
ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रहे खाड़ी युद्ध के 40 वें दिन संघर्ष विराम की घोषणा वाकई राहत भरी है, बावजूद इसके कि यह घोषणा संदेहों और अविश्वास के बीच की गई है।
अव्वल तो यह साफ हो जाना चाहिए और जैसा कि यह बार-बार दर्ज किया जा चुका है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान पर यह युद्ध जबरिया थोपा है। दूसरी बात, ट्रंप के साथ ही नेतन्याहू को यह अंदाजा नहीं था कि ईरान इतने दिनों तक युद्ध में न केवल टिका रहेगा, बल्कि यह उसके लिए अस्तित्व की लड़ाई बन जाएगा।
दो दिन पहले ट्रंप ने ईरान की पूरी सभ्यता को नष्ट करने की धमकी देकर सारी दुनिया को सांसत में डाल दिया था। और इसके जवाब में जिस तरह से लाखों ईरानी अपने ऊर्जा प्रतिष्ठानों के आसपास मानव शृंखला बनाकर खड़े हो गए वह एक स्वाभिमानी देश की मानवता के पक्ष में सबसे आश्वस्त करने वाली तस्वीर कही जा सकती है।
प्रतिकार का यह गांधी का रास्ता है। इसमें अंतर्निहित संदेश को पढ़ा जाना चाहिए। आखिर यह कैसे भूला जा सकता है कि ईरान के कथित परमाणु कार्यक्रम को निशाना बनाकर शुरू किए गए इस हमले में एक स्कूल के डेढ़ सौ से अधिक बच्चों को भी निशाना बनाया गया है!
वास्तविकता यह है कि कथित परमाणु कार्यक्रम के नाम पर शुरू हुआ यह युद्ध आखिरकार तेल संकट में बदल चुका है और इसने ट्रंप को लगभग बदहवास कर दिया है। दिलचस्प यह है कि इस युद्ध से लगभग तबाह हो चुके ईरान के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ही एक बड़ा कवच बन गया है। ट्रंप की मनमानी का नतीजा यह हुआ है कि होर्मुज पर ईरान का एक तरह से पूरा नियंत्रण हो गया है।
इस घटनाक्रम में अहम यह भी है कि संघर्ष विराम में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब की भूमिका तो रही है, परदे के पीछे से चीन की भूमिका भी सामने आ रही है। ट्रंप ने बकायदा सोशल मीडिया पोस्ट में जिस तरह से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का जिक्र किया है, वह बताता है कि अमेरिका कैसे पाकिस्तान को अपने भरोसेमंद की तरह देखता है।
दूसरी ओर पाकिस्तान की इस भूमिका के संदर्भ में हमारे विदेश मंत्री एस जयंशकर के बयान ने हमारी स्थिति को बेहद हास्यास्पद बना दिया। जयंशकर से जब पाकिस्तान की मध्यस्थता के बारे में पूछा गया था, तो उन्होंने उसे एक ‘दलाल नेशन’ करार दिया था। विदेश मंत्री से ऐसी भाषा की अपेक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन मुश्किल यह है कि मोदी सरकार विदेश नीति के जरिये घरेलू राजनीति को साधना चाहती है।
डोनाल्ड ट्रंप और ईरान ने दो हफ्ते के संघर्ष विराम की घोषणा की है, तो इसे एक मौके की तरह भी देखा जाना चाहिए। भारत और फ्रांस सहित अनेक देशों ने संघर्ष विराम का स्वागत किया है। मगर लाख टके का सवाल यही है कि क्या अंतरराष्ट्रीय बिरादरी इस मौके का इस्तेमाल खाड़ी में टिकाई शांति की तलाश करने में करेगा? क्या भारत की भी इसमें कोई भूमिका होगी?


