अपनी छाया बन कर रह गए Nitish Kumar

NFA@0298
2 Min Read


भले ही Nitish Kumar यह कहें कि विधान मंडल और संसद के दोनों सदनों का सदस्य बनना उनका सपना था, लेकिन हकीकत यही है कि दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के चार महीने बाद ही वह जिस तरह से राज्यसभा जा रहे हैं, उसकी पटकथा कोई और लिख रहा है। वह तो बस एक किरदार हैं। एक तरह से देखा जाए, तो 75 वर्षीय नीतीश कुमार दो दशक तक मुख्यमंत्री रहने के बाद बिहार की राजनीति से खुद को अलग कर रहे हैं।

इसका यह मतलब भी है कि बिहार में सरकार की कमान संभालने का भाजपा का सपना पूरा हो रहा है। पर सवाल है, यह किस कीमत पर हो रहा है? इस फैसले से नाराज जद(यू) के कार्यकर्ता प्रदर्शन कर रहे हैं। नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को नई सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा भी है। तात्कालिक रूप से भले ही बिहार में भाजपा और जद(यू) की अगुवाई वाले गठबंधन को कोई खतरा न हो, लेकिन इस नई व्यवस्था से जद(यू) की ताकत कमजोर हो सकती है, इससे कैसे इनकार किया जाए?

जहां तक नीतीश कुमार की बात है, तो वह लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान जैसे नेताओं के दौर के बिहार के ऐसे नेता रहे हैं, कई दशकों तक जिनके इर्द-गिर्द बिहार की राजनीति चलती रही है। एक दौर में उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार तक माना गया। एक समय उन्होंने खुद प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती तक दे दी थी। अपनी राजनीतिक साख तो वह पहले ही दांव पर लगा चुके थे। यह नीतीश कुमार के राजनीतिक अवसान का समय है; आज वह अपनी छाया बन कर रह गए हैं।



Source link

Share This Article
Leave a Comment