
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से ठीक 20 दिन पहले चुनाव आयोग पर भरोसा फिर तार तार होता दिखा। मालदा में वोटर लिस्ट को लेकर हुई हिंसा सिर्फ कानून व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के भरोसे का भी है। सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने के विरोध में प्रदर्शनकारियों ने न्यायिक अधिकारियों के काफिले पर हमला बोल दिया। सैकड़ों गाड़ियों के शीशे तोड़े गए, तोड़फोड़ हुई। एक जिले में चुनावी प्रक्रिया को लेकर ऐसा बवाल तब हो रहा है जब पूरे राज्य में मतदान की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। हालांकि पश्चिम बंगाल एसआईआर का मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
यह घटना अकेली नहीं है। यह चुनाव आयोग की उस लगातार असफलता की ताजा मिसाल है जिसमें एसआईआर से जुड़ी विसंगतियों को मीडिया और विपक्ष सामने ला रहा है, लेकिन आयोग के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही।
अर्थशास्त्री परकाला प्रभाकर के आरोप भी कम चिंताजनक नहीं हैं, जिसमें वह कहते हैं कि आंध्र प्रदेश में 2024 में हुए विधानसभा चुनाव में आधी रात के बाद करीब 17 लाख वोट 6 सेकंड में डाले गए। पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन भी चुनाव आयोग के मतदाता पोर्टलों में सुरक्षा संबंधी चौंकाने वाली खामियों का खुलासा कर चुके हैं।
बीते कई चुनावों में सामने आया है कि वोटर लिस्ट तैयार करने की प्रक्रिया में अनियमितताओं, नाम काटने-जोड़ने के विवाद और राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप ने माहौल बिगाड़ दिया।
आज पूरा विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी में है। यह सवाल चुनाव आयोग विश्वसनीयता और निष्पक्षता का है।
एक समय था जब टी.एन. शेषन जैसे चुनाव आयुक्त ने आयोग को सच्ची स्वायत्तता और सख्ती का प्रतीक बना दिया था। आज उसी संस्था पर आरोप है कि वह विपक्ष को निशाना बनाने में ज्यादा सक्रिय है। नाम काटने की प्रक्रिया में उठते सवालों की जिम्मेदारी से बचना ये पैटर्न बार-बार दोहराए जा रहे हैं।
यह सब तब है जब ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग पर उठे सवाल अभी खत्म नहीं हुए हैं।
चुनाव आयोग को फिर से याद करना चाहिए कि उसकी जिम्मेदारी किसी एक दल की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की है। अगर आज यह निष्पक्षता जाती रहेगी तो कल देश के लोकतंत्र पर ही सवाल उठेंगे।
यह दुर्भाग्यनजनक है कि संसदीय लोकतंत्र में जिस संस्थाब पर निष्पजक्ष चुनाव कराने की जिम्मे दारी है, वह विपक्ष के महाभियोग के महाभियोग के कठघरे में खड़ा है।


