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सवाल यह नहीं है कि बीजेपी नेता और आरएसएस विचारक राम माधव ने वाशिंगटन डीसी के हडसन इंस्टीट्यूट में न्यू इंडिया सम्मेलन में क्या कहा। सवाल यह भी नहीं है कि उन्होंने बाद में अपनी बातों को तथ्यात्मक रूप से गलत बताकर माफी मांग ली। असली सवाल यह है कि क्या माफी मांग लेने भर से उन कही बातों की गंभीरता को नजरअंदाज किया जा सकता है? क्या एक शीर्ष स्तर के नेता का बयान हैरान नहीं करता, जो भारत की विदेश नीति के संवेदनशील मुद्दों पर था।
राम माधव ने हडसन इंस्टीट्यूट के पैनल में जहां अमेरिकी डिप्लोमेट कर्ट कैंपबेल जैसे लोग मौजूद थे। उन्होंने कहा, ‘भारत ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। हमने रूस से तेल खरीदना भी बंद कर दिया, भले ही विपक्ष की तरफ से बहुत आलोचना हुई। हमने 50 प्रतिशत टैरिफ को बिना ज्यादा कुछ कहे स्वीकार कर लिया। तो आखिर भारत अमेरिका के साथ काम करने में कहां कम पड़ रहा है?’ यह बयान भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। क्या अमेरिका परस्त होने का भारत को यही हासिल हुआ।
तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि 2018-19 में डोनाल्ड ट्रंप की पहली सरकार ने ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकलकर सख्त प्रतिबंध लगाए। भारत उस समय ईरान का दूसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार था। अमेरिकी दबाव और छूट न मिलने के कारण मई 2019 से भारत ने ईरान से तेल आयात पूरी तरह बंद कर दिया। यह फैसला भारत की ऊर्जा सुरक्षा और विविधीकरण की जरूरत से ज्यादा अमेरिकी प्रतिबंधों का परिणाम था। हाल के वर्षों में कुछ अस्थायी छूटों के बावजूद, लंबे समय तक यह रिश्ता प्रभावित रहा। ईरान के साथ सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और व्यापारिक संबंधों को नजरअंदाज कर ऊर्जा आयात पर अमेरिकी तानाशाही को मानना गुटनिरपेक्षता की नीति पर सवाल खड़ा करता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने सस्ते रूसी तेल का बड़ा आयात बढ़ाया, जो अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद रहा। लेकिन ट्रंप की दूसरी सरकार में इस पर सख्त दबाव बढ़ा। ट्रंप ने बार-बार कहा कि मोदी ने उन्हें खुश करने का वादा किया है। अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए, जिन्हें ट्रंप ने रूसी तेल खरीद से जोड़ा। भारत ने इन टैरिफ का विरोध किया और रूसी आयात पूरी तरह नहीं रोका, लेकिन आयात के स्तर में उतार-चढ़ाव आया। राम माधव का बयान इसी संदर्भ में आया, जो विपक्ष और कुछ विदेश नीति विशेषज्ञों के पुराने आरोप को बल देता है कि मोदी सरकार राष्ट्रीय हितों में अमेरिकी दबाव के आगे झुक गई।
भारत की विदेश नीति की नींव नेहरू ने गुटनिरपेक्षता पर रखी थी। इंदिरा गांधी के बाद लगभग सभी प्रधानमंत्रियों ने इस सिद्धांत पर अडिग रहे। यह नीति भारत को दोनों ध्रुवों अमेरिका और सोवियत संघ रूस से संतुलित संबंध रखने की आजादी देती थी। मोदी सरकार के 12 वर्षों में यह नीति रणनीतिक स्वायत्तता के नाम पर बदली, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह अमेरिका की ओर झुकाव में बदल गई।
राम माधव भारत फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं और आरएसएस के विदेश नीति विशेषज्ञ माने जाते हैं। उनका बयान जाने-अनजाने में सरकार की आंतरिक स्वीकृति को उजागर करता प्रतीत होता है। माफी के बावजूद यह दर्शाता है कि सत्ता प्रतिष्ठान को अमेरिकी दबाव की हकीकत पता है, लेकिन सार्वजनिक रूप से सब कुछ संतुलित और स्वायत्त दिखाने की कोशिश की जाती है।
सवाल उठता है कि क्या भारत उस अमेरिका के आगे झुक गया, जो भारतीय नागरिकों को बेड़ियों में जकड़कर निर्वासित करता है? जिसके राष्ट्रपति भारत को नर्क जैसी अपमानजनक भाषा में संबोधित करते हैं? क्या मोदी सरकार में रूस और ईरान से दशकों पुराने सांस्कृतिक, व्यापारिक और रणनीतिक संबंध दांव नहीं लगे?
राम माधव के बयान ने विपक्ष को राजनीतिक हमले का मौका दिया है। लेकिन यह बहस माफी से आगे जाकर होनी चाहिए, क्योंकि राष्ट्र हित किसी एक बयान या माफी से नहीं बदलते। भारत की विदेश नीति को भावनाओं या एकतरफा झुकाव से नहीं, बल्कि कठोर राष्ट्रीय हितों ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्वायत्तता, रक्षा जरूरतें और वैश्विक दक्षिण में नेतृत्व से तय होना चाहिए।
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