ऐसी थी विदुषी और विद्रोही पंडिता रमाबाई, जिसे गाली देने में तिलक भी हो गए थे ओछे

NFA@0298
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ऐसी थी विदुषी और विद्रोही पंडिता रमाबाई, जिसे गाली देने में तिलक भी हो गए थे ओछे


07-Apr-2026 10:05 PM

भारतीय इतिहास के पन्नों में जब ‘नवजागरण’ (Renaissance) की बात होती है, तो राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले या दयानंद सरस्वती के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। लेकिन इसी आकाश में एक ऐसा नक्षत्र भी था जिसकी चमक ने न केवल सवर्ण पितृसत्ता की आंखों में चकाचौंध पैदा कर दी, बल्कि ईसाई मिशनरियों के पुरुष-अहंकार को भी चुनौती दी। वह नाम था-पंडिता रमाबाई सरस्वती। आज उनकी 104वीं पुण्यतिथि (5 अप्रैल 1922–5 अप्रैल 2026) पर यह याद करना जरूरी है कि क्यों उन्हें इतिहास की मुख्यधारा से सुनियोजित तरीके से बाहर रखा गया।

1858 में जन्मीं रमाबाई का बचपन जंगलों और यात्राओं में बीता। उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे एक लीक से हटकर चलने वाले ब्राह्मण थे, जिन्होंने समाज के कड़े विरोध के बावजूद अपनी पत्नी और बेटी (रमाबाई) को संस्कृत सिखाई। जब 1877 के भीषण अकाल में रमाबाई ने अपने माता-पिता को खो दिया, तो वे अपने भाई के साथ पैदल ही पूरे भारत की यात्रा पर निकल पड़ीं।

कलकत्ता पहुँचने पर उनकी अद्भुत संस्कृत विद्वत्ता ने वहां के बड़े-बड़े पंडितों को हैरान कर दिया। यह वह दौर था जब स्त्रियों के लिए ‘अक्षर-ज्ञान’ भी पाप माना जाता था। वहां के विद्वानों ने उन्हें ‘पंडिता’ और ‘सरस्वती’ की उपाधियों से नवाजा-वे आधुनिक भारत की पहली स्त्री थीं जिन्हें सार्वजनिक रूप से यह सम्मान मिला। लेकिन रमाबाई केवल श्लोक पढऩे वाली विदुषी नहीं थीं। उन्होंने शास्त्रों का गहरा अध्ययन किया और पाया कि जिसे ‘धर्म’ कहा जा रहा है, वह वास्तव में स्त्रियों और अवर्णों (शूद्रों) को गुलाम बनाए रखने का एक व्यवस्थित तंत्र है।

उन्होंने जाति की सीमाओं को तोड़ते हुए एक गैर-ब्राह्मण (बिपिन बिहारी मेधवी) से विवाह किया। पति की असमय मृत्यु के बाद, एक छोटी बच्ची को गोद में लिए रमाबाई ने सवर्ण हिंदू विधवाओं की उस ‘नरक’ जैसी स्थिति को अपनी आंखों से देखा, जहाँ बाल-विधवाओं का मुंडन कर उन्हें अंधेरी कोठरियों में डाल दिया जाता था। यहीं से शुरू हुआ उनका वह संघर्ष, जिसने आगे चलकर तिलक और विवेकानंद जैसे दिग्गजों के माथे पर बल डाल दिए।

शारदा सदन और मुक्ति मिशन : जब विधवाओं को ‘इंसान’ बनाया गया

रमाबाई ने महसूस किया कि समाज सुधारक पुरुष केवल ‘विधवा विवाह’ की बात करते हैं, जैसे विवाह ही स्त्री के उद्धार का एकमात्र रास्ता हो। उन्होंने एक क्रांतिकारी विकल्प पेश किया—‘आत्मनिर्भरता।’ 1889 में उन्होंने पुणे में ‘शारदा सदन’ की स्थापना की। यह सिर्फ एक छत नहीं थी, बल्कि एक ऐसी जगह थी जहाँ विधवाओं को शिक्षा, टाइपिंग, बढ़ईगिरी और बागवानी सिखाई जाती थी ताकि वे किसी पुरुष की दया पर निर्भर न रहें।

उन्होंने अपनी कालजयी पुस्तक ‘The High-Caste Hindu Woman’ (1887) के जरिए दुनिया को बताया कि हिंदू समाज की ‘कुलीनता’ वास्तव में स्त्रियों के शोषण की नींव पर खड़ी है। उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया क्योंकि उन्हें लगा कि वहां ‘समानता’ है, लेकिन जल्द ही उन्होंने वहां भी पितृसत्ता से लोहा लिया और बाइबिल का अनुवाद सीधे हिब्रू से मराठी में किया, ताकि चर्च के पुरुषों द्वारा किए गए ‘स्त्री-विरोधी’ अनुवादों को ठीक किया जा सके।

तिलक का भाषाई प्रहार: ‘पंडिता’से ‘रेवरंडा’ की गाली तक

यही वह बिंदु था जहाँ से रमाबाई के खिलाफ ‘महारथियों’ का मोर्चा खुला। बाल गंगाधर तिलक के लिए ‘स्वराज’ का अर्थ केवल अंग्रेजों से मुक्ति था। तिलक का राष्ट्रवाद सवर्ण पुरुष की संप्रभुता पर टिका था। जब रमाबाई की ख्याति और उनके स्वतंत्र विचार बढऩे लगे, तो तिलक ने अपने अखबार ‘मराठा’ और ‘केसरी’ में उन पर व्यक्तिगत हमले शुरू किए।

