छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में एक व्यक्ति के शव के दफन को लेकर हुआ टकराव अप्रिय होने के साथ ही बेहद चिंताजनक है। घटना के ब्योरों से पता चलता है कि ईसाई धर्म अपना चुके जिले के आमाबेड़ा गांव के सरपंच के पिता का रविवार को निधन हो गया था और परिवार ने ईसाई रीति-रिवाजों के मुताबिक उनके शव को दफना दिया।
यह उस राज्य की घटना है, जहां कि भाजपा सरकार ने ऐलान कर रखा है कि वह धर्मांतरण को रोकने के लिए कड़ा कानून लेकर आएगी। इस पर अलग से बहस की जरूरत है, इसके बावजूद यह बताने की जरूरत नहीं है कि कांकेर में जो कुछ हुआ है और जिन लोगों ने ईसाई धर्म अपना चुके व्यक्ति के अंतिम संस्कार को गरिमापूर्ण तरीके से नहीं होने दिया उनका यकीन देश के संविधान में नहीं है, जो देश के हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है।
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असल में बहस इस पर भी होनी चाहिए कि आदिवासियों में ऐसे भी लोग हैं, जो खुद को न हिंदू मानते हैं और न ही ईसाई। वे प्रकृति पूजक हैं।
दरअसल कांकेर की ताजा घटना को छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ समय से हो रही ऐसी घटनाओं की समग्रता में देखना चाहिए, जहां ईसाई धर्म को अपनाने वाले लोग पिछले कुछ समय से निशाने पर हैं।
कुछ महीने पहले कांकेर जिले के ही नरहरपुर ब्लॉक में ईसाई धर्म अपना चुके एक अन्य व्यक्ति के शव को दफनाए जाने को लेकर भी भारी विवाद हुआ था। इसी तरह से बस्तर जिले में एक पादरी के निधन के बाद हुआ टकराव सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था और कोर्ट के आदेश पर ही उन्हें ईसाई कब्रिस्तान में दफनाया गया था।
कांकेर के आमाबेड़ा में उन्मादी भीड़ ने जिस तरह से सरपंच के घर के नजदीक स्थित चर्च को फूंक दिया, वह यह बताने के लिए काफी है कि इसमें ऐसे तत्व शामिल हैं, जो माहौल को बिगाड़ना चाहते हैं। किसी भी धर्मस्थल को फूंकने वाले लोग दरअसल अपने धर्म के साथ भी न्याय नहीं कर पा रहे हैं, या उसे वे ठीक से नहीं समझते।
इससे तो कोई इनकार नहीं कर सकता कि जबर्दस्ती या प्रलोभन के आधार पर किसी को धर्मांतरण के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके विरोध के नाम पर कुछ संगठनों या व्यक्तियों को कानून को अपने हाथ में लेने का अधिकार कैसे मिल गया? आखिर भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद इन पर अंकुश क्यों नहीं लगाया जा सका?
कहने की जरूरत नहीं कि किसी भी सभ्य समाज में धर्म की आड़ में होने वाली ऐसी हिंसा स्वीकार नहीं हो सकती।

