काम न आया ट्रंप का समर्थन, 16 साल बाद हंगरी की सत्ता से कैसे बाहर हो गए विक्टर ऑर्बान?

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लेंस डेस्‍क। Hungary Election 2026: हंगरी में 16 साल से सत्ता संभाल रहे प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बान और उनकी फिदेज पार्टी को विपक्षी नेता पीटर माग्यार की तिस्जा पार्टी ने भारी शिकस्त दी है। यह नतीजा न सिर्फ हंगरी के लिए, बल्कि यूरोपीय संघ और वैश्विक राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अब भूतपूर्व हो चुके प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन के समर्थन में अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप भी थे।  अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने 7 अप्रैल को हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट का दौरा कर ऑर्बन के समर्थन में वोट मांगे थे। यह अमेरिका के इतिहास में भी पहली बार हुआ है, जब उपराष्ट्रपति ने दूसरे देश जा कर चुनाव में किसी नेता के लिए वोट मांगा हो। चुनाव के यह नतीजे धुर दक्षिणपंथी ताकतों के लिए झटके के रूप में देखे जा रहे हैं।

रविवार को हुए संसदीय चुनाव ने देश की राजनीति में भूकंप ला दिया है। आधिकारिक नतीजों के अनुसार, 199 सदस्यीय संसद में तिस्जा पार्टी को लगभग 138 सीटें मिली हैं, जो दो-तिहाई बहुमत से ज्यादा है। इससे पार्टी को संविधान संशोधन जैसे बड़े फैसले लेने की शक्ति मिल गई है। वहीं, ऑर्बान की फिदेज पार्टी सिर्फ 55 सीटों पर सिमट गई। इस चुनाव में मतदान प्रतिशत भी रिकॉर्ड स्तर पर रहा। करीब 79-80 मतदाताओं ने वोट के अधिकार का प्रयोग किया, जो हंगरी के अब तक इतिहास में सबसे ज्‍यादा है।

पीटर माग्यार, जो पहले ऑर्बान के करीबी सहयोगी रहे थे, बाद में उनसे अलग होकर भ्रष्टाचार विरोधी और प्रो-यूरोपीय एजेंडे के साथ सामने आए। उन्होंने चुनाव में स्वास्थ्य सेवाओं, परिवहन, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे आम मुद्दों पर फोकस किया। उनके अभियान ने युवाओं और मध्यम वर्ग को खासा आकर्षित किया। माग्यार ने जीत के बाद कहा कि यह हंगरी की जनता की जीत है, जो यूरोप से जुड़ाव और स्वतंत्रता चाहती है।

Hungary Election 2026: क्‍यों गई ऑर्बान की सत्ता?

रॉयटर्स, गार्डियन और सीएनएन की रिपोर्ट में बताया गया कि लंबे शासनकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता में नाराजगी बढ़ाई। अर्थव्यवस्था पर रूस-यूक्रेन युद्ध का असर पड़ा, जिससे महंगाई और ठहराव बढ़ा। यूरोपीय संघ के साथ तनावपूर्ण संबंधों की वजह से फंडिंग में रुकावटें आईं, जो आम लोगों को महंगी पड़ीं। मीडिया और संस्थाओं पर कथित नियंत्रण की वजह से लोकतंत्र कमजोर होने की धारणा बनी। जिसने प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बान के खिलाफ जनमत तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई।

हैरान करने वाली बात यह रही कि ऑर्बान ने हार स्वीकार करते हुए तुरंत सत्ता छोड़ने का संकेत दिया। उन्होंने नतीजों को “दर्दनाक लेकिन स्पष्ट” बताया और माग्यार को बधाई दी। कई विश्लेषक मानते हैं कि इस शांतिपूर्ण स्वीकारोक्ति ने देश में किसी बड़े राजनीतिक संकट या अस्थिरता को टाला।

यह चुनाव यूरोप में ‘इलिबरल डेमोक्रेसी’ बनाम पारंपरिक लोकतांत्रिक मूल्यों की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा था। माग्यार की जीत से हंगरी के यूरोपीय संघ और नाटो के साथ संबंध सुधरने की उम्मीद है, साथ ही यूक्रेन को समर्थन बढ़ाने का रास्ता भी खुल सकता है।

हालांकि, नई सरकार के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना, संस्थागत सुधार करना और पुरानी व्यवस्था के अवशेषों से निपटना। फिर भी, यह नतीजा दिखाता है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेता भी जनता की इच्छाशक्ति के सामने टिक नहीं पाते।



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