चाहते हुए भी शिवराज को दिल्ली जाना पड़ा, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल, कैलाश विजयवर्गीय, राकेश सिंह वगैरह को विधानसभा चुनाव लड़ना पड़ा और ‘वरिष्ठतम’ होने के बावजूद गोपाल भार्गव को मंत्रिमंडल में जगह न मिलने पर भी ‘चुप्पी साधनी’ पड़ी।

राज्य में अगला चुनाव 2028 अंत में होगा। जाहिर है, तब तक सब तीन साल “और सीनियर” हो जाएंगे। जैसे, शिवराज 70 के, तोमर 71, विजयवर्गीय 72, प्रहलाद 68 और राकेश 66 वर्ष के होंगे। भार्गव तो 76 पार कर चुके होंगे। यही हाल नरोत्तम मिश्रा का भी होने वाला है, जो पिछला चुनाव हारने के बाद से ‘पुनर्वास’ की तलाश में हैं।

दरअसल, अमित शाह को “ज्यादा ऊर्जावान” चेहरों की जरूरत है। ऐसों की, जो दौड़-दौड़ कर काम करें और उनकी ‘रीति-नीति’ में बाधा न बनें। गुरुवार को ग्वालियर में उन्होंने अपने मन की बात प्रकट भी की, जब ये कहा कि “मोहन यादव इस समय शिवराज से भी ‘ज्यादा ऊर्जा’ के साथ काम कर रहे हैं।” साफ है कि आगे ‘ज्यादा ऊर्जा’ ही डिमांड में रहने वाली है।

नबीन (45) के बराबर न सही, मगर मोहन जैसी तो आवश्यक है। इसीलिए, कहा जा रहा है कि मध्यप्रदेश भाजपा की प्रथम पंक्ति के ज्यादातर चेहरे शायद अपनी ‘आखिरी राजनीतिक पारी’ खेल रहे हैं। हो सकता है कि इनमें से कई इसे “डिजास्टर स्ट्रोक” समझकर अब अपने वारिसों (बच्चे-बच्चियों) के लिए तैयारी करने में जुट गए हों।

कुल मिलाकर, नबीन की उम्र ने बीजेपी की सियासत का जिस हिसाब से “डिग्रेडेशन” किया है, उसका असर ‘ऊपर से नीचे तक होने वाला है। आखिर, सवाल नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी का भी है। मोदी अपनी वय के 64वें वर्ष में प्रधानमंत्री बन गए थे…अमित शाह 2029 के चुनाव में ‘64’ के हो जाएंगे…और, उन्होंने गुणा-भाग लगाकर नितिन नबीन के रूप में ज्यादा ऊर्जावान ढूंढ़ ही लिया है…!

अमित शाह का “ज्यादा ऊर्जावान” और मोहन यादव

यह बिहार चुनाव से पहले की बात है। भाजपा में एक नैरेटिव चलाने का प्रयास हुआ था कि बिहार का चुनाव जीतते ही राष्ट्रीय अध्यक्ष का फैसला होगा। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को अध्यक्ष बनाया जाएगा और डॉ. मोहन यादव की जगह कोई नया चेहरा आएगा। क्योंकि, दो यादव ठीक नहीं रहेंगे।

उन दिनों मोहन की दिल्ली दौड़ भी कुछ बढ़ी हुई थी। वे उज्जैन के लैंड पूलिंग एक्ट को लेकर उलझे हुए थे। आरएसएस का किसान संघ खुलकर विरोध कर रहा था। शाह के यहां पेशियां हो रही थीं। बाद में उनकी सरकार को यह एक्ट वापस भी लेना पड़ा। खैर, नए नामों की अटकलों में एक नाम ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी था। तब वे “ज्यादा ऊर्जावान” नज़र भी आ रहे थे। खासकर, ग्वालियर के मामले में।

बहरहाल, बिहार चुनाव का नतीजा आ गया। कार्यकारी अध्यक्ष का फैसला भी हो गया। पर दोनों यादव जहां थे, वहां कायम हैं। और, अब तो अमित शाह ने सारे जाले साफ कर दिए हैं। कह दिया है कि “शिवराज से ज्यादा ऊर्जा के साथ मोहन काम कर रहे हैं।” मतलब, पूरा मामला “ऊर्जा” का है। जब तक शिवराज से “ज्यादा ऊर्जा” के साथ मोहन काम करते रहेंगे, तब तक ‘नो वेकेंसी।’

खंडेलवाल का “संवाद” और चौड़ी होती खाई

अपने शुभारंभ के कुछ ही हफ्तों के भीतर, मध्यप्रदेश में मंत्रियों और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच की दूरी को पाटने के भाजपा के महत्वाकांक्षी प्रयोग ने एक असहज सच्चाई को उजागर कर दिया है। स्थानीय पार्टी नेताओं और नौकरशाही के बीच खाई चौड़ी होती जा रही है।

1 दिसंबर को, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने “संवाद” पहल की शुरुआत की थी, जिसके तहत मंत्रियों को पार्टी के प्रदेश मुख्यालय में कार्यकर्ताओं से मिलने के लिए रोजाना दो घंटे बिताने की आवश्यकता होती है। लेकिन, यह पहल अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल हो रही है। सफल हो रही होती तो केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को ग्वालियर की खराब सड़कों के मामले में खुद आगे होकर पीडबल्यूडी मंत्री राकेश सिंह के पास नहीं जाना पड़ता। और, न राजगढ़ के सांसद रोडमल नागर के समक्ष मंच से उतरकर सरकारी अफसर के पैर छूने की नौबत आती।

नागर और भाजपा विधायक अमर सिंह यादव असल में 24 घंटे नल से शुद्ध जल पाने वाले देश के पहले गांव पहुंचे थे। लेकिन अफसर अनुपस्थित थे। सांसद और विधायक को लगभग डेढ़ घंटे इंतजार करना पड़ा। लिहाजा जैसे ही अफसर कार्यक्रम में पहुंचे, नागर उनके कदमों में झुक गए।

गुना से एमपी फिर ग्वालियर में इतनी दिलचस्पी क्यों?

पिछले दिनों गृह मंत्री अमित शाह ग्वालियर आए तो उन्हीं सड़कों का पैच वर्क किया गया, जहां से उनका काफिला गुजरने वाला था। इसके बावजूद शाह उस घर की देहरी पर नहीं पहुंच पाए, जहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म हुआ था। पार्टी के ही लोग बताते हैं कि शहर की सड़कों का वाकई बुरा हाल है।

लेकिन, बड़े नेताओं की सियासत का दुष्परिणाम पूरा शहर भोग रहा है। जिले के अफसर भी सांसद भारत सिंह कुशवाह, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रभारी मंत्री तुलसी सिलावट की बैठकों से परेशान हैं। सिर्फ बैठकें होती हैं, नतीजा कुछ नहीं निकलता।

सिलावट चूंकि सिंधिया के कोटे से मंत्री हैं, सो सिवाय सिंधिया की “बैठकों” के कुछ कर नहीं पाते। उनके बारे में तो कहा जाता है कि “महल” यदि ग्वालियर में नहीं होता, तो उनकी ग्वालियर दौड़ भी इतनी फटाफट नहीं होती। लेकिन, सिलावट करें भी तो क्या? अब महाराज से यह सवाल करने से तो रहे कि “आपका निर्वाचन क्षेत्र तो गुना है, फिर दिलचस्पी ग्वालियर में ज्यादा क्यों?” क्या अगले चुनाव की तैयारी अभी से कर रहे हैं?



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