तिलक ने उन्हें ‘पंडिता’ कहना बंद कर ‘रेवरंडा’ कहना शुरू किया। यह केवल एक पदवी नहीं थी। ‘रेवरेंडा’ शब्द का प्रयोग तिलक ने इसलिए किया ताकि उसमें ‘रंडा’ (विधवा के लिए एक अत्यंत अपमानजनक गाली) की ध्वनि साफ सुनाई दे। तिलक की नजऱ में एक विधवा का स्वतंत्र होना और धर्म बदलना समाज के पतन का संकेत था। तिलक ने ‘केसरी’ (1887) में साफ़ लिखा था:

‘स्त्रियों की शिक्षा और उनकी स्वतंत्रता हिंदू समाज की जड़ों में तेल डालने जैसा है। जो स्त्रियाँ पुरुषों के समान अधिकारों की मांग करती हैं, वे वास्तव में धर्म का नाश कर रही हैं।’

‘एज ऑफ कंसेंट’और तिलक का ‘मर्दाना’ स्वराज

1891 में जब लड़कियों के लिए शादी की उम्र 10 से बढ़ाकर 12 साल करने का कानून (Age of Consent Bill) आया, तो तिलक इसके सबसे उग्र विरोधी थे। रमाबाई इस कानून के पक्ष में थीं क्योंकि उन्होंने सवर्ण घरों में छोटी बच्चियों का यौन शोषण देखा था। तिलक ने इस सुधार को ‘हिंदू धर्म पर हमला’ बताया। उनका तर्क था:

‘हमें अपनी संतानों पर पूर्ण अधिकार है। सरकार को यह तय करने का कोई हक नहीं कि हम अपनी बच्चियों का विवाह किस उम्र में करें।’तिलक का स्वराज उस 10 साल की बच्ची के आंसुओं पर खड़ा था, जिसे धर्म के नाम पर बूढ़ों के बिस्तर पर धकेला जा रहा था।

विवेकानंद का ‘ग्लोबल’ पाखंड और रमाबाई का ‘ग्राउंड’ संघर्ष

स्वामी विवेकानंद दुनिया भर में हिंदू धर्म की ‘उज्ज्वल छवि’ बनाने के मिशन पर थे। ठीक उसी समय, रमाबाई अमेरिका में भारतीय विधवाओं के नरक को उजागर कर रही थीं। विवेकानंद को यह ‘राष्ट्रीय अपमान’ लगा। शिकागो से अपने शिष्यों को लिखे एक पत्र में विवेकानंद ने रमाबाई के बारे में जो लिखा, वह आज के उनके भक्तों को हैरान कर सकता है। विवेकानंद ने लिखा:

‘यह महिला (रमाबाई) अपनी कट्टरता और अज्ञानता से हमारे धर्म की छवि बिगाड़ रही है। जो लोग हिंदू विधवाओं की स्थिति पर रोना रो रहे हैं, वे वास्तव में ईसाइयों के एजेंट हैं।’

विवेकानंद के लिए ‘धर्म का गौरव’ उन करोड़ों विधवाओं की सिसकियों से बड़ा था। उन्होंने रमाबाई के प्रयासों को ‘दुष्प्रचार’ कहकर खारिज कर दिया क्योंकि रमाबाई ने उस ‘स्त्री-विद्वेष’ (Misogyny) की जड़ें मनुस्मृति और ब्राह्मणवादी ग्रंथों में ढूंढ निकाली थीं।

विस्मृति का षड्यंत्र

रमाबाई को इतिहास ने इसलिए भुला दिया क्योंकि उन्होंने ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और ईसाई संस्थाओं, दोनों के भीतर छिपे पुरुष-अहंकार को एक साथ चुनौती दी थी। तिलक और विवेकानंद को ‘देवता’ बनाया गया क्योंकि उन्होंने ‘यथास्थिति’ को बनाए रखा, जबकि रमाबाई ने उस नींव को ही हिला दिया।

निष्कर्ष : आज 104 साल बाद भी पंडिता रमाबाई का संघर्ष खत्म नहीं हुआ है। अगर आज हम इतिहास में उन्हें उनकी वाजिब जगह नहीं दे पा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि हमारे भीतर का ‘तिलक’ और ‘विवेकानंद’ आज भी एक स्वतंत्र स्त्री के विचारों से डरा हुआ है। भारतीय इतिहास में स्त्री को उसकी वाजिब जगह तभी मिलेगी, जब हम स्वीकार करेंगे कि हमारे ‘मसीहा’ भी स्त्री-अधिकारों के मामले में कितने बौने थे। रमाबाई केवल एक सुधारक नहीं, बल्कि भारतीय नवजागरण की वह ‘असुविधाजनक’ अंतरात्मा थीं, जिसे हम आज भी पहचानने से कतराते हैं। (यह लेख इस अख़बार के संपादक ने AI जेमिनी से विचार-विमर्श से तैयार करवाया है)



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