

- दो लाख भीड़ का लक्ष्य, श्रद्धांजलि के बहाने संगठन सक्रिय, चुनावी संकेत साफ
- मायावती का मैसेज: जमीनी ताकत अब भी बरकरार
लखनऊ। आंबेडकर जयंती के अवसर पर बहुजन समाज पार्टी राजधानी लखनऊ में एक बड़े शक्ति प्रदर्शन की तैयारी में है। यह आयोजन केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक परिदृश्य में पार्टी की मौजूदगी और प्रभाव को पुनर्स्थापित करने की रणनीतिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी इस कार्यक्रम के जरिए अपने कैडर और कोर वोट बैंक को नया संदेश देने जा रही है।
14 अप्रैल को गोमतीनगर स्थित आंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल पर होने वाले इस आयोजन में प्रदेश के सभी 18 मंडलों से पदाधिकारियों और कार्यकतार्ओं को जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, करीब दो लाख लोगों की भागीदारी का अनुमान है। इस विशाल जुटान के जरिए बसपा यह दिखाना चाहती है कि भले ही हाल के चुनावों में उसका प्रदर्शन अपेक्षित नहीं रहा हो, लेकिन उसकी जमीनी पकड़ अब भी मजबूत है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कार्यक्रम 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की तैयारी की दिशा में एक अहम कदम है। आंबेडकर जयंती, जो भीमराव आंबेडकर की विचारधारा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण तारीख मानी जाती है, बसपा के लिए अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक को फिर से संगठित करने का सबसे प्रभावी मंच भी है। इस आयोजन के माध्यम से पार्टी सामाजिक न्याय और बहुजन राजनीति के अपने मूल एजेंडे को फिर से प्रमुखता देने की कोशिश कर रही है।
कार्यक्रम की एक खास बात यह है कि इसे पूरी तरह से संगठित और अनुशासित स्वरूप देने पर जोर दिया जा रहा है। सुबह मायावती अपने मॉल एवेन्यू स्थित आवास पर आंबेडकर को श्रद्धासुमन अर्पित करेंगी और कार्यकर्ताओं के लिए संदेश जारी करेंगी। इसके बाद मुख्य आयोजन स्थल पर जुटान होगा, जहां भीड़ ही राजनीतिक संदेश का माध्यम बनेगी।
यह भी उल्लेखनीय है कि इस आयोजन को सीधे भाषण या आक्रामक राजनीतिक बयानबाजी से दूर रखा जा रहा है। इसके बजाय बसपा भीड़ के जरिए अपनी ताकत का प्रदर्शन करना चाहती है। राजनीतिक तौर पर यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बिना टकराव के अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जा सकती है।
इसके साथ ही, यह कार्यक्रम अन्य प्रमुख दलों जैसे भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के लिए भी एक संकेत माना जा रहा है कि बसपा को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। खासकर ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण बन रहे हैं, बसपा का यह शक्ति प्रदर्शन अपने लिए राजनीतिक स्पेस वापस हासिल करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, आंबेडकर जयंती का यह आयोजन बसपा के लिए केवल एक परंपरागत कार्यक्रम नहीं, बल्कि संगठन को पुनर्जीवित करने, कार्यकतार्ओं में ऊर्जा भरने और आने वाले चुनावों के लिए जमीन तैयार करने का एक अहम पड़ाव साबित हो सकता है।